डॉ. विकास मानव
सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड में मानव-शरीर सबसे मूल्यवान है. इस दृश्यमान जगत में कुल चौरासी लाख योनियाँ हैं, जिनमें भटकने के बाद जीवात्मा को बड़े ही पुण्य से चौरासी अंगुल का मानव-शरीर मिलता है।
एक ओर चौरासी लाख योनियाँ हैं और दूसरी ओर है चौरासी अंगुल का मानव शरीर। शरीर के प्रत्येक अंगुल पर एक लाख योनियों के संस्कार एक साथ केन्द्रीभूत हैं।
चौरासी लाख योनियों के संस्कारों को लेकर जीवात्मा मानव-शरीर में प्रवेश करती है और जब तक वे संस्कार ख़त्म नहीं हो जाते तब तक मानव योनि में बराबर आवागमन लगा रहता है।
इन्हीं तमाम संस्कारों को ख़त्म करने के लिए और उनके द्वारा आवागमन और जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त होने के लिए योगतंत्र में चौरासी योगासनों और उनसे सम्बंधित चौरासी तंत्र-मुद्राओं की व्यवस्था है।
प्रत्येक आसन और उससे सम्बंधित योग-तंत्र-मुद्रा के संयोग से शरीर में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा जन्म लेती है। वे ऊर्जाएं एक ही प्रकार की नहीं होतीं। उनमें भिन्नता होती है। प्रत्येक आसन और प्रत्येक मुद्रा के संयोग से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा एक दूसरे से सर्वथा भिन्न प्रकार की होती है।
प्रत्येक ऊर्जा से एक ‘कारणयोनि’ के संस्कार नष्ट होते हैं। उन ऊर्जाओं को प्राप्त करना ही ‘योग-तंत्र-सिद्धि’ है। इस प्रकार की सिद्धियों की कुल संख्या चौरासी है। अलग-अलग इन चौरासी सिद्धियों को प्राप्त करने वाले चौरासी सिद्धों की नामावली आज भी प्रसिद्ध है।
साधारण लोगों के लिए शरीर का महत्त्व भौतिक सीमा तक ही है। वे इसके आगे कुछ सोच-समझ ही नहीं सकते। वे यही जानते हैं कि बस शरीर ही सब कुछ है। आत्मा का अस्तित्व उनके लिये न कोई महत्त्व रखता है, न कोई मूल्य।
जहाँ आत्मा की बात आएगी, वहां अध्यात्म जन्म लेगा और अध्यात्म की दृष्टि से मानव शरीर का अपना अलग ही महत्व है।
सम्पूर्ण विश्वब्रह्मांड की नियंत्रणकारिणी ‘पराशक्ति’ वैसे तो सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है, मगर वह अपनी सर्वश्रेष्ठ लीलाएं मानव शरीर के आश्रय से प्रकट करती है। यदि देखा जाय तो भगवान विष्णु के कई अवतार हुए, मगर जो अवतार सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, वे हैं राम, कृष्ण, बुद्ध जिनका आश्रय लेकर इस काल की सारी धर्म-साधना और काव्य-साधना विकसित हुई।
इससे यही समझा जा सकता है कि परमात्मा के लिए भी मानव शरीर कितना मूल्यवान है।
मानव-शरीर एक ऐसा चौराहा है जहाँ से चारों दिशाओं में जाया जा सकता है। मगर यह मनुष्य के ज्ञान और कर्म पर निर्भर है। अपने ज्ञान, अपने कर्म और अपने विचार के अनुसार वह प्रेत-योनि भी प्राप्त कर सकता है और देव-योनि भी।
पुनः मानव-शरीर में भी आ सकता है और हमेशा के लिए उससे छुटकारा भी पा सकता है।





