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*भारत-रूस और चीन: ये अगर एक साथ हों, तो एक नए विश्व की संरचना संभव*

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आशीष शुक्ला
अमेरिका भारत पर गुरुवार से व्यापार में 25% और टैरिफ लगाने वाला है। राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा है कि भारत अगर रूस से तेल और हथियार खरीदना जारी रखता है तो टैरिफ और अधिक हो सकता है। मंगलवार को अपनी धमकी दोहराते हुए उन्होंने 24 घंटे के अंदर टैरिफ बढ़ाने की बात कह दी। भारत में स्वाभाविक ही इससे चिंता है। सवाल है कि ट्रंप अपने कहे पर अड़े रहे तो क्या होगा?

सच्चा दोस्त: पहले रूस की बात कर लें। भारत अपना 85% तेल आयात करता है। इसका 35% फिलहाल वह रूस से ले रहा है। सोचिए, आज का भारत किस पर आश्रित है? यह उस मुल्क पर आश्रित है, जो आपकी शर्तों पर तेल मुहैया करवाता है। पैसे भी आपकी ही करंसी में लेता है। जहां तक हथियारों का सवाल है, हमने हमेशा रूस की उंगली थामी है। क्यों? क्योंकि वह उसकी तकनीक भी साझा करता है। अमेरिका की तरह इससे इनकार नहीं करता। ऑपरेशन सिंदूर में हम S400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की तारीफ कर रहे थे ना, यह रूस से ही भारत को मिला है। फिर मिसाइल हों, टैंक हों, Made in India में भारत के साथ कंधे से कंधा मिला कर रूस खड़ा है।

सैंक्शंस की धमकी: अमेरिका कहता है ऐसे दोस्त को छोड़ दो। भला क्यों? क्योंकि व्यापार में भारत को अमेरिका 44 बिलियन डॉलर (सरप्लस ट्रेड) का फायदा देता है। भारत के साथ अमेरिका का फिलहाल व्यापार करीब 132 बिलियन डॉलर का है। वह कहता है 2030 तक इसे 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचा देंगे। आशय यह है कि अगर बात मान ली, तो शायद टैरिफ की मार हलकी हो जाए। नहीं तो लगेंगे सैंक्शंस।

पर्दे के पीछे का खेल: जहां तक रूस से तेल खरीदने का सवाल है, भारत इससे समझौता नहीं करेगा। रूस से तेल भी आएगा और हथियार भी। भारत पर सैंक्शंस तब लगेंगे जब पहले रूस पर नए सैंक्शंस लगें। अभी ट्रंप डांवाडोल हैं। एक-आध दिन में उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ मॉस्को में होंगे। पर्दे के पीछे दोनों महाशक्तियां एक दूसरे से उलझना नहीं चाहतीं।

नौकरियों पर संकट: जहां तक 25% टैरिफ का सवाल है, इससे सबसे अधिक नुकसान गुजरात के हीरे-जवाहरात के व्यापारी, झींगा के आयात में लगे आंध्र प्रदेश और ओडिशा के सौदागरों को होगा। हजारों की तादाद में नौकरियां जा सकती हैं।

मुमकिन है भरपाई: इस नुकसान की भरपाई करने के कई तरीके हैं। एक तरीका छोटे उद्योगों को पांच साल तक ब्याज से मुक्त राशि निर्यात के लिए देकर हो सकता है। जो हमारा सर्विस सेक्टर है, उसकी निर्यात की राशि फिलहाल विश्व में 336 बिलियन डॉलर की है। इसमें अमेरिका का योगदान सिर्फ 14% है। यहां गुंजाइश है क्योंकि ये टैरिफ के बाहर है।

ना तुम जीते, न हम हारे: दूसरा उपाय यह हो सकता है कि भारत अमेरिका से ज्यादा सामान खरीदे। वह उस पर कम टैरिफ लगाकर ट्रंप को छाती ठोंकने का मौका भी दे सकता है। ये सेक्टर व्हिस्की, ऑटो आदि हो सकते हैं। जिन खाद्य पदार्थों पर हम 64% तक का टैरिफ लगाते हैं, जैसे बादाम, पिस्ता, दालें, कपास, सेब वगैरह-वगैरह, उन्हें कम कर सकते हैं। बदले में अगर वह भारत पर टैरिफ 25% से घटा देते हैं तो इससे ‘ना तुम जीते, ना हम हारे’ वाला समीकरण बन सकता है।

टैरिफ का असर: वैसे इस 25% टैरिफ को लेकर कुछ ज्यादा ही हाय-तौबा मची है। इससे बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। अगर टैरिफ इतना लगा तो देश की विकास दर 6.5 से घटकर 6.2% रह जाएगी। भारत और अमेरिका के संबंधों की उम्र भी ट्रंप की अवधि से आगे जानी है। और जिस तरह का ट्रंप का व्यक्तित्व है, यह 25% कोई पत्थर की लकीर नहीं है।

भारत के लिए मौका: भारत के लिए अपना घर ठीक करने का यह उपयुक्त मौका है। भारत को उन सेक्टरों पर ध्यान देना होगा, जिनके लिए विश्व को हमेशा उसकी जरूरत रहे। चीन ने ऐसा ही किया था। उसने 1990 से ही लिथियम और कोबाल्ट का खनन अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरीकी मुल्कों में शुरू किया। उसने उन टेक्नॉलजी पर ध्यान देना शुरू किया, जिसकी जरूरत तेजी से बदल रहे विश्व को पड़ने वाली थी। आज चाहे सौर विद्युत वाहन हों या दुर्लभ पृथ्वी खनिज (रेयर अर्थ मटीरियल) इसमें चीन की जरूरत पड़ती है। विश्व की 80% सामान्य दवाएं चीन के निर्यात किए गए कंपाउंड से बनती हैं। अमेरिका के F-35 जेट भी चीनी अलॉय से मिल के बनते हैं।

संभावनाएं कम नहीं: भारत को भी अपनी सोच आगे की रखनी होगी। टेक्नॉलजी में कुछ ऐसा खेल करना पड़ेगा जिससे भारत का दबदबा विश्व व्यापार में रहे। कई ऐसे सेक्टर हैं जिनमें काफी संभावनाएं हैं। समुद्री उत्पाद, कपड़े और पर्यटन में ग्रोथ की की काफी गुंजाइश है।

वैकल्पिक तिकड़ी: पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने एक बार कहा था- अमेरिका से दुश्मनी भारी होती है और दोस्ती जानलेवा। भारत के लिए चीन से संबंधों में सुधार अच्छा कदम है। विश्व के मानचित्र पर एक नजर डालें तो पता चल जाएगा कि रूस, चीन और भारत कितने बड़े देश हैं। ये अगर एक साथ हों, तो एक नए विश्व की संरचना संभव है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Ramswaroop Mantri

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