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‘’हमें घर के आखिरी सदस्य तक का अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है’’

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जुलाई 2020 से दिसंबर 2020 के बीच इस टीम ने कोविड और बिना कोविड से मरे 250 लोगों का अंतिम संस्कार किया

निखिला हेनरी

फोन पर परिवार वालों ने बताया कि 68 वर्षीय आदमी, जो कि अपने कोविड पॉजिटिव पत्नी और बेटी के साथ रहता था, की मौत उसी रात हुई थी. लेकिन 11 मई को जब 33 वर्षीय श्रीनिवास बेल्लम और 29 वर्षीय साईं तेजा उसकी लाश की तरफ बढ़े तो वह फूल चुकी थी और उसमें से बदबू आ रही थी.

हैदराबाद के मल्काजगीरी के उस घर में उन दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कोविड प्रोटोकॉल के अनुसार उस बॉडी को बांधा और उसको दफनाने के लिए उन्होंने पादरी का इंतजार किया. उस समय मरे हुए उस आदमी का ना ही पड़ोसी आया ही ना कोई रिश्तेदार.

बेल्लम और तेजा उन 10 इंजीनियरों के ग्रुप का हिस्सा हैं जो हैदराबाद में कोविड-19 से मरे लोगों का अंतिम संस्कार करते हैं. उनके अनुसार शहर में कई परिवारों ने अपने परिजनों के लाश को लेने से इनकार कर दिया है.

“जब उनकी बॉडी को लेने से दोस्त और परिवार दोनों मना कर देते हैं तो हम मौजूद रहते हैं. इस साल अप्रैल से हमें अंतिम संस्कार के लिए रोज 50 के आसपास कॉल आ रहे हैं”-Genpact, हैदराबाद में काम करने वाले बेल्लम ने कहा. इस टीम के दूसरे सदस्य Cognizant, माइक्रोसॉफ्ट ,टेक महिंद्रा और अन्य टेक कंपनियों में काम करते हैं.

<div class="paragraphs"><p>एक बॉडी जिसका अंतिम संस्कार लास्ट राइड टीम ने किया(फोटो-द क्विंट)</p></div>
एक बॉडी जिसका अंतिम संस्कार लास्ट राइड टीम ने किया(फोटो-द क्विंट)

कैसे शुरू हुई लास्ट राइड

जून 2020 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर रमनजीत सिंह ने त्रासदी भरी परिस्थिति का सामना किया. जब उनके दोस्त की मां का कोविड-19 से देहांत हो गया तो परिवार वालों के लिए अंतिम संस्कार का खर्चा उठाना मुश्किल था, जिसके लिए उन्हें 50,000 जरूरत थी. ठीक उसी के बाद सिंह ने विभिन्न सॉफ्टवेयर फर्मों में काम करने वाले 10 इंजीनियरों की एक टीम बनाई और ‘लास्ट राइड’ शुरू किया ,ताकि मरे लोगों के लिए मुफ्त मुर्दागाड़ी और अंतिम संस्कार की सेवा दी जा सके.

उन्होंने संसाधन जुटाकर 1 लाख की मारुति ओमनी वैन खरीदी और उसे मुर्दागाड़ी में बदल दिया. उन्होंने खुद विभिन्न धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से अंतिम संस्कार करना सीखा. जुलाई 2020 से दिसंबर 2020 के बीच इस टीम ने कोविड और बिना कोविड से मरे 250 लोगों का अंतिम संस्कार किया .

लेकिन इस अप्रैल जिस परिस्थिति का सामना उन्होंने किया वह कोरोना की पहली लहर की तरह नहीं था.” दूसरी लहर में कई परिवार एक साथ खत्म हो गए. हमें परिवार के अंतिम सदस्य का भी अंतिम संस्कार करना पड़ा “- Cognizant में काम करने वाले तेजा ने बताया.

<div class="paragraphs"><p>साईं तेजा ने हैदराबाद के एक शमसान में अंतिम संस्कार किया (फोटो-द क्विंट)</p></div>
साईं तेजा ने हैदराबाद के एक शमसान में अंतिम संस्कार किया (फोटो-द क्विंट)

7 मई को इस टीम को एक महिला का कॉल आया. उसके जुड़वा बच्चों को छोड़कर पूरे परिवार की मौत कोविड से हो चुकी थी .तेजा के अनुसार “उस महिला के सास-ससुर अप्रैल में मर गए और उसके पति ने मई के पहले हफ्ते में हैदराबाद के एक हॉस्पिटल में दम तोड़ दिया”. इनकी टीम हॉस्पिटल पहुंची, बॉडी को प्राप्त किया ,उसे रात भर फ्रीजर में रखा और अगली सुबह उसका दाह संस्कार किया.

तेजा के अनुसार ” हैदराबाद के अस्पतालों में बॉडी लेने के लिए लंबी लाइनों में लगे लोग अक्सर दूर के रिश्तेदार या शुभचिंतक होते हैं, करीबी परिवार नहीं”.

डर, गुस्सा, इनकार

हैदराबाद के जनघईयाह कॉलोनी में कोविड-19 से मरा 45 वर्षीय बाप आखरी सांस लेते समय अपनी बेटी का चेहरा नहीं देख पाया क्योंकि बेटी के सास-ससुर ने उसे आने नहीं दिया. यहां तक कि अंतिम संस्कार के लिए भी बेटी नहीं पहुंच पायी.श्रीनिवास बेल्लम ने कहा “संक्रमण का यहां सब को डर है और उन परिवारों में मृत्यु को लेकर उदासीनता है जिन्होंने कई मौतें देख ली है”

और फिर कुछ ऐसे लोग हैं जो ऐसे अचानक किसी के गुजरने से पैदा हुए संपत्ति विवाद को सलटाने में लगे है.

मौके पर तेजा के पहुंचने के पहले मरे बाप की जमीन पर मालिकाना हक को लेकर दो बेटे आपस में लड़ रहे थे .तेजा ने अफसोस जताते हुए बताया “लड़ाई घंटों तक चलती रही जबकि बाप की लाश कमरे में कोने में पड़ी रही. मुझे आगे बढ़ कर उन्हें रोकना पड़ा कि आप विवाद बाद में सुलझा लेना ,पहले दाह संस्कार कर लेते हैं. हमारे गुजारिश करने के बाद भी उन्होंने अंतिम संस्कार में शामिल होने से इनकार कर दिया”.ये भी पढ़ेंभारत में आधिकारिक नंबर से दोगुनी कोरोना मौतें? कई रिपोर्ट में दावा

<div class="paragraphs"><p>हैदराबाद के एक शमसान मेंदाह संस्कार क लिए रखी कोरोना से मरे मरीज की बॉडी (फोटो-द क्विंट)</p></div>
हैदराबाद के एक शमसान मेंदाह संस्कार क लिए रखी कोरोना से मरे मरीज की बॉडी (फोटो-द क्विंट)

कुकटपल्ली के एक परिवार के लिए कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करना भारी सर दर्द हो रहा था तो उन्होंने मदद के लिए इस टीम को बुला लिया. लेकिन दाह संस्कार करने वालों की सुरक्षा की उन्हें तनिक भी चिंता नहीं थी. तेजा के अनुसार “वह यह जताना चाहते थे कि उस बुजुर्ग महिला की मौत नेचुरली हुई है. हमें जल्द पता चल गया कि उनकी मौत कोविड-19 से हुई है और हमने PPE पहन लिया. कई बार परिवार मरे हुए अपने लोगों से पल्ला झाड़ना चाहते हैं.”

उस 80 वर्षीय महिला का अंतिम संस्कार करने के लिये उनका बेटा और बेटी दोनों राजी नहीं थे.

नेक इंसान होने का ट्रॉमा

इस टीम के सदस्य ,जिन्होंने अप्रैल 2021 के दूसरे सप्ताह से हर रोज कम से कम 4 बॉडी का अंतिम संस्कार किया है ,अब डिप्रेशन तथा पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर का सामना कर रहे हैं.

तेजा ने कहा “हमें सुबह सुबह कॉल आ जाती है. पिछले दो रातों से ना मैं सोया हूं और ना मैंने खाना खाया है. मुझे रात को डरावने सपने आते हैं”. बेल्लम ने अपनी मानसिक हालत को ‘इमोशनल’ बताया.

टीम को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है इस महामारी के साथ आई असंवेदनशीलता. तेजा ने उदास स्वर में कहा “मौत अब सामान्य है. अब मरना आम बात हो गया है”

<div class="paragraphs"><p>हैदराबाद के एक शमसान  जलती चिता (फोटो-द क्विंट)</p></div>
हैदराबाद के एक शमसान  जलती चिता (फोटो-द क्विंट)

लोगों में सहानुभूति की कमी दिख रही है. बेल्लम ने कहा “जिन परिवारों से हम मिले उसमें हमने उनको भी देखा जिन्हे दुख नहीं है. कोविड-19 ने हमारे अंदर के असंवेदनशील हिस्से को सामने ला दिया है”. मई में यह टीम एक और मुर्दागाड़ी खरीदेगी .इसके अलावा रात में बॉडी रखने के लिए उन्हें जगह का भी इंतजाम करना है. तेजा के अनुसार “हमें फ्रीजर के लिए हर रात ₹16000 देने पड़ते हैं .ना हममे इतनी देने की क्षमता है ना परिवार में ही. कोविड प्रोटोकॉल की तहत बॉडी को घर पर ज्यादा देर तक नहीं छोड़ सकते.”

इसके अलावा हॉस्पिटल अंतिम संस्कार करने के लिए बेतहाशा चार्ज कर रहे हैं.” एक अस्पताल ने ट्रांसपोर्ट और दाह संस्कार के लिए ₹90000 मांगे. कोई इंसान इतना कहां से देगा”- तेजा ने पूछा

Ramswaroop Mantri

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