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*अथ मोहन भागवत और मोदी कथा समाप्तम* 

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 सुसंस्कृति परिहार 

ये तो होना ही था। आखिरकार सर संघचालक मोहन भागवत ने अपने कहे शब्दों से किनारा कर लिया। वे नींद से जाग उठे हैं।अमृतबेला ने उनके खटास से भरे रिश्ते में फिर मिठास के संकेत दे दिए हैं।पत्ते पर कुलाटी मारने वाले संघ प्रमुख अब यह कह रहे हैं कि ना मैं रिटायर हो रहा हूं और ना ही मैं किसी और को रिटायर होने कहूंगा।मतलब साफ है 11सितंबर और 17 सितम्बर को 75 साल पूरे करने के बाद भी भागवत और मोदीजी जमे रहेंगे।इस दोगले वक्तव्य से सबसे ज्यादा दुखी लालकृष्ण अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी होंगे।जो अपने हटाने वाले का धुंआ देखने की तमन्ना में शायद ज़िंदा हैं।वे याद रखें घबराए नहीं उनकी कामना देर सबेर पूरी होने वाली है। सरकार के साथ संघ की भी मिट्टी पलीद होने वाली है।

बहरहाल,यह खबर चौंकाने वाली  कतई नहीं है।ये तो पहले से ही साफ़ था कि संघ में मोदी को हटाने की ताकत नहीं है क्योंकि इस फार्मूले के मुताबिक पहले भागवत को राम राम करनी थी पर वे ही सत्ता सुख भोगने वाले पहले सर संघचालक हैं। मोदी कृपा के पात्र हैं।  दूसरी ओर मोदी-शाह को यदि हटाते तो संघ और मोदी-शाह  कई आपराधिक मामलों में सीधे फंस जेल चले जाते। इसलिए मिल जुल कर चैन की बांसुरी बजाने में ही फायदा देखा गया। कही-सुनी सब माफ़।

दूसरी बात यह भी है कि बमुश्किल भाजपा मोदी की बदौलत शीर्ष पर हैं उसे खोना यानि संघवाद का नाश ही  होता। क्योंकि उनके लाड़ले दूध से उजले भांजे नितिन गडकरी पर दूसरी बार फिर  भ्रष्टाचार का आरोप लगा है इससे पहले जब वे भाजपा अध्यक्ष थे तब लगा और अब अपने बेटे के लिए भ्रष्टाचार का आरोप लगा है ।जाने किस ना मुराद ने ऐन वक्त में बखिया उधेड़ दी है। विदित हो ,मोदी के बाद नितिन गडकरी का नाम पीएम रेस में अग्रणी था।

तीसरी वजह राहुल गांधी की बढ़ती ताकत से निपटने में अमित शाह और मोदी साहिब सा और कोई नहीं मिलेगा। जो हर तरह के काम करने में माहिर हैं।इसलिए मोदी शाह के इंतकाम का काम धरा रह गया।यानि दोनों सरेन्डर हैं।ताकि आगत खतरों का सामना किया जा सके।

लेकिन जनाबे आली, संघ और मोदी के मिलन से शायद ही कोई फायदा इस लंगड़ी सरकार को मिल पाए। क्योंकि इस बीच उपराष्ट्रपति का चुनाव सबसे बड़ी बाधा के रुप में खड़ा है।मान लीजिए इस चुनाव में भाजपा के सहयोगी दल साथ छोड़ते हैं जैसा कि नज़र आ रहा है तो उपराष्ट्रपति विपक्ष का बन जाएगा। जिससे आप दोनों की किरकिरी होनी ही है।तब यह भी संभावना बलवती हो जाती है कि शायद यह सरकार ही गिर जाए। आमचुनाव की घोषणा हो या प्रतिपक्ष सरकार गठित कर ले। बिहार चुनाव में हार के लक्षण स्पष्ट नज़र आने लगे हैं।यदि प्रतिपक्ष की सरकार बनती है तो फिर तमाम आपराधिक राजनैतिक लोगों, अधिकारियों पर जो बमबारी होगी उसकी कल्पना से सिहरन आ जाती है।

यकीं मानिए, अवाम के बहुसंख्य लोग इस मंजर के इंतज़ार में है। राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा ने जो अलख जगाई है वह बुझने वाली नहीं है।इसकी ज़द में कौन-कौन आएगा।सबको मालूम है। मोदी राज में संघ की उड़ान सबने देखी है अब पतन की कहानी शुरू होती नज़र आ रही है। इसलिए इसे लोग आज मोहन भागवत मोदी की कथा की समाप्ति की बात कह रहे हैं।साफ़ पाक दिखने वाले संघ को जो मुख में  राम बगल में छुरी रखने प्रसिद्ध है,अब लोगों ने भली-भांति जान और पहचान लिया है।मतलब अब यही आस शेष है  यदि नीतीश नायडू भारत सरकार को ऑक्सीजन की सप्लाई बनाए रखने के लिए जो भी मांगते हैं उसे दें।

ऐसी सरकार कब तक चल सकती है सब देख रहे हैं क्योंकि इसके अलावा गुजरात लाबी के जमे हुए लोग और उद्योग पतियों ने इस सरकार से दूरी बना ली है। सरकार  चलाना पहले जैसा आसान नहीं होगा क्योंकि यह दो ताज़े दुश्मनों की  सत्ता सुख पाने की यारी का गठजोड़ है। इसमें टूट फूट की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।साथ ही पूरे प्रतिपक्ष की जागरूकता ने भी सरकार का कचूमर निकाल दिया है।संघ के इशारों पर चलने वाली सरकार ने आज अपने पितृ संगठन को नाकों चने बिनवा लिए हैं। इसलिए मौका मिलते ही संघ कब क्या कर बैठे समझना कठिन है। लेकिन यह तय बात है दोनो पतन की कगार पर पहुंच गए हैं। उनके अच्छे दिन जाने वाले हैं आज नहीं तो कल।

Ramswaroop Mantri

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