विजयकांत दीक्षित, लखनऊ
दौलत कमाने की जिद में हम कब्र मरघट तक जा पहुंचे हैं। कोरोना, ब्लैक फंगस और ताऊ ते तूफान जेसी आपदा हम सबको यही संदेश दे रही है कि प्रकृति के पुजारी राम और रहीम के रंग में रम जाओ। जाति, धर्म और देश की हद से बाहर निकल कर संसार में अपनी स्वीकार्यता को बनाओ। बैर भाव भूलो। ईश्वर-अल्लाह की हद से आगे निकल कर ही देश की सेवा करे। तभी नरेंद्र मोदी जी आपको फकीर की तरह संसार के लोग याद रखेंगे*।*नरेंद्र मोदी जी को विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह फकीर बनने का शौक बन गया है। फकीर बनने से पहले कबीर बनना पड़ेगा। पहले औलिया, फिर पीर और आगे फकीर। हद-हद तपे औलिया, बेहद तपे पीर, हद-अनहद दोनो तपे, वाको नाम कबीर। हद का आशय सीमा है। सूफी संतों की श्रेणी में सबसे ऊंचा और समझौता नहीं करने वाला नाम कबीर का है*।*राम का भी वर्णन कबीर ने अपने साहित्य में मनोयोग से किया है। उनकी नजरों में राम के चार रूप हैं। पहला रूप दशरथ नंदन राम का है जो अयोध्या में रहते हैं। घट घट में राम उनका दूसरा रूप है। सभी को ऊर्जा देने वाले उनके तीन से राम हैं। उनकी नजर में चौथे राम सबसे न्यारा है और उसका वर्णन शब्दों अथवा मुख से नहीं किया जा सकता। लेकिन यही कबीर अपनी एक रचना में यह भी कहते हैं “भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं राम भजन से छूटी री, मोर फिर से टली बला*…।*मोदी जी भगवान राम को भी मानते हैं तो काशी के फकीर कबीर का अनुसरण करते हैं। रावण से युद्ध करने के समय भगवान राम ने भील आदिवासी और पिछड़ी जाति के लोगों को संगठित किया था। उनकी लड़ाई संसार के सबसे बड़े राक्षस रावण से थी। ऐसी हालत में मोदी जी को दो और कोशिश करनी चाहिए। पहला, संघ परिवार एवं भाजपा के नेताओं-वर्करों को जीवन मृत्यु की परवाह किए बगैर कोरोना पीड़ितों की मदद मैं आगे निकलने का निर्णय लेना होगा। दूसरे दलों के लिए यह सीख होगी*।*सोनिया-राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता जिस तरह से संकट की इस घड़ी में नेगेटिव राजनीति कर रहे हैं, इनको भरोसे में लेकर राष्ट्रव्यापी अभियान मोदी जी शुरू करें तो भारत की जनता नेताओं पर फिर से विश्वास करना शुरू कर देगी। अन्यथा मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारा को नहीं मानने वाले कबीर का दोहा चरितार्थ होगा “भला हुआ मोरी गगरी फूटी, मैं पनियन भरन से छूटी, मोर सिर से टली बला री”*।
*फकीर के जीवन से यही सीख है*।
*नजरिया नजरिया की बात है। कौन किसको कैसे नजरिए से देख रहा है इसका एक उदाहरण देता हूं। समुद्र किनारे खड़े व्यक्ति को नाव दिखती है तो वह कहता है कि कश्ती आ रही है। गांव में बैठा मुसाफिर किनारे को देख बोलता है अब किनारा आने वाला है। ऊपर बैठी प्रभु की सत्ता देखती है कि आना जाना लगा है। मोदी जी उस नाव के मुखिया हैं जो किनारे आने वाली है, ऐसे में उपाय तो उन्हें निकालना है। क्योंकि समुद्र में ताऊ ते, ब्लैक फंगस और कोरोना का संक्रमण उनकी नाव पर बुरी तरह हमला कर चुका है*।**लेखक- विजयकांत दीक्षित, लखनऊ**





