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*वैदिक दर्शन : विज्ञान- मान्य आयाम और बाद का मुकाम*

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    डॉ. विकास मानव

वैज्ञानिकों ने स्थान के तीन आयामों (लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई) के आलावा ‘काल’ को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार किया है। 

       आईन्स्टीन के ‘सापेक्षवाद’ के सिद्धान्त के अनुसार भौतिक जगत एक ‘संयुक्त चतुरविस्तारीय दिक्-काल जगत’ है जिसमें घटनाओं के बीच केवल एक ही अपरिवर्तनीय अंतर होता है और देश तथा काल में जो अलग-अलग अंतर दिखाई पड़ते हैं, वे वास्तव में  इसी अंतर के प्रक्षेप मात्र हैं। 

      ‘देश-अक्ष’ और ‘काल-अक्ष’ पर, दूसरे शब्दों में उनका मान निर्भर करता है उस विशेष ‘निर्देशांक पद्धति’ पर जिसके द्वारा उन्हें देखा जाय। देश और काल की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती और उसके परिणाम के बारे में बनने वाली धारणाएं देखने वाले की गति और स्थिति पर निर्भर करती है।

       इस सन्दर्भ में  आप उन अभागे व्यक्तियों के मामलों को समझने की कोशिश कीजिये जो देश और काल (space and time) के गड्ढों में पड़कर अदृश्य हो जाते हैं या फिर ऐसे किसी आयाम में पहुँच जाते हैं जहाँ का जीवन हमारे जीवन से सर्वथा भिन्न है।

     1957 में कैलिफोर्निया के डॉक्टर रॉबर्ट सिरगी और उनके सहयोगियों ने एक ऐसे कंप्यूटर का निर्माण करने का संकल्प किया था जो चौथे आयाम के स्वभाव और स्वरुप को समझाने में सहायक हो सके। उस अवसर पर डा. सिरगी ने कहा था-

       “हमारे बाहर जो जगत है, यहाँ गतियां उन दिशाओं में भी हो सकती हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते। पर जिन्हें काल परिवर्तन के रूप में ही हम जान सकते हैं। आदमी के सारे वैज्ञानिक नियम हमारे चारों ओर के  वास्तविक जगत की त्रि-आयामी छाया मात्र है। इन खण्ड और एकांगी नियमों के बल पर इस वास्तविक जगत के कार्य-कलापों को समझना कठिन है।”

      आप रोज धूप को देखते हैं पर वैज्ञानिकों से पूछिये तो वे कहेंगे कि धूप को कोई कभी भी नहीं देख सकता। उनकी भाषा में धूप सारे सौरमंडल की वर्णक्रम (सोलर स्पेक्ट्रम) है जो वास्तव में सूर्य द्वारा अंतरिक्ष में की गयी तरंगों और स्फुरणों की बौछार की विस्तृत पट्टी है। 

     यदि इस विस्तृत पट्टी को एक सप्तक मान लिया जाय तो इस पट्टी के जो रंग हमें आँखों से दिखाई देते हैं लाल से लेकर बैगनी तक, उन्हें सप्तक के अंतर के बीच का एक स्वरानुक्रम माना जा सकता है। अर्थात् धूप में ऐसे रंग भी मौजूद हैं जो हमे आँखों से कभी दिखाई नहीं देते। ऐसे रंगों की संख्या10 अरब के करीब है। हम तो केवल सात रंग ही देख पाते हैं धूप के।

       धूप में ‘इंफ्रा-रेड तरंगें’ भी होती हैं जिन्हें हम देख तो नहीं सकते पर अनुभव तो कर सकते हैं। धूप की जलन हमें इन्हीं तरंगों के कारण अनुभव होती है। अब विशेष फोटोग्राफिक फिल्मों की मदद से इंफ्रा-रेड के संसार की झांकी ली जा सकती है। उस दुनियां में आकाश , जल काले और घास तथा पत्तियां एकदम सफ़ेद दिखाई देती हैं।

       चूँकि इंफ्रा-रेड तरंगें दूरी के धुन्धलेपन को आसानी से काट सकती हैं, इसलिए उनका प्रयोग हवाई फोटोग्राफी में किया जाता है। पर जब इंफ्रा-रेड तरंगों की मदद से आकाश से क्यूबा में रखे प्रक्षेपास्त्रों के फोटो खींचे गए तो सिगरेटों के जलते हुए सिरों के फोटो भी आये। वे सिगरेटें जो प्रक्षेपास्त्रों के इंजीनियरों ने पिछली रात को पी थीं।

       हमारी आंखें वर्णक्रम की बहुत थोड़ी मात्रा ही देख पाती हैं। अनुवीक्षण यंत्र की मदद से हम अदृश्य जीवाणुओं की दुनियां की गतिविधि स्पष्ट देख सकते हैं। दुरबीन की मदद से हम अत्यंत दुरी पर स्थित नीहारिकाओं के दर्शन कर सकते हैं। इंफ्रा-रेड और ‘अल्ट्रा-वायलेट’ फोटोग्राफी की मदद से हम एक ऐसे अदृश्य जगत में पहुँच जाते हैं जो देश और काल की कक्षा से बाहर स्थित है। 

       इस अदृश्य जगत की और अधिक जानकारी अनेक रहस्यों को जिनमें अदृश्यता का रहस्य भी है, समझाने में सहायक होगी।

      सैद्धांतिक रूप से धूप की अदृश्य तरंगें हमारे शरीर, हमारे जीवन और यहां तक कि हमारी नियति को भी प्रभावित करती है । ‘प्रोपेगेशन ऑफ़ शार्ट रेडियो वेव्ज़’ नामक अपने शोध प्रबंध में हर्बर्ट गोल्ड स्टीन ने लिखा है कि वायुमंडल में जो दुनियां है वह अदृश्य प्राणियों की दुनियां है। वे प्राणी जो हमें नंगी आँखों से तथा सूक्ष्माति सूक्ष्म अनुवीक्षण यंत्रों की सहायता से भी नहीं दिखाई देते। उनकी वैज्ञानिक व्याख्या के लिए शोध होना आवश्यक है।

       हम और आप इस विवरण को पढ़ कर आसानी से यह अनुमान लगा सकते हैं कि वह परम तत्व परमात्मा कितना सूक्ष्म और कितना विस्तृत और कितना शक्तिशाली होगा जिसके अस्तित्व के भीतर ऐसे न जाने कितने ब्रह्याण्ड और उनके रहस्य विद्यमान हैं। मनुष्य जो ब्रह्माण्ड की सर्वश्रेष्ठ कृति है, उसके सामने मक्खी-मच्छर के बराबर भी नहीं है।

       दस अरब रंगों की तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता जो सूर्य की रश्मियों में से प्रकट होते हैं, गणना तो असंभव ही है। इन सब बातों को पढ़ कर लिखने वाले को झूठा कहते और उसकी बातों को यूँ ही हवा में उड़ाते देर नहीं लगेगी। 

      गीता में भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन को विश्व का बहुसंख्य वर्ग आज भी कपोल कल्पना या अतिशयोक्ति मानता है। स्वयं स्वामी दयानंद भी केवल कल्पना मानते हैं पर सोचने- विचारने की बात है कि हमारे आसपास के वातावरण में करोड़ों प्रकार के ऐसे जीव मौजूद हैं जिन्हें हम किसी प्रकार से नहीं देख सकते तो उस परमात्मा को इन नंगी आँखों या किसी यंत्र से कैसे देख सकते हैं? 

      धन्य है वह अर्जुन और उसका सामर्थ्य, वंदनीय है वह कि जिसने भगवान के उस विराट स्वरुप को देखा और विराटता तथा तेज को वह सहन कर गया.

Ramswaroop Mantri

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