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*पुरानी तस्वीर : मैं समय हूँ, कैद एक फ्रेम में!*

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डॉ. नेहा

  मैं एक पुरानी तस्वीर हूँ – काले-सफेद रंगों में ढली, किनारे पर हल्का-सा पीला पड़ चुका काग़ज़, और एक लकड़ी का जर्जर फ्रेम। वर्षों से दीवार पर टंगी हूँ, चुपचाप सब देख रही हूँ।
  मैं कोई सामान्य चित्र नहीं हूँ। मैं भावनाओं का संग्रह हूँ। मैं यादों की गठरी हूँ। मैं एक ऐसे क्षण की सजीव अभिव्यक्ति हूँ जो अब केवल अतीत में रह गया है — पर उस अतीत की साँसें आज भी मुझमें धड़कती हैं।

जब मैं जन्मी
साल था 1975। स्थान — एक छोटा-सा फ़ोटो स्टूडियो, जहाँ बैकग्राउंड के रूप में गुलाब के फूलों वाली बड़ी-सी चादर टंगी थी। फोटोग्राफर ने कैमरे के सामने बैठने के लिए सबको व्यवस्थित किया — माँ बीच में, पिता उनके पास, चार बच्चे उनकी गोद और कुर्सियों पर। सबसे छोटे बेटे को संभालना मुश्किल हो रहा था। बड़ी बहन की चोटी में रिबन बंधा था, और बाबा ने अपना कुरता ठीक करते हुए कहा, “जल्दी खींच लो बेटा, इतने समय तक सीधे बैठा नहीं जा सकता।”
और फिर — ‘क्लिक!’
मेरा जन्म हुआ। उस कैमरे की चमक में।

शुरुआती जीवन गौरव का प्रतीक
जब मुझे स्टूडियो से घर लाया गया और दीवार पर टांगा गया, तो पूरा घर खुशी से झूम उठा। मैं उस समय का गौरव थी — एक संयुक्त परिवार की सामूहिक पहचान।
मेरे सामने रोज़ पूजा होती, मेहमान आते तो मुझे दिखाते, और कहते — “देखिए, पूरा खानदान एक फ्रेम में है।”
पड़ोसी आकर मेरी तारीफ करते, बच्चे इशारा करके अपने आप को पहचानते — “ये मैं हूँ! देखो मेरी नाक कितनी छोटी थी!”
मैं हर दिन गर्व से चमकती थी, क्योंकि मैं उस समय की कहानी कहती थी जो सबने जिया था।

धीरे-धीरे समय बदला
कुछ वर्षों बाद, घर में बदलाव आया। बच्चे बड़े होने लगे, पढ़ाई के लिए शहर चले गए। माँ की गोद खाली हो गई, पिता की आँखों में इंतज़ार का सन्नाटा भर गया। घर में चहल-पहल कम होने लगी। पर मैं अब भी दीवार पर वैसे ही टंगी रही – उसी मुस्कान के साथ, उसी पुराने भावों के साथ।
फिर एक दिन माँ नहीं रहीं। मेरे नीचे चुपचाप दीया जलाया गया, पर कोई तस्वीर उतारी नहीं गई। मैं वहीं रही — माँ को लिए, सहेजे।

नए जमाने की नई तस्वीरें
अब दीवारों पर रंगीन तस्वीरें लगने लगीं — बच्चों की कॉलेज डिग्री, बेटे-बहू की शादी की फ़्रेम की गई फोटो, विदेश में पोते की ग्रेजुएशन सेरेमनी। मैं कोने की दीवार पर शिफ्ट कर दी गई। अब कोई मेरी ओर देखता भी नहीं।
पर मेरा वजूद कम नहीं हुआ। मैं अब भी उतनी ही ज़िंदा थी — उस एक क्षण में जमी हुई, जिसमें एकता, प्रेम और अपनापन था।

अब मेरी हालत
आज मेरी फ्रेम टूटी हुई है, काँच थोड़ा दरक चुका है। मुझे छूने से डर लगता है कि कहीं पुराना कागज टूट न जाए। लेकिन मेरे भीतर की भावनाएँ कभी नहीं टूटीं।
कभी-कभी दादी आकर मुझे देखती हैं, आँखें नम हो जाती हैं। वह उँगली रखती हैं तस्वीर पर — “ये तेरे ताऊ जी हैं, जो अब नहीं रहे। ये देख, ये मैं और तेरे दादा जी…!”
मैं उनकी आँखों में अपने होने की पुष्टि देखती हूँ।

नई पीढ़ी की नजर से
पोते-पोती अब मुझे अजीब नज़रों से देखते हैं — “कितनी पुरानी फोटो है! सब ब्लैक एंड वाइट!”
हाँ बच्चों, मैं काले-सफेद में हूँ, पर मेरी भावनाएँ इंद्रधनुषी हैं।
तुम्हारी तस्वीरें आज मोबाइल में हैं — हज़ारों, लाखों। लेकिन उनमें आत्मीयता कम है। मैं अकेली हूँ, पर पूरी दुनिया सहेजे हुए हूँ।

मैं सिर्फ एक चित्र नहीं
मैं वह पल हूँ जहाँ सभी एक साथ थे। मैं वह हँसी हूँ जो अब सिर्फ स्मृति में रह गई। मैं वो समय हूँ जब ‘हम’ था — न ‘मैं’, न ‘तू’।
मैं वह गवाह हूँ जिसने उस परिवार को एकजुट देखा, प्रेम में जीते हुए देखा, कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ निभाते देखा।
मैं यादों की थाती हूँ. हर बूढ़े चेहरे में मेरी कोई छवि बसती है। हर बच्चे के बचपन की हँसी मैंने सहेजी है।
जब कोई परिजन परदेश से आता है, और मुझे देखकर चौंकता है — “अरे! ये तो वही फोटो है!”, तब मेरी आत्मा पुलकित हो उठती है।

मेरी पीड़ा :
अब मैं अक्सर अकेली रहती हूँ। दीवार के कोने में, धूल से ढँकी। कोई मेरी ओर नहीं देखता। सबको जल्दी है — स्मार्टफोन, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम…
कभी लगता है, कोई मुझे अलमारी में रख देगा, या फेंक देगा। पर मेरी आत्मा तो जिंदा रहेगी न? उस कमरे में, उस परिवार में, उस रिश्ते में जो अब शायद केवल तस्वीरों तक सिमट गया है।

मेरा स्वाभिमान
मैं अब भी गर्व से कह सकती हूँ —
“मैं वह तस्वीर हूँ जिसमें पूरा परिवार एकसाथ था।
जहाँ किसी को जल्दी नहीं थी, किसी को शिकायत नहीं थी।
मैं भावनाओं की जीवंत प्रतिमा हूँ।”
काश, कोई दिन ऐसा हो जब सब एक बार फिर मेरी ओर देखें — बैठें, बातें करें, कहें – “चलो, फिर से एक ऐसी तस्वीर खिंचवाते हैं।”
काश, तस्वीरें केवल कैमरे से नहीं, रिश्तों से खिंची जाएँ।

मैं एक पुरानी तस्वीर हूँ — पीले काग़ज़ में बसी अमिट स्मृति।
मैं समय की वह विरासत हूँ जो दिखती नहीं, पर जी जाती है।
भले ही मेरी फ्रेम टूटे, किनारे फट जाएँ,
पर मैं हर दिल में अब भी एक पूरा संसार हूँ।

Ramswaroop Mantri

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