सामाजिक संगठन ‘निरंतर’ के आंकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में महिलाएं डायन के नाम पर मारी जाती हैं। हाल ही में 118 गांवों में किए गए सर्वे में वहां रहने वाली 145 महिलाओं ने स्वीकार किया कि वे डायन के नाम पर हुई हिंसा कि शिकार हुई हैं। इनमें से 75 प्रतिशत महिलाएं 46 वर्ष या उससे अधिक उम्र की थीं। इन महिलाओं में 97 प्रतिशत दलित, पिछड़े और अति पिछड़े समुदाय से होती हैं। बिहार में डायन-प्रथा को लेकर कानून लागू है, फिर भी इस मुद्दे पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती। आंकड़े बताते हैं कि उम्रदराज महिलाओं के साथ हमारा समाज कितना हिंसक है। हिंसा की उन तमाम अवधारणाओं को यह सर्वे ख़ारिज करता है जिसमें माना जाता हैं कि हिंसा की शिकार कम उम्र की या गैर शादी-शुदा महिलाएं होती हैं। जिस समाज में शादी सुरक्षा का कवज माना जाता है उसी समाज कि शादी-शुदा महिलाएं सबसे ज्यादा हिंसा की शिकार हुयी हैं।

कुमार कृष्णन
बिहार के पूर्णिया जिला मुख्यालय से लगभग 20 किमी दूर मुफस्सिल थाना क्षेत्र के रजीगंज पंचायत के टेटगामा उरांव टोला में डायन होने की आशंका में एक ही परिवार के पांच लोगों को जिंदा जला दिया गया और शवों को जलकुंभी के नीचे दबा दिया गया। डायन प्रथा की भेंट चढ़ गई पांच जिंदगियों में तीन महिलाएं थीं। इस घटना में आरोपियों ने परिवार के सदस्यों को डायन बताकर पहले उनकी बेरहमी से पिटाई की और फिर जिंदा जला दिया। पुलिस ने इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक तांत्रिक भी शामिल है।
टेटगामा गांव में उरांव जनजाति के करीब 50 परिवार रहते हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 300 है। इस गांव में अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं, लेकिन उरांव समुदाय अधिकतर एक-दूसरे के पास रहता है। कुछ दिन पहले रामदेव उरांव के एक बेटे की बीमारी के कारण मौत हो गई थी। उसके बाद दूसरा बेटा भी बीमार पड़ गया। इसी के चलते रामदेव को संदेह हुआ कि उसके बेटे की मौत और दूसरे बेटे की बीमारी के पीछे किसी ‘डायन’ का हाथ है। संदेह की सुई बाबूलाल की मां सातो देवी और उसकी पत्नी सीता देवी पर गई। रामदेव ने इन्हें जादू-टोना करने वाली महिलाएं यानी ‘डायन’ घोषित कर दिया। गांववालों ने भी अंधविश्वास के चलते उनकी बात मान ली। जिस पंचायत में बाबूलाल के परिवार की हत्या का फैसला लिया गया उसमें इस बात को प्रमाण के तौर पर रखा गया कि ओझाओं की भी राय है कि बाबूलाल की मां और पत्नी डायन है।
आज भी आदिवासी समाज में झाड़-फूंक और ओझा-भगतों की बातों पर अंधविश्वास व्याप्त है। बीमारी होने पर डॉक्टर के पास जाने की बजाय लोग ओझाओं के पास जाते हैं, जो अक्सर बीमारी की जड़ ‘डायन’ को बताते हैं। किसी महिला को डायन घोषित करने के पीछे कई सामाजिक पूर्वाग्रह होते हैं, जैसे उम्रदराज होना, चेहरा विकृत हो जाना, लगातार बुदबुदाना, क्रोधित रहना या अत्यधिक पूजा-पाठ में लिप्त रहना। सातो देवी इन सभी पूर्वाग्रहों पर खरी उतरती थीं इसलिए उन्हें डायन मान लिया गया।
समाज में यह मान्यता भी प्रचलित है कि डायन का ‘ज्ञान’ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होता है। इसी कारण सातो देवी के साथ-साथ उनकी बहू सीता देवी और फिर उसकी बहू रानी देवी तीनों को डायन मानकर जिंदा जला दिया गया। त्रासदी का सबसे भयावह पहलू यह है कि पीड़ित और अपराधी सभी एक ही समुदाय के आपस में रिश्तेदार थे, लेकिन अशिक्षा, अंधविश्वास और सामाजिक कुंठाओं के अंधेरे में डूबी भीड़ ने रिश्तों, मानवता और कानून सब कुछ रौंद दिया। टेटगामा गांव की यह घटना बताती है कि जब अंधविश्वास हावी हो जाता है, तो इंसानियत दम तोड़ देती है।
एक स्वयंसेवी संगठन ने वर्षों पहले इससे जुड़े सैकड़ों मामलों का अध्ययन किया था और अधिकतर में जमीन विवाद पाया था। यानि, किसी परिवार में एकल महिला रह गयी तो उसे डायन कहकर रास्ते से हटाने का षडयंत्र। परिवार में ही आपस में लड़ाई और किसी की नजर किसी की संपत्ति पर तो ‘डायन’ घोषित कर उसे मारने का षडयंत्र। डायन घोषित करने का तरीका भी बहुत आसान है। गांव समाज में झाड़-फूंक से इलाज करने वाला भगत होता है। सामान्यतः किसी की मौत हो जाती है तो भगत बताता है कि उसकी मौत की वजह कोई दुष्ट आत्मा या डायन या जादू-टोना है। फिर जिसे डायन कहा गया, उस परिवार का उत्पीड़न शुरु हो जाता है जिसकी परिणति अंत में हत्या से होती है।
इसके मूल में एक आपराधिक मामला होता है और ‘अंधविश्वास’ से जोड़ देने मात्र से स्थानीय प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता। हत्या जैसे कृत्य के पहले किसी को डायन या पूरे परिवार को तंत्र-मंत्र, जादू-टोना करने वाला बताने की अफवाहें समाज में तैरती रहती हैं। इस घटना के बारे में तो कहा जाता है कि बाकायदा गांव की बैठक हुई, एक परिवार को डायन घोषित किया गया और उसे मार डालने का निर्णय लिया गया। ये बातें पुलिस तक पहुंच भी जाती हैं तो इसे आदिवासियों और उनके अंधविश्वास का मामला मानकर प्रशासन, पुलिस सुस्त पड़ जाती है, जबकि और भी तीव्रता से काम करने की जरूरत है।
ग्रामीण इलाकों में अस्पताल, डाक्टर, इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं होने से ग्रामीण झोला छाप डाक्टरों और झाड़-फूंक करने वालों पर निर्भर रहते हैं। केवल आदिवासी समाज में नहीं, मुस्लिम, ईसाई जैसे सभी समाजों में चमत्कार से इलाज होता है और उसकी एक प्रमुख वजह चिकित्सा व्यवस्था का नदारद होना है। बिहार और झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं इलाज की सरकारी व्यवस्था नहीं दिखेगी। झोला-छाप, रक्त चूसने वाले निजी डाक्टर और ओझा, गुनी, तंत्र-मंत्र करने वाले, झाड़-फूंक करने वाले इलाज करते हैं।
सामाजिक संगठन ‘निरंतर’ के आंकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में महिलाएं डायन के नाम पर मारी जाती हैं। हाल ही में 118 गांवों में किए गए सर्वे में वहां रहने वाली 145 महिलाओं ने स्वीकार किया कि वे डायन के नाम पर हुई हिंसा कि शिकार हुई हैं। इनमें से 75 प्रतिशत महिलाएं 46 वर्ष या उससे अधिक उम्र की थीं। इन महिलाओं में 97 प्रतिशत दलित, पिछड़े और अति पिछड़े समुदाय से होती हैं। बिहार में डायन-प्रथा को लेकर कानून लागू है, फिर भी इस मुद्दे पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती। आंकड़े बताते हैं कि उम्रदराज महिलाओं के साथ हमारा समाज कितना हिंसक है। हिंसा की उन तमाम अवधारणाओं को यह सर्वे ख़ारिज करता है जिसमें माना जाता हैं कि हिंसा की शिकार कम उम्र की या गैर शादी-शुदा महिलाएं होती हैं। जिस समाज में शादी सुरक्षा का कवज माना जाता है उसी समाज कि शादी-शुदा महिलाएं सबसे ज्यादा हिंसा की शिकार हुयी हैं।
‘चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय’ के प्रो. पीपी राव ने बताया कि 2023-24 के एक सर्वे के अनुसार बिहार में करीब 75,000 महिलाएं अब भी डायन कहलाने के खतरे में हैं। साल 2000 से 2016 के बीच देशभर में 2,500 से ज्यादा महिलाओं की हत्या डायन कहकर कर दी गई। ‘जेंडर रिसोर्स सेंटर’ की निदेशक डॉ. आयुषी दुबे ने कहा कि ‘बिहार डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम’ पर सामाजिक और कानूनी दोनों नजरियों से समीक्षा जरूरी है। बिहार देश का पहला राज्य है, जिसने डायन प्रथा और काला जादू पर रोक लगाने के लिए 1999 में कानून बनाया। इस कानून के तहत काला जादू, टोना-टोटका और डायन कहकर प्रताड़ित करने पर सजा का प्रावधान है।
‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ के अनुसार बिहार में 2020 और 2021 में डायन के संदेह में चार-चार महिलाओं की हत्या हुई थीं। इससे पहले भी रोहतास, जमुई और गया जैसे जिलों में ऐसी घटनाएं हुई हैं जहां बीमारियों और मौतों के लिए महिलाओं को जिम्मेदार ठहराकर उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में ‘बिहार महिला समाज’ की ओर से एक जांच दल ने पूरे मामले की छान-बीन की। स्वास्थ्य केन्द्र के बारे में पूछने पर उन्हें पता चला कि कइयों को तो इसकी जानकारी तक नहीं है। गांव में इलाज के लिए लोग ओझा, गुनी के पास ही जाते हैं क्योंकि डॉक्टर के पास जाने का न तो पैसा है, न जुगाड़। निहायत जरूरी होने पर ही इलाज के लिए वे कस्बों के अस्पताल जाते हैं।
स्पष्ट है, अधिकांश ग्रामीण समाज गरीबी, अशिक्षा और अंधविश्वास के गर्त में समाया है। ‘बिहार महिला समाज’ की राज्यस्तरीय जांच टीम ने इस घटना के लिए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है। ‘डायन प्रथा प्रतिषेध कानून’ के बावजूद इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। दुःखद है कि घटना के कई दिन गुजर जाने पर भी गांव में दहशत है। प्रशासन द्वारा दवा, इलाज और शिक्षा की सुविधाओं की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण लोगों का ओझा, गुनियों पर भरोसा बढ़ रहा है।





