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*कोइराला के समर्थन में डा लोहिया के नेतृत्व में प्रदर्शन*

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25मई1949को दिल्ली के कनॉट प्लेस में लोहिया जी के नेतृत्व में, नेपाल की राणाशाही के अत्याचारों के विरोध में नेपाल कांग्रेस के लोकप्रिय नेता विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला के आमरण अनशन के समर्थन में एक विराट आमसभा के बाद जब लोहियाजी विशाल जुलूस के साथ बाराखंभा रोड स्थित नेपाली दूतावास की ओर ज्ञापन देने के लिए आगे बढ़े तो   इस जुलूस को तितर बितर करने के लिए भारी मात्रा में आंसूगैस छोड़ी गई और जुलूस पर बेरहमी से लाठीचार्ज करने के बाद लोहियाजी और उनके अनेक साथियों को गिरफ़्तार करके एक महीने से भी जादा समय तक जेल में रखा गया।

लोहियाजी की रिहाई हेतु वरिष्ठ कांग्रेस नेता आचार्य जे बी कृपलानी ने नेहरूजी को11जून1949को पत्र लिखा जिसे संलग्न करते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल को13जून को को पत्र लिखा और लोहिया को रिहा करने की मांग की।

इसके जवाब में और प्रतिजवाब में पटेल और नेहरू के बीच13जून से9जुलाई1949तक पत्रव्यवहार हुआ जिसमें पांच पत्र नेहरु ने पटेल को और चार पत्र पटेल ने नेहरू को लिखे।

           इन तमाम पत्रों का सार सुप्रसिध्द साहित्यकार एवं इंडियन रेवेन्यू सर्विस  के अवकाश प्राप्त उच्च  अधिकारी वीरेंद्र कुमार बरनवाल के एक विस्तृत लेख में दर्ज करते हुए श्री बरनवाल लेख के अंत में लिखते हैं कि:-

        “..लोहियाजी को लेकर पटेल और नेहरू के बीच दिलचस्प पत्रव्यवहार नवजात स्वतंत्रता की अलग अलग चिंताओं को रेखांकित करता है।लोहियाजी मात्र अपने देश की स्वतंत्रता और उसमें व्याप्त दमन,शोषण तथा असमानता के विरुद्ध संघर्ष से संतुष्ट रहने वाले प्राणी नहीं थे।।पृथ्वी पर जहाँ भी अंधकार की शक्तियां सक्रिय थीं; वह उन सबसे जूझने के संकल्प से दीप्त थे।

      “पटेल अनेक भयावह समस्याओं से घिरे और जूझते देश में किसी भी प्रकार की अराजकता और अनुशासन में ढील को बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं थे।

     “नेहरूजी संसदीय प्रजातंत्र की परंपराओं के विकास और वैचारिक असहमति को पूरा स्पेस देने के साथ, जनमत तथा अंतरराष्ट्रीय जगत में देश की सकारात्मक छवि के प्रति पूर्णतः सजग, संवेदनशील एवं प्रतिबध्द थे।

       “लोहियाजी के संबंध में पटेल का अंतिम मत खास ध्यान देने योग्य है।

जब वह कहते हैं कि लोहियाजी सरकार या कांग्रेस से कहीं अधिक अपनी पार्टी के सिरदर्द होंगे तो कहीं उनकी अनुभवी दृष्टि ने उनके(लोहियाजी)भावी राजनीतिक आचरण का अनुमान कर लिया था।

देश मे स्वतंत्रता के बाद समाजवादी आंदोलन से जुड़े बनते-बिगड़ते संगठनों का इतिहास इसका साक्षी है।

लोहियाजी की गहन संवेदनशीलता और विलक्षण जुझारूपन के साथ मिलकर उनकी अधीर तथा एक हद तक अराजक आदर्शवादिता का, किसी दल के सांचे-ढांचे में समा पाना हमेशा दुष्कर रहा।

अतिकर्षण के कारण उनके धनुष की प्रत्यंचा अक्सर टूट जाती थी।

      –वीरेंद्र कुमार बरनवाल

      (स्रोत: ‘लोहिया के सौ वर्ष’)

             प्रस्तोता: विनोदकोचर

Ramswaroop Mantri

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