पटना : बिहार SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार अंतरिम आदेश जारी कर दिया है । यह आदेश चुनाव आयोग (ECI) के ज़िद्दी रवैये को ख़ारिज करता है , जिसने कोर्ट की पहले दी गई सलाहों पर ध्यान देने से इनकार कर दिया था , जो इस अभियान के क्रियान्वयन से जुड़े तीन अहम मुद्दों को संबोधित करता है । SIR की वैधता का सवाल अब भी सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है ।
माले महासचिव ने कहा कि आदेश में चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया है कि
सभी नाम विलोपनों (deletions) का स्पष्ट कारण दर्ज कर सार्वजनिक करे ।
यह जानकारी सभी मतदाताओं के लिए सुलभ हो (सिर्फ़ राजनीतिक दलों के बीएलए के माध्यम से नहीं) । आधार कार्ड को वैध सहायक दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करे ।
कामरेड दीपंकर ने कहा कि यह आदेश , SIR के अचानक लागू होने के दिन से ही उठाई गई हमारी बुनियादी आपत्तियों और आशंकाओं को सही साबित करता है । बिहार के मंटू पासवान जैसे मतदाता , जिन्हें SIR ने “मृत” घोषित कर दिया था , उनके लिए यह मतदाता के तौर पर ज़िंदगी का दूसरा अवसर है । लेकिन उन 35 लाख प्रवासी मज़दूरों का क्या , जिनके नाम प्रारूप मतदाता सूची से हटा दिए गए ? पीड़ितों पर सुधार के लिए शिकायत दर्ज कराने का बोझ डालने की बजाय क्या चुनाव आयोग को बूथ और प्रखंड स्तर पर शिकायत-निवारण और त्रुटि-सुधार शिविर आयोजित नहीं करने चाहिए ?
उन्होंने कहा कि बहिष्कार का पैमाना बहुत बड़ा है । समय बेहद कम है और अधिकांश मतदाताओं को बिना किसी गलती के नाहक दंडित किया गया है । त्रुटियों के सुधार का दायित्व भी उनपर ही डाला जाना चाहिए , जिन्होंने ये गलतियां की हैं । यही है न्याय , निष्पक्षता और पारदर्शिता का वह सिद्धांत , जिसका हवाला चुनाव आयोग ने स्वयं 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने प्रत्युत्तर हलफ़नामे में SIR के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में दिया था ।





