*दुनिया में बढ़ रही है हथियार उनकी होड़ कैसे होगी शांति*
रामबाबू अग्रवाल
हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले को दुनिया भूली नहीं है। 1945 को हिरोशिमा पर विस्फोटित यूरेनियम बम की विस्फोटक क्षमता 15,000 टन टीएनटी के बराबर थी। इसने लगभग 70 प्रतिशत इमारतों को ध्वस्त और जला दिया और 1945 के अंत तक अनुमानित 1,40,000 लोगों की मृत्यु का कारण बना, साथ ही बचे हुए लोगों में कैंसर और दीर्घकालिक बीमारियों की दर में भी वृद्धि हुई।तीन दिन बाद नागासाकी पर एक थोड़ा बड़ा प्लूटोनियम बम फटा, जिससे शहर का 6.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र नष्ट हो गया और 1945 के अंत तक 74,000 लोग मारे गए। जमीन का तापमान 4,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया और रेडियोधर्मी वर्षा होने लगी।1945 के अंत तक, हिरोशिमा में अनुमानित 1,40,000 लोग और नागासाकी में 74,000 लोग इस बमबारी में मारे गए थे। अनुमान है कि मारे गए लोगों में 38,000 बच्चे थे। इसके बाद के वर्षों में, बचे हुए लोगों में से कई को ल्यूकेमिया, कैंसर या विकिरण के अन्य भयानक दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ा।
दुनिया भर में शांति के लिए प्रयासरत राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता और शांति प्रेमी हर साल दुनिया को युद्ध के खतरों से अवगत कराने के लिए शांति एवं एकजुटता संगठन के माध्यम से शांति का संदेश देने की कोशिश करते हैं लेकिन इन कोशिशों का कोई सार्थक नतीजा निकलता दिखाई नहीं दे रहा है। ज्यो ज्यों शांति की कोशिश रही है वृक्षों व्यों दनिया परमाणु खतरे की ओर ज्यादा तेजी से बढ़ रहीहै।आज दुनिया एक “नैतिक संकट” का सामना कर रही है, जिसमें बढ़ती तानाशाही, गहरी होती असमानता और मानव पीड़ा के प्रति ख़तरनाक अनदेखी शामिल है.
वर्ष 1800 से अब तक विश्व भर में 37 मिलियन से अधिक लोग युद्ध में सक्रिय रूप से लड़ते हुए मारे गए हैं।यदि इसमें लड़ाई के कारण मरने वाले नागरिकों, इन संघर्षों के परिणामस्वरूप भूख और बीमारी से होने वाली मौतों की बढ़ती संख्या, तथा छोटे संघर्षों में होने वाली मौतों को भी शामिल किया जाए, जिन्हें युद्ध नहीं माना जाता , तो यह संख्या और भी अधिक हो जाएगी ।
दुनिया एक बार फिर परमाणु हथियारों की खतरनाक दौड़ की ओर लौट रही है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की 2025 की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, नौ परमाणु संपन्न देश—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, यूके, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजरायल—अपने परमाणु शस्त्रागार को न केवल बढ़ा रहे हैं, बल्कि उन्हें पहले से ज्यादा घातक और आधुनिक बना रहे हैं.
1980 के दशक में जहां वैश्विक स्तर पर 64,000 से अधिक परमाणु हथियार थे, उनकी संख्या अब 12,241 रह गई है. यह गिरावट अब थम चुकी है और परमाणु हथियारों का जखीरा फिर से खतरनाक रूप से बढ़ने लगा है.
युद्ध कई अन्य मायनों में भी भयानक होते हैं: वे लोगों के जीवन को असुरक्षित बनाते हैं, उनके जीवन स्तर को गिराते हैं, पर्यावरण को नष्ट करते हैं, और यदि परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच लड़े जाएं , तो मानवता के लिए अस्तित्व का खतरा बन सकते हैं।
सिर्फ़ ख़बरों को देखकर यह समझना मुश्किल हो सकता है कि युद्ध के कारण पहले की तुलना में ज़्यादा लोग मर रहे हैं या कम। इसके लिए उन आँकड़ों पर भरोसा करना होगा जिन्हें ध्यान से इकट्ठा किया जाता है ताकि समय के साथ उनकी तुलना की जा सके।
जैसे-जैसे 2025 में दुनिया अधिक खतरनाक होती जाएगी, उसके सबसे खतरनाक हथियारों के इस्तेमाल की संभावना भी बढ़ जाएगी।
यह प्रक्षेप पथ नए ट्रम्प प्रशासन के लिए खतरे को बढ़ा देता है, क्योंकि वह यूरोप और मध्य पूर्व में युद्धों को समाप्त करने का प्रयास कर रहा है, तथा अधिक व्यापक रूप से, परमाणु हथियारों के उपयोग और प्रसार की ओर बढ़ते अशुभ मार्ग को उलटने का प्रयास कर रहा है, जो इन संघर्षों के कारण तीव्र हो गया है
रूसी परमाणु बल पूरी तरह से युद्ध की तैयारी में हैं और इसके तुरंत बाद उन्होंने युद्ध की स्थिति में रूस के गैर-रणनीतिक परमाणु बलों की तैयारी का परीक्षण करने के लिए सैन्य अभ्यास शुरू किया।
हथियारों का आधुनिकीकरण तेज
SIPRI के डायरेक्टर डैन स्मिथ का कहना है, “दुनिया ने 1991 से लेकर 2010 तक परमाणु निरस्त्रीकरण में बड़ी प्रगति की थी. हजारों वॉरहेड्स नष्ट कर दिए गए थे, लेकिन अब हालात तेजी से उलट रहे हैं.” रूस और अमेरिका के बीच New START संधि अब लगभग निष्क्रिय हो चुकी है और दोनों देश अपने परमाणु कार्यक्रमों को फिर से आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं.
सबसे गंभीर बात यह है कि अब परमाणु हथियार सिर्फ संख्या में नहीं बढ़ रहे, बल्कि उन्हें कहीं अधिक उन्नत, मोबाइल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सक्षम बनाया जा रहा है. इसका मतलब यह है कि इन हथियारों की प्रतिक्रिया समय बेहद कम हो गया है और गलती की कोई गुंजाइश भी अब खतरनाक स्तर पर आ गई है.
एशिया में बन रहा ‘परमाणु त्रिकोण’
SIPRI की रिपोर्ट के अनुसार एशिया अब परमाणु हथियारों की नई प्रतिस्पर्धा का सबसे खतरनाक केंद्र बनता जा रहा है.
चीन अपनी परमाणु क्षमताओं को रिकॉर्ड गति से बढ़ा रहा है. उसके पास अब 600 से ज्यादा वॉरहेड्स हैं, और DF-41 जैसी इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें पूरी तरह से ऑपरेशनल हो चुकी हैं.
भारत अपने परमाणु हथियार भंडार में धीरे-धीरे वृद्धि कर रहा है, लेकिन उसने अब सेकंड-स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करने के लिए अपनी समुद्री परमाणु ताकत और डिलीवरी सिस्टम पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है.
पाकिस्तान टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन, MIRV-capable मिसाइलें और समुद्री आधारित परमाणु हथियारों को तेजी से विकसित कर रहा है.
इस त्रिकोण के बढ़ते तनाव को SIPRI ने ‘मिसकैलकुलेशन का सबसे बड़ा खतरा’ बताया है. किसी भी रणनीतिक गलती या गलतफहमी से एशिया एक विनाशकारी युद्ध की चपेट में आ सकता है.
अमेरिका, रूस और वैश्विक अस्थिरता
अमेरिका और रूस, जिनके पास कुल वैश्विक परमाणु हथियारों का 90% हिस्सा है, दोनों ही देश अपने पुराने हथियारों को रिटायर करने के बजाय उन्हें आधुनिक बना रहे हैं. अमेरिका की नई परमाणु नीति के अनुसार, परमाणु हथियार अब “प्रतिरोध के प्राथमिक साधन” बनते जा रहे हैं. रूस ने यूक्रेन युद्ध के दौरान परमाणु हमले की धमकियों से यह साफ कर दिया है कि ये हथियार अब सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि रणनीतिक निर्णयों के केंद्र में हैं.
इजरायल और मध्य-पूर्व में बढ़ती तैयारी
इजरायल, जो पारंपरिक रूप से अपने परमाणु कार्यक्रम पर चुप्पी साधे रहता है, अब नेगेव रेगिस्तान में प्लूटोनियम उत्पादन संयंत्र को अपग्रेड कर रहा है. यह संकेत है कि इजरायल भी अब इस होड़ में किसी से पीछे नहीं रहना चाहता, खासकर ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच.
न्यूक्लियर हथियार: अब कूटनीति का हिस्सा
SIPRI की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि परमाणु हथियार अब सिर्फ युद्ध के आखिरी विकल्प नहीं रहे. अब ये वैश्विक कूटनीति, शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं. AI-आधारित निर्णय प्रणाली, स्पेस डिफेंस और हाइपरसोनिक मिसाइलों के साथ जुड़कर ये हथियार अब पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो गए हैं
विशेषज्ञ मानते हैं कि क्यूबा मिसाइल संकट परमाणु युद्ध में नहीं बदल सका क्योंकि उस वक्त दुनिया में केवल दो देशों – रूस और अमेरिका के पास ही परमाणु हथियार थे. तब दोनों देशों को यह अहसास था कि अगर परमाणु हमला हुआ तो कोई भी देश दोबारा हमला करने की स्थिति में नहीं होगा. पर आज ऐसा नहीं है.
क्यूबा मिसाइल संकट 1962 में हुआ जब 14 अक्टूबर को कम्युनिस्ट देश क्यूबा में सोवियत संघ ने मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें तैनात कर दी. अमेरिकी सेना का ग्वांतानामो बेस और फ्लोरिडा तट पूरी तरह से इन मिसाइलों की मार की जद में था. जवाब में अमेरिका ने भी अपने लड़ाकू विमानों को युद्ध के लिए तैयार कर लिया था. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने उस वक्त सोवियत संघ से बिना शर्त मिसाइलों को हटाने की मांग की. इसके बाद दोनों देशों के बीच समझौता हुआ. परमाणु युद्ध के खतरे को दुनिया ने इतनी नजदीक से कभी महसूस नहीं किया था.
धमकी से बढ़ा युद्ध का खतरा
आज ईरान भी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश में लगा हुआ है. भारत और पाकिस्तान पहले से ही परमाणु शक्ति संपन्न हैं. ऐसे में शक्ति का संतुलन गड़बड़ाया हुआ है. रेगन्सबुर्ग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राइनहार्ट मायर वाल्सेर इसे “आतंक का संतुलन” कहते हैं. वह कहते हैं कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद “आतंक का संतुलन” उस तरह का नहीं रहा जैसे पहले था. उनका कहना है, “आज क्षैतिज निशस्त्रीकरण में समस्याएं आ रही हैं. इसका मतलब यह हुआ कि बड़ी ताकतें तो परमाणु हथियार कम करने में लगी हैं, लेकिन छोटे छोटे देश परमाणु हथियार बना रहे हैं.” आधिकारिक परमाणु संपन्न देशों, यानि अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस के अलावा भारत और इस्राईल के पास भी परमाणु हथियार हैं. राजनीतिक रूप से अस्थिर पाकिस्तान और निरंकुश उत्तरी कोरिया भी परमाणु शक्ति से संपन्न हैं.
उत्तर कोरिया के उप विदेश मंत्री पाक किल योन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में बोलते हुए कहा कि कोरियाई द्वीप पर किसी तरह का उकसावा परमाणु युद्ध को भड़का सकता है. 1968 में परमाणु निशस्त्रीकरण संधि पर हस्ताक्षर करने वाला ईरान भी अब परमाणु हथियार हासिल करने में लगा है. चार परमाणु शक्ति संपन्न देशों के विरोध के बावजूद ईरान अपने विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है. इस्राईल के खिलाफ ईरान की धमकी भी कम नहीं हो रही.
मध्य एशिया में हथियारों की होड़
परमाणु हथियारों से कितना नुकसान हो सकता है इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. फ्रैंकफर्ट के पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम करने वाली अनेटे शापेर कहती हैं, “परमाणु हथियारों से ऐसा खतरा होता है जिसके बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता. आप कभी भी निश्चित तौर पर यह नहीं जानते कि परमाणु हथियारों से संपन्न देश कैसा व्यवहार करेगा. ” हालांकि वह यह भी कहती हैं कि न तो ईरान और न ही उत्तरी कोरिया परमाणु हमला करेंगे क्योंकि उन्हें जवाबी हमले का भी डर है. उत्तरी कोरिया ने मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों का परीक्षण कर लिया है लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है. ईरान की आर्थिक हालत कोरिया से भले ही बेहतर है लेकिन कूटनीतिक तौर पर दोनों देश पूरी दुनिया में अलग थलग हैं. शापेर कहती हैं, “इस तरह की स्थित में अलग थलग पड़े देश आक्रामक रवैया अपना लेते हैं. उन्हें घरेलू राजनीति में संतुलन साधने में मदद मिलती है.”
ईरान के बारे में कहा जा सकता है कि परमाणु हथियार हासिल करने की उसकी जिद के पीछे शक्ति, सम्मान और क्षेत्रीय प्रभुत्व हासिल करने की इच्छा है. विशेषज्ञों का मानना है कि खतरा सउदी अरब जैसे देशों से भी है जो परमाणु हथियारों से संपन्न ईरान को खतरा मानते हुए हथियारों की नई दौड़ शुरु कर सकते हैं.
भारत पाकिस्तान का तनाव
पाकिस्तान के बारे में सबसे खतरनाक बात यह है कि परमाणु शक्ति से संपन्न यह देश राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा है. परमाणु हथियारों के आतंकवादियों के हाथ में पड़ने की लगातार आशंका जताई जा रही है. पाकिस्तान परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कादिर खान पर परमाणु तकनीक को बेचने के भी आरोप लगते रहे हैं. शापेर का इस बारे में कहना है, “पाकिस्तान का व्यवहार पूरी तरह से विध्वंसक रहा है. ईरान, ईराक और लीबिया में यूरेनियम संवर्धन के जितने भी प्लांट हैं उनके तार कहीं न कहीं पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं.”
पड़ोसी देश भारत से मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान पहले से ही तैयारी करता रहा है. भारत पाकिस्तान के बीच हथियारों की जंग शीत युद्ध के दौर की याद दिलाती है. लेकिन शापेर भारत और पाकिस्तान में अंतर भी करती हैं. वह कहती हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच काफी फर्क है. “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा और अर्थव्यवस्था पाकिस्तान के मुकाबले काफी मजबूत है.” मायर वाल्सेर इस बारे में कहते हैं,” निवारण की प्रक्रिया अलग अलग बातों पर निर्भर करती थी. आज उनमें से कोई भी नहीं है. जैसे कि युद्ध की परंपरागत क्षमताएं. खतरा इस बात का है कि पाकिस्तान और ईरान जैसे देश युद्ध की स्थिति में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि उनके परंपरागत हथियार इतने मजबूत नहीं हैं कि वे दुश्मन को हरा सकें.” शापेर का कहना है कि क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान कोई भी पक्ष पागलपन की सीमा तक नहीं पहुंचा और इसी से दुनिया बच गई, “लेकिन इस बार बटन किस के हाथ में होगा हम नहीं जानते और हमें यह भी नहीं पता कि वह किस तरह पेश आएगा.”
रामबाबू अग्रवाल
(लेखक अखिल भारतीय शांति एवं एकजूटता संगठन की प्रदेश इकाई के महासचिव हैं,संपर्क:9827031550)





