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*मेरा कोना -विवेक मेहता* 

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व्यंग्य- कमीशनखोरी की रेट लिस्ट 

       जनता बड़ी गरजू, लालची और बिन पैंदे का लोटा होती है। वह तो भगवान को भी नहीं छोड़ती। भगवान पानी बरसाता है तो उसे परेशानी ! नहीं बरसाये तो भी परेशानी। पानी तो अच्छे-अच्छों के पाप-पालिश भी धो देता हैं सड़कें, पूल धुल जाए तो क्या! चलो, भगवान से परेशानी हो तो चलता है। जनता उनसे तो निपट नहीं पाती इसलिए सारे दोष का टोकरा सरकार के सिर पर मढ़ देती हैं। अपुन को तो बहुत गुस्सा आता है ऐसी हरकतों पर। यह तो बेचारी सरकार, नेता, पार्षद, अधिकारी हैं जो चुपचाप इस दोष के टोकरे को बिना भावनाओं को आहत किये उठा लेते हैं और अपने काम में लगे रहते हैं। इस एक्ट आफ गॉड को कभी कोई दूसरे की गलती बताने के लिए एक्ट आफ फ्रॉड क्या बोल दिया लोग तो बोलने वाले की जबान ही पकड़ लेते हैं। उसके मुंह पर ही इन शब्दों को बार-बार क्या मारना! क्या मिल जाएगा इससे इन विध्न संतोषियों को!! इससे तो अच्छा है कि सरकार, नेताओं, पार्षदों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखोगे तो आपका काम जल्दी हो जाएगा। नई सड़क जल्दी बन जाएगी। और कुछ नहीं तो साल में 15 दिन तो नई सड़क का आनंद ले ही सकोगें।

         अब आप कहोगे कि अपुन तो खाली पीली फेंकता है। आप खुद ही सोचिए 4 महीने तो बारिश के कारण सड़क गढ्ढों में होती है। तीन-चार महीने नई सड़कों पर खुदाई कर गढ्ढे बनाने का काम चलता है। दो ढाई महीना प्लानिंग-टेंडरिंग में चले जाते हैं। अब जल्दी सड़क बन भी जाए तो 8-10 दिन तो लग ही जाते हैं।तब तक बारिश  की तैयारी हो जाती है। तो आपको साल में 15-20 दिन ही तो अच्छी सड़क मिलेगी। लोग है कि उन दिनों का भी मजा खुशी से नहीं लेंते। जो है उसमें खुश रहना नहीं जानते। मुक्तिबोध की तरह इन्हें भी- जो है उससे बेहतर चाहिए। जब संतोष नहीं होगा तो दुख तो रहेगा ही जिंदगी में। खुद जलते रहते हो, खून जलाते हो खुद का। सरकार को कोसते हो। कोसने से कर्म बंधते हैं और कर्मों का फल इस जन्म में नहीं तो किसी और जन्म में तो भोगना ही पड़ता है। कोसते रहो, सरकार का क्या जाता है? उसे तो झुनझुना पकड़ाना आता है। चुनाव के वक्त झुनझुने पर नई पैकिंग चिपकाएगी। देशभक्ति, खतरे की बात पर आ जाएगी तो आप अपने दिमाग में से खराब सड़कें और गढ्ढे में पड़ी अपनी जिंदगी भूल गढ्ढे में गिर ही जाओगे। 

             अपुन की समझ में नहीं आता कि जब जनता को मालूम है कि भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया हैं। एक सड़क बनाने में छोट भैय्या से लेकर बड़े नेता तक और एक चपरासी से लेकर चीफ तक पैसा जाता हैं तो फिर भ्रष्टाचार को ऑफिशियल करने की मांग क्यों नहीं करती ! रेट लिस्ट लग जाएगी तो देश फायदे में ही रहेगा। आप पूछेंगे कैसे? अरे भाई अपुन मूर्खता भरी बात नहीं करता। आप ही सोचिए आपके मोहल्ले की एक सड़क बनती है। भ्रष्टाचार होता हैं उसमें। सबको हिस्सा जाता है। पकड़े नहीं जाने के लिए थोड़े-से दिनों के बाद उसकी खुदाई चालू करवाना पड़ती है गटर लाइन, पानी की लाइन, इलेक्ट्रिक लाइन के नाम पर। ताकि ठेकेदार के ऊपर खराब सड़क बनाने का दोष ना आए और सड़क भी खराब हो जाए। इन फालतू के ढकोसलों में पैसा खर्च होता है या नहीं ! फिर नई सड़क जल्दी बनवाना पड़ती है उसमें खर्चा लगता है या नहीं। इससे अच्छा तो यह नहीं होगा कि टेंडर में ही जीएसटी की तरह हर एक आदमी/हर पोस्ट का परसेंटेज लिख दिया जाए। जैसे-जैसे बिल बनें उनका हिस्सा पहुंचता रहें और काम अच्छे तरीके से चलता रहें । इसमें ट्रांसपेरेंसी भी रहेगी। जवाबदारी का प्रतिशत भी तय होगा। एक सिस्टम सेट हो जाएगा। पैसा आधिकारिक तौर पर मिलेगा तो देश को टैक्स भी मिलेगा। काले धन पर भी कंट्रोल रहेगा। 

            जिन लोगों को आंदोलन करने का शौक है वे इस बारे में आंदोलन करें ताकि सरकार भी उनकी मांगे मान ले और उन लोगो को भी खुशी मिलें कि उन्होंने देश की  भलाई कुछ काम किया है। दोनों के लिए विन-विन पोजीशन। आंदोलन नहीं करना है तो पड़े रहो गढ्ढे में, जलाते रहो खून। अपुन को क्या!

Ramswaroop Mantri

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