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*3000 बीघा जमीन पर विवाद: विकास, क़ानून और आदिवासी अधिकारों की कसौटी*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          गौतम अडानी पर भाजपा सरकार इतनी मेहरबान क्यों है? क्या देश में सरकार चलाने का मतलब सिर्फ़ अडानी को फ़ायदा पहुँचाना है? शायद भाजपा नेता अब इस नतीजे पर पहुँच गए हैं कि अगर नरेंद्र मोदी को खुश करना है, तो सबसे सीधा रास्ता अडानी की सेवा करना है। यही वजह है कि कुछ हवाई अड्डे अडानी को दिए जा रहे हैं, कुछ बंदरगाह, कुछ खनन क्षेत्र और अब ज़मीन भी। पहले सरकार ने अमेरिका से अडानी सामू भेजा, ज़मीन दबा दी गई, उसकी अनदेखी की गई और अब असम में हेमंत विश्व शर्मा की सरकार ने अडानी की सीमेंट कंपनी को 3000 बीघा ज़मीन देने का फ़ैसला किया है।

          सवाल ये है कि क्या सरकार अब पूरे देश को अडानी के हवाले करना चाहती है? आख़िर अडानी के नाम पर इतनी बाढ़ क्यों आई हुई है? आम आदमी से जुड़ी योजनाओं में फंड की कटौती की जा रही है, गरीबों की ज़मीन के नाम पर विकास का पैसा हड़पा जा रहा है। लेकिन अडानी को देने के लिए ज़मीन और संसाधनों की कोई कमी नहीं है। क्या इसीलिए हिमंत बिस्वा शर्मा रोज़ मुसलमानों पर बयान देते रहते हैं ताकि लोगों का ध्यान असली मुद्दों से भटका सकें? ताकि लोग इस बात पर बहस कर सकें कि किस अपराध में किसका योगदान है? लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि आदिवासियों की ज़मीनें पर्दे के पीछे एक कॉरपोरेट को दी जा रही हैं।

          क्या ये सब जानबूझकर किया जा रहा है? ताकि अमेरिका से आने वालों को भी दबाया जाए और ज़मीन के सौदे भी चलते रहें। वो भी जनता की नज़रों से छिपे रहें। असम में भाजपा सरकार ने अडानी की सीमेंट कंपनी को 3000 बीघा ज़मीन देने का फ़ैसला किया है।हिमंत बिस्वा शर्मा की सरकार ने यह ज़मीन अडानी की सीमेंट कंपनी को देने का फ़ैसला किया है, जिसकी सुनवाई अब अदालत तक पहुँच गई है। अदालत में जब यह फ़ैसला सुनाया गया, तो ख़ुद जज संजय कुमार मेहदी भी हैरान रह गए। 3000 बीघा सुनते ही उन्होंने टिप्पणी की, “यह तो पूरा ज़िला देने जैसा है।”

          सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी ज़मीन एक निजी कंपनी को कैसे दी जा रही है? वो भी तब जब ज़मीन पर दावा आदिवासी समुदाय कर रहा है। जजों ने अदालत को बताया कि सरकार जो ज़मीन ले रही है, वो आदिवासियों की ज़मीन है और ये फ़ैसला लिया गया है। सरकार उनसे ज़मीन ले रही है। उनका कहना है कि कंपनियों को यह ज़मीन देना आदिवासियों के अधिकारों और आजीविका पर सीधा हमला है। अब सरकार कॉर्पोरेट कंपनियों को खुश करने के लिए ज़मीन छीनकर निजी हाथों में दे रही है। इस पर हाईकोर्ट के जज भी हैरान हैं।        उन्होंने टिप्पणी की कि यह एक पूरा ज़िला है जो इस अडानी को दिया जा रहा है। क्या अब इस देश में आदिवासी समुदाय का कोई अधिकार नहीं बचा? क्या विकास का मतलब यह है कि ज़मीन पर ग़रीबों और कम आय वालों, अमीरों और कॉर्पोरेट्स को ज़मीन मिलती रहे? अदालत ने सरकार से इस पूरे फ़ैसले पर विस्तृत जवाब माँगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या अब भाजपा का सत्तारूढ़ राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर नियंत्रण हो गया है?

          अगर उन्हें नरेंद्र मोदी को खुश करना है, तो रास्ता अडानी के दरवाज़े से होकर जाता है। क्या यही अडानी भक्ति अब प्रशासन का नया मॉडल बन गई है? एक तरफ़, अडानी समुदाय के लिए अमेरिका से समन भेजा जा रहा है। लेकिन समन अभी तक उन तक नहीं पहुँचा है। कोई कार्रवाई नहीं होती, कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता। और दूसरी तरफ़, अडानी समुदाय को धीरे-धीरे देश की सारी सुविधाएँ दी जा रही हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार पूरे देश को अडानी देना चाहती है? अडानी पर इतनी मेहरबानी क्यों? क्या सरकार में बैठे लोग जनता की बजाय कॉर्पोरेट घरानों के प्रतिनिधि बन गए हैं? ज़मीन आदिवासियों की आजीविका का साधन है।

          यह उनके पूर्वजों की पहचान है। क्या किसी सरकार को यह अधिकार है कि वह इसे उनसे छीनकर अमीरों की हवेली बना दे? और जिस तरह से 3000 एकड़ ज़मीन का नाम सुनकर खुद जज साहब हैरान रह गए। कांग्रेस नेता अतुल लोंडे पाटिल लिखते हैं कि असम सरकार ने अडानी सीमेंट के लिए 3000 एकड़ ज़मीन देने का फ़ैसला किया। मामला जब हाईकोर्ट पहुँचा तो जज हैरान रह गए। 3000 एकड़ ज़मीन आदिवासियों की है। ये कैसा फ़ैसला है? हेमंत बिस्वा शर्मा मुसलमानों को भड़काने वाले बयान देते रहते हैं।

          धर्म और जाति की बहसों में लोग उलझे हुए हैं। लेकिन क्या ये सब इसलिए किया जा रहा है ताकि अडानी जैसे उद्योगपतियों की ज़मीन पीछे से दी जा सके? ताकि लोगों का ध्यान असली मुद्दों से भटक जाए और कॉर्पोरेट डील पर कोई चर्चा ही न हो। क्या यही है सबका साथ, सबका विकास? मोदी सरकार और उसके मुख्यमंत्री को जवाब देना चाहिए। क्या ये सौदा सिर्फ़ उद्योगपतियों के लिए है? क्या गरीब, आदिवासी, किसान, आम आदमी सिर्फ़ वोट देने के लिए बचा है? क्या यही भारत का नया मॉडल है जहाँ आदिवासियों द्वारा इकट्ठा की गई ज़मीन अडानी के नाम लिख दी जाती है? 3000 एकड़ ज़मीन का नाम सुनकर जज संजय कुमार मेहदी भी हैरान रह गए। जिसे आदिवासियों से छीनकर अडानी को दिया जा रहा है। फ़िलहाल, हाईकोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई में साफ़ हो जाएगा कि सरकार ने अडानी सीमेंट को 3000 एकड़ ज़मीन किन क़ानूनी आधारों पर देने का फ़ैसला किया है (https://youtu.be/nQ3H7VGeoPU?si=hiKhKEG76007q4pm)

          इस मामले से जुड़े कुछेक तथ्यों को निम्नानुसार हैं, जिन्हें यहाँ आपकी और जानकारी के लिए यहां दिया जा रहा है। भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा केवल काग़ज़ी नियमों का ढेर भर नहीं है; इसकी असली आत्मा उन समुदायों के अधिकारों और सहभागिता में छिपी है, जो सदियों से इस भूमि पर रहते आए हैं। आदिवासी समाज इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। उनकी ज़मीनें, जंगल, नदियाँ और पहाड़ियाँ केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और आजीविका के स्रोत हैं। लेकिन जब इन्हीं भूमि–संसाधनों पर कॉर्पोरेट हितों के लिए बड़े पैमाने पर कब्ज़ा या हस्तांतरण किया जाता है, तो प्रश्न उठता है कि विकास की परिभाषा किसके लिए है—जनता के लिए या उद्योगपतियों के लिए?

          असम के दिमा हासाओ ज़िले में 3000 बीघा भूमि को एक निजी सीमेंट कंपनी के हवाले किए जाने का मामला केवल “एक औद्योगिक सौदा” नहीं है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी है कि भारतीय लोकतंत्र अपने सबसे वंचित समुदायों—आदिवासियों और चाय–जनजातियों—के अधिकारों की रक्षा कर पा रहा है या नहीं। इस विवाद ने न केवल न्यायपालिका को चौंकाया है, बल्कि यह भी उजागर किया है कि किस प्रकार धर्म–जाति की राजनीति के शोर में असली मुद्दे, जैसे भूमि अधिकार और विस्थापन, अक्सर हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं।

मामला क्या है—और क्यों बड़ा है:

          गुवाहाटी हाईकोर्ट के समक्ष दिमा हासाओ की पहाड़ी पट्टी में 3000 बीघा भूमि के औद्योगिक उपयोग पर चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय कुमार मेहदी ने असाधारण रूप से बड़े क्षेत्र पर टिप्पणी करते हुए जिलास्तरीय व्यापकता की ओर इशारा किया और स्वायत्त परिषद से पूरा अभिलेख मांगा। अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी ज़मीन के आवंटन में तथ्य और प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।

क़ानूनी पृष्ठभूमि: छठी अनुसूची, पर्यावरण और अधिग्रहण

1.   छठी अनुसूची और भूमि का स्वशासन – यहाँ स्वायत्त ज़िला परिषदों को भूमि-उपयोग, वन, स्थानीय रीति-रिवाज और संसाधनों पर महत्वपूर्ण अधिकार हैं।

2.   वन-अधिकार कानून (FRA), 2006 – आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत व सामुदायिक अधिकारों को सुरक्षित करता है।

3.   पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) – खनन/सीमेंट जैसी परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक सुनवाई और पर्यावरणीय प्रबंधन योजना अनिवार्य है।

4.   भूमि अधिग्रहण अधिनियम (LARR, 2013) – निजी परियोजनाओं हेतु सामाजिक प्रभाव आकलन और प्रभावित परिवारों की सहमति आवश्यक है।

आदिवासी समुदायों की विविध समस्याएँ

·         भूमि-अधिकार और विस्थापन – आजीविका, खेती, वन-उत्पाद और सांस्कृतिक पहचान का सीधा नुकसान।

·         पर्यावरणीय संकट – जलस्रोतों, जंगलों और वन्यजीव गलियारों पर असर।

·         सहमति और भागीदारी का अभाव – ग्राम सभाओं और परिषदों की औपचारिक अनदेखी।

·         चाय-जनजातियों की दुर्दशा – शिक्षा, स्वास्थ्य और मजदूरी से जुड़ी पुरानी समस्याएँ।

·         बेदखली का दबाव – “अवैध अतिक्रमण” हटाने की कार्यवाही से हजारों परिवार प्रभावित।

भ्रम और तथ्य

शुरुआत में इस विवाद को “अडानी” से जोड़ा गया और भूमि के आकार को “एकड़” बताया गया, जबकि अदालत के रिकॉर्ड में यह बीघा और कंपनी का नाम महाबल सीमेंट है। ऐसे भ्रम असली मुद्दे—आदिवासी अधिकार और क़ानूनी

पारदर्शिता—से ध्यान हटाते हैं।

आगे का रास्ता क्या हो?

·         भूमि का रिकॉर्ड और एमओयू सार्वजनिक हों।

·         FRA और LARR का अक्षरशः पालन किया जाए।

·         स्वायत्त परिषद और ग्राम सभाओं की वास्तविक सहमति ली जाए।

·         पर्यावरणीय शर्तों को सख्ती से लागू किया जाए।

·         पुनर्वास और लाभ-साझेदारी सुनिश्चित की जाए।

दिमा हासाओ की 3000 बीघा ज़मीन का विवाद केवल “किसे दी” तक सीमित नहीं है; यह कैसे दी जा रही

मामला क्या है—और क्यों बड़ा है

गुवाहाटी हाईकोर्ट के समक्ष दिमा हासाओ की पहाड़ी पट्टी में 3000 बीघा (लगभग 4.0 वर्ग किमी) भूमि के

औद्योगिक उपयोग पर चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय कुमार मेहदी ने असाधारण रूप से बड़े क्षेत्र पर टिप्पणी करते हुए जिलास्तरीय व्यापकता की ओर इशारा किया और स्वायत्त परिषद (NCHAC)

से पूरा अभिलेख मांगा। अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी ज़मीन के आवंटन में तथ्य और प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। यह ज़मीन पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील उमरांग्सो–छतर गांव क्षेत्र में बताई गई, जहाँ सीमेंट–चूना पत्थर आधारित परियोजनाएँ दशकों से विवाद का कारण रही हैं। The Times of IndiaThe Economic TimesLive Law

ध्यान रहे: कई जगह “एकड़” लिखा गया, जबकि अदालत के रिकॉर्ड में बीघा का ही उल्लेख है; इसी आधार पर क्षेत्रफल का आकलन ~4.0 वर्ग किमी निकलता है। Live LawThe Times of India

क़ानूनी पृष्ठभूमि: छठी अनुसूची, पर्यावरण और अधिग्रहण

1.   छठी अनुसूची और भूमि का स्वशासन: दिमा हासाओ जैसा क्षेत्र भारत के संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आता है। यहाँ स्वायत्त ज़िला परिषदों को भूमि-उपयोग, वन, स्थानीय रीति-रिवाज और संसाधनों पर महत्वपूर्ण अधिकार हैं। अतः किसी भी बड़े आवंटन/इस्तीमाल में परिषद की कानून-सम्मत भूमिका, ग्राम/परंपरागत संस्थाओं से परामर्श और अभिलेखीय पारदर्शिता अनिवार्य हैं। MEA Indiaassam.gov.in

2.   वन-अधिकार कानून (FRA), 2006: यह कानून आदिवासी व अन्य पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत व सामुदायिक (CFR) अधिकारों को मान्यता देता है—ईंधन-चारा, छोटे वन-उत्पाद, आजीविका, संस्कार स्थलों से लेकर सामुदायिक वनों पर अधिकार तक। कई अध्ययनों में असम सहित पूर्वोत्तर में CFR की पहचान/मान्यता धीमी बताई गई है—ऐसे में किसी परियोजना से पहले FRA-अनुपालन, दावों का निपटारा और ग्राम-सभाओं की विधिवत भागीदारी एक वैधानिक कसौटी है। tribal.nic.inMongabay-India

3.   EIA नियम (पर्यावरणीय अनुमोदन): सीमेंट/खनन जैसी परियोजनाएँ पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) के दायरे में आती हैं। सार्वजनिक सुनवाई, विस्तृत पर्यावरण प्रबंधन योजना, और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष शर्तें—ये सभी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उमरांग्सो जैसे ‘हॉटस्पॉट’ में यह और भी सख्ती से लागू होना चाहिए। Environment ClearanceLive Law

4.   भूमि अधिग्रहण का सामान्य ढाँचा (LARR, 2013): निजी/पीपीपी परियोजनाओं के लिए व्यापक सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट और बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों की पूर्व-सहमति (सामान्यतः पीपीपी में 70% व निजी में 80%) जैसे प्रावधान हैं। हालाँकि छठी अनुसूची क्षेत्रों में परिषद-संबद्ध व्यवस्था और राज्य-स्तरीय अपवाद/संशोधन प्रक्रियागत जटिलता पैदा कर सकते हैं—इसीलिए “कौन-सा कानून/कौन-सी प्रक्रिया” लागू होगी, इसे अदालतें/प्राधिकार अक्सर केस-टू-केस स्पष्ट करती हैं। PRS Legislative Research

आदिवासी समुदायों की विविध, परस्पर जुड़ी समस्याएँ:

(क) भूमि-अधिकार और विस्थापन: पहाड़ी/वनवासी समुदायों की आजीविका खेती, झूम, पशुपालन, लघु वन-उत्पाद, नदी–झरने और सामुदायिक वनों पर टिकी होती है। बड़े पैमाने पर भूमि-हस्तांतरण, खनन, बाँध या औद्योगिक परियोजनाएँ आवास–जीविका–संस्कृति की सततता को सीधे प्रभावित करती हैं। FRA के तहत सामुदायिक अधिकारों की पहचान/नक़्शेबंदी (CFR मैपिंग) अधूरी रह जाए तो विस्थापन के नुकसान कई गुना बढ़ जाते हैं। tribal.nic.inMongabay-India

(ख) पर्यावरण–जीविका का द्वंद्व: उमरांग्सो–छतर गांव जैसी घाटियों में खनन/सीमेंट संयंत्र जलस्रोतों, पहाड़ी वनस्पतियों, वन्य जीव गलियारों और खेत–चरागाह पर असर डालते हैं। यही कारण है कि अदालतें बड़े भू-आवंटन और पर्यावरणीय मंज़ूरी—दोनों की जांच में सतर्क रुख अपनाती हैं। Live Law

(ग) स्वायत्त परिषद और समुदाय की ‘सहमति’: छठी अनुसूची क्षेत्रों में ज़िला परिषदों के साथ ग्राम-स्तर/परंपरागत संस्थाओं की भागीदारी—केवल औपचारिक नहीं, वास्तविक हो—यह दिल की बात है। दस्तावेज़ों, एमओयू और सुनवाई की प्रक्रिया स्थानीय भाषाओं में, खुले मंचों पर और समय पर हो, तभी समुदाय भरोसा करता है। MEA India

(घ) चाय-जनजाति/टी-ट्राइब्स की अलग लेकिन समानांतर चुनौतियाँ: असम के बड़े हिस्से में ‘टी-ट्राइब्स’—जिन्हें राज्य में सार्वभौमिक रूप से ST दर्जा नहीं मिला—कम मज़दूरी, शिक्षा–स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और बुनियादी सेवाओं के अभाव से जूझते हैं। CAG के ऑडिट और ऑक्सफैम की रिपोर्टें बताती हैं कि योजनाएँ अक्सर बिना आधारभूत आँकड़ों के चलती रहीं और मजदूर–बस्तियों की स्थितियाँ बेहद कठिन हैं। “आदिवासी” विमर्श में इन समुदायों की आवाज़ जोड़ना नीतिगत रूप से अनिवार्य है। Comptroller and Auditor General of Indiaruralindiaonline.org

(ङ) एविक्शन–रेसेटलमेंट का दबाव: राज्य में समानांतर रूप से “अवैध अतिक्रमण” हटाने के अभियानों ने हज़ारों परिवारों को प्रभावित किया है। नीति-निर्माण का संतुलन यही है कि पर्यावरण/वन की सुरक्षा करते हुए FRA के संरक्षित अधिकारों और मानवीय पुनर्वास सिद्धांतों से समझौता न हो। The Times of India

भ्रम कैसे पैदा हुआ—और उससे सीख क्या

          कई प्रारम्भिक पोस्टों में “अडानी” का नाम, “3000 एकड़” जैसी त्रुटियाँ और असंगत विवरण साथ–साथ चले। अदालत के रिकॉर्ड और विश्वसनीय रिपोर्टों में महाबल सीमेंट का संदर्भ है; अडानी समूह ने भी निर्दिष्ट मामले से दूरी का औपचारिक बयान दिया। सामाजिक माध्यमों के दौर में तथ्य–जांच के बिना “लैंड ग्रैब” जैसे बड़े आरोप विश्वसनीयता खो बैठते हैं और असली मुद्दा—प्रक्रियात्मक पारदर्शिता व आदिवासी अधिकार—हाशिये पर चला जाता है। Live Law+1NewslaundryAdani

है, किस अधिकार–क़ानून के तहत दी जा रही है, और किसकी कीमत पर दी जा रही है—इन मूल प्रश्नों की परीक्षा है। छठी अनुसूची, FRA, EIA और (जहाँ लागू) LARR जैसे ढाँचों का उद्देश्य ही यही है कि विकास मानवाधिकार और प्रकृति के संतुलन में हो—विशेषकर वहाँ, जहाँ समुदायों की पहचान और आजीविका भूमि–वन से अभिन्न है। अदालत की सख़्त पूछताछ और सार्वजनिक विमर्श, दोनों मिलकर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि विकास का अर्थ समुदायों के अधिकारों का ह्रास नहीं, बल्कि उनके साथ साझेदारी हो।

MEA Indiatribal.nic.inEnvironment ClearancePRS Legislative Research)

          असम की 3000 बीघा भूमि का विवाद यह स्पष्ट करता है कि विकास और अधिकारों के बीच संतुलन बनाना अब सिर्फ़ नीतिगत सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र के अस्तित्व का प्रश्न है। आदिवासी समुदायों की भूमि छीनकर अगर विकास की गाड़ी आगे बढ़ाई जाएगी, तो यह विकास अंततः असमानताओं और असंतोष का ही उत्पादन करेगा। अदालत की टिप्पणियाँ इस बात का संकेत हैं कि न्यायपालिका अब भी संविधान की मूल भावना—न्याय और समानता—को जीवित रखे हुए है।

        आवश्यक है कि सरकारें समझें: विकास का अर्थ केवल औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज के सबसे पिछड़े तबकों को भी उस प्रक्रिया का बराबर का साझेदार बनाना है। छठी अनुसूची, वन-अधिकार क़ानून और पर्यावरणीय नियम कोई बाधा नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के उपकरण हैं कि विकास स्थायी, न्यायसंगत और मानव-केंद्रित हो।

          यदि आज हम आदिवासियों की भूमि, आजीविका और संस्कृति की अनदेखी करेंगे, तो यह केवल संवैधानिक मूल्यों के साथ विश्वासघात नहीं होगा, बल्कि राष्ट्र की विविधता और सामाजिक संतुलन को भी कमजोर करेगा। इसलिए असम का यह प्रकरण हमें चेतावनी देता है कि विकास का रास्ता केवल कॉर्पोरेट गलियारों से होकर नहीं गुजरना चाहिए, बल्कि ग्राम-सभाओं, परिषदों और स्थानीय समुदायों की सामूहिक सहमति से ही प्रशस्त होना चाहिए। तभी लोकतंत्र की जड़ें गहरी और सशक्त रहेंगी।

(टिप्पणी: ऊपर दिए गए तथ्य अदालत के रिकॉर्ड/विश्वसनीय रिपोर्टों पर आधारित हैं; प्रकरण विचारणाधीन है। अंतिम निष्कर्ष न्यायालय/प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ व दलीलों पर निर्भर रहेगा। Live Law)

        सारांशत: असम की 3000 बीघा भूमि का विवाद यह स्पष्ट करता है कि विकास और अधिकारों के बीच संतुलन बनाना अब सिर्फ़ नीतिगत सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र के अस्तित्व का प्रश्न है। आदिवासी समुदायों की भूमि छीनकर अगर विकास की गाड़ी आगे बढ़ाई जाएगी, तो यह विकास अंततः असमानताओं और असंतोष का ही उत्पादन करेगा। अदालत की टिप्पणियाँ इस बात का संकेत हैं कि न्यायपालिका अब भी संविधान की मूल भावना—न्याय और समानता—को जीवित रखे हुए है। आवश्यक है कि सरकारें समझें: विकास का अर्थ केवल औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज के सबसे पिछड़े तबकों को भी उस प्रक्रिया का बराबर का साझेदार बनाना है। छठी अनुसूची, वन-अधिकार क़ानून और पर्यावरणीय नियम कोई बाधा नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के उपकरण हैं कि विकास स्थायी, न्यायसंगत और मानव-केंद्रित हो।

          यदि आज हम आदिवासियों की भूमि, आजीविका और संस्कृति की अनदेखी करेंगे, तो यह केवल संवैधानिक मूल्यों के साथ विश्वासघात नहीं होगा, बल्कि राष्ट्र की विविधता और सामाजिक संतुलन को भी कमजोर करेगा। इसलिए असम का यह प्रकरण हमें चेतावनी देता है कि विकास का रास्ता केवल कॉर्पोरेट गलियारों से होकर नहीं गुजरना चाहिए, बल्कि ग्राम-सभाओं, परिषदों और स्थानीय समुदायों की सामूहिक सहमति से ही प्रशस्त होना चाहिए। तभी लोकतंत्र की जड़ें गहरी और सशक्त रहेंगी।

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Ramswaroop Mantri

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