जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लोकसभा में एक्शन हो गया है। ओम बिरला ने जज वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब उनके पास महाभियोग का सामना करने या इस्तीफा देने का ही विकल्प बचता है।
अगर जस्टिस वर्मा खुद अपने पद से इस्तीफा देते हैं तो वह महाभियोग का सामना करने से बच जाएंगे। साथ ही उन्होंने रिटायर्ड जज के तौर पर पेंशन भी मिलेगी। लेकिन जस्टिस वर्मा को अगर महाभियोग के जरिए पद से हटाया जाता है तो उन्हें पेंशन और अन्य लाभ नहीं मिल सकेंगे।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने महाभियोग की दिशा में पहला कदम उठा लिया। ओब बिरला ने संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में मंगलवार को जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने के प्रस्ताव को स्वीकार किया। जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच करने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन भी कर दिया। लोकसभा में उन्होंने नाम बता दिया कि कौन-कौन जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड की पूरी जांच करेंगे। अब सवाल है कि आखिर महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में मंजूर तो हो गया, मगर अब आगे क्या होगा। क्या है महाभियोग चलाने के लिए संसद में आगे की पूरी प्रक्रिया। क्या अब भी जज यशवंत वर्मा के पास महाभियोग से बचने का ऑप्शन है?
दरअसल, जस्टिस यशवंत वर्मा अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज हैं। जब कैश कांड हुआ था, तब वह दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे। जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मंगलवार यानी 12 अगस्त 2025 को मंजूरी दी। यह प्रस्ताव 145 लोकसभा सांसदों और 63 राज्य सभा सांसदों के हस्ताक्षर के साथ पेश किया गया था। इसमें सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के सांसद शामिल थे। इस कदम के बाद जस्टिस वर्मा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अब उनके खिलाफ महाभियोग चलेगा।
अगर उनके खिलाफ महाभियोग साबित हो जाता है तो फिर उनकी मुसीबत और बढ़ जाएगी। 14 मार्च को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास से जली और अधजले नोट मिले थे। उनके ऊपर कदाचार और भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अब जब लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया तो फिर अब इस प्रक्रिया का अगला चरण क्या होगा, और क्या जस्टिस वर्मा के पास इससे बचने का कोई रास्ता है?
पहला चरण: लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया। आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।
दूसरा चरण: अब यह जांच समिति अपनी जांच के आधार पर रिपोर्ट पेश करेगी।
तीसरा चरण: इसके बाद लोकसभा में समिति की रिपोर्ट स्वीकार की जाएगी।
चौथा चरण: रिपोर्ट स्वीकार करने के बाद सदन में इस पर चर्चा होगी और फिर जस्टिस वर्मा को सफाई का मौका भी दिया जाएगा।
पांचवां चरण: लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित होने के बाद यह प्रस्ताव राज्य सभा जाएगा।
छठा चरण: राज्य सभा में प्रस्ताव पर चर्चा होगी। यहां भी जस्टिस वर्मा को सफाई देने का मौका मिलेगा।
सातवां चरण: अगर अगर पारित किया जाता है तो जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को संसद की मंजूरी मिल जाएगी।
जस्टिस यशवंत वर्मा के पास अब एक ही ऑप्शन है। या तो चुपचाप महाभियोग का सामना करें या फिर इस्तीफा दे दें। इस्तीफा देने का विकल्प उनके पास तब तक खुला है, जब तक संसद के दोनों सदनों से महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो जाता। अगर जस्टिस वर्मा दोनों सदनों में किसी भी सदन में सफाई देने के वक्त अपना इस्तीफा देते हैं यानी त्यागपत्र का ऐलान करते हैं तो यह प्रक्रिया स्वत: रुक जाएगी।
अगर वह इस्तीफा देते हैं तो जस्टिस वर्मा फायदे में रहेंगे। इससे रिटायर के बाद के उनके लाभ बने रहेंगे। उन्हें पेंशन और ग्रैचुएटी मिलेगी। अगर जस्टिस यशवंत वर्मा ऐसा नहीं करते है और उनके खिलाफ प्रस्ताव पारित हो जाता है तो उन्हें मिलने वाले सारे लाभ भी पद से हटाने के साथ ही खत्म हो जायेंगे।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार, हाई कोर्ट के जज जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव, और सीनियर अधिवक्ता वीबी आचार्य शामिल हैं। यह समिति जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करेगी और तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंपेगी। जांच समिति का काम जस्टिस वर्मा के आचरण, खासकर उनके आवास से बरामद नकदी के मामले की गहन जांच करना होगा।
कानूनी जानकारों के मुताबिक अगर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी जज पर भ्रष्टाचार या कदाचार के आरोप हैं तो वह आंतरिक जांच रिपोर्ट के साथ किसी भी सदन में सांसदों के सामने अपना पक्ष रखते हुए इस्तीफे का ऐलान कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनके मौखिक बयान को ही उनका इस्तीफा माना जाएगा।





