अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*एवोलुशन : चेतना और लोंगेविटी* 

Share

      डॉ. विकास मानव

लगभग हर मैमल (स्तनधारी) जीव को बराबर हार्ट बीट मिली हुई है. यानी के सभी का दिल लगभग बराबर बार धड़कता है उनके जीवन में.

     इसका कारण है के स्तनधारी जीवों का मेटाबोलिक रेट ज्यादा होता है जिस वजह से उन्हें तेज दिल  की धड़कन चाहिए हीट को dissipate करने के लिए. फिर भी किसी का जीवन लम्बा और किसी का छोटा होता है। 

     इंसान का भी जब गुफाओं में रहता था 40000 साल पहले यही हाल था। उतनी ही हार्ट बीट थी हमारी भी जितनी बाकी स्तनधारी जीवों की है। 

     हम ने धीरे धीरे अपने शिकार में मरने की प्रॉबब्लिटी को ख़त्म कर लिया है लगभग. इसलिए हमारी मौत अब नेचुरल होती है शरीर के खात्मे के साथ ही। 

    इसका कारण न्यूरोसाइंटिस्ट ये मानते हैं कि प्रकृति हमारे शरीर को उतना ही ताकतवर बनाती है जितनी कि मुसीबतें शरीर को झेलनी होती है. बॉडी बिल्डिंग में भी यही सच है कि आप जितना भारी वजन उठाएंगे उतना आपका शरीर तैयार हो जाएगा अगली बार के लिए ताकि वो उतना वजन आसानी से उठा सके। 

    इसलिए हर जीव के जीवन में आने वाली मुसीबतों के जवाब में एवोलुशन ने उसे ये शक्तियां दी। 

 ये शक्तियां क्यों मिली? क्यूंकि reproduce करने के लिए हमें उस लायक रहना पड़ेगा कि हम अपने genes पास कर सकें अगली जनरेशन को ताकि  जीवन का चक्र चलता रहे। 

इसलिए हर जीव को एवोलुशन reproduce करने की उम्र के लिए तैयार करता है। 

    यही शक्तियां उसका काल भी बनती है, क्यूंकि ये जो चीज़ें आप गेन करते हैं सर्वाइवल के लिए अपने बचपन या reproduce करने के लिए टीनएज में ये जब सस्टेनेबल नहीं रहती या जरूरी नहीं रहती तो बीमारी के रूप में सामने आती हैं बुढ़ापे में.

   फलत:  इंसान की एजिंग और मौत भी होती है. हॉर्मोन्स जो के आपको दौड़ा रहे थे वो गड़बड़ाने लग जाते हैं.

    बहस इस तरफ थी कि हमारी बॉडी में regeneration की प्रोसेस लगातार चलती रहती है. आपकी मसल्स बनती टूटती रहती है. आपकी हड्डियां भी, आपके माइटोकांड्रिया भी नए बनते रहते हैं. फिर भी इंसान में एजिंग एक हकीकत है और मौत भी क्यूंकि हमारे सर्वाइवल और रिप्रोडक्शन के लिए हमारे शरीर ट्रैन किये हैं, एवोलुशन ने ना की longevity के लिए। 

    आपका शरीर हमेशा जीने के लिए इवॉल्व नहीं हुआ है क्यूंकि ये संभव ही नहीं था. आपको कभी भी कोई भी जानवर खा सकता था और कहानी ख़त्म हो जाती. इसलिए सर्वाइवल और रिप्रोडक्शन अहम् हिस्से रहने ही थे। 

   बहस में ऐसे जीवों को स्टडी किया गया जिन्हे के कम खतरा है वो ज्यादा जीते पाए गए. comparison में उनके जिन्हे के सर्वाइवल के खतरे ज्यादा हैं। 

जैसे के चमगादड़ की उम्र उसकी तरह के जीवों से कई गुना ज्यादा है क्यूंकि उसे दुसरे जीवों से कम खतरा है उड़ने की काबलियत और एकदम अन्धकार में भी देख पाने और खाना ढूंढ पाने की काबलियत की वजह से। 

      ऐसे ही कुछ whale हैं जो 200-300 साल आसानी से जी जाती हैं, क्यूंकि उन्हें भी सर्वाइवल के खतरे कम हैं। 

     एक शार्क है जो के 700 साल जीती है क्यूंकि उसके इलाके में उस से बड़ा शिकारी कोई नहीं है. कछुए काफी लम्बे जीते हैं, क्यूंकि उनका खोल उन्हें बचाता रहता है। 

     इनसे अलग एक जीव है hydra और एक जेलिफ़िश है जो के कभी बूढी नहीं होती क्यूंकि उन्हें सभी स्टेम सेल हैं और सब कुछ regenerate होता रहता है उनका।

     इंसानों का शिकार ना बनना अब हमें इतना तो कर गया है के अब हमारी उम्र बाकी मैमल्स से दोगुनी तो हो चुकी है मिनिमम। 

लेकिन एवोलुशन की वजह से ये पन्गा अभी भी है के हमारा शरीर reproduce करने की क़ाबलियत तक तो हमें बचाता रहता है मगर उसके बाद का एवोलुशन ने हमें कुछ भी ट्रैन नहीं किया लाखों साल तक, इसलिए रिप्रोडक्शन की उम्र के बाद इंसानी शरीर ढलान पर जाता रहता है और मौत तय होती है। 

    इसलिए कोशिश करें के आप ज्यादा से ज्यादा लम्बी उम्र तक reproduce करने लायक बने रहे. चेतना को हम 6 अलग अलग तरह से देख सकते हैं। 

पहला है के चेतना जैसा कुछ नहीं है, हमारा दिमाग overthinking करके खुद को ज्यादा ही ओवररेट कर बैठा है।

      इस विचार के अनुसार आप ब्रेन को डीप में स्टडी करके सब समझ और समझा सकते हैं सइंटिफ़िकली। दूसरा है के चेतना है लेकिन वो ब्रेन का ही हिस्सा है। तीसरा है के ये दोनों चीज़ें एक्सिस्ट करती हैं लेकिन अभी की साइंस इसे समझ पाने में सक्षम नहीं है, इसलिए साइंस और फिलोसोफी का संगम ही इसे समझा सकता है। 

    चौथा है कि चेतना एक अलग ही एंटिटी है जो के विश्वव्यापी है और उसी का हिस्सा ब्रेन के साथ जुड़कर ऐसा बना पड़ा है। ये फिजिक्स से दूरी बनाता विचार है और पूरी तरह फिलोसोफी में बसा हुआ है। 

     पांचवा है के फिजिकल दुनिया ही चेतना की उत्पत्ति का कारण है लेकिन चेतना अपने आप में फिजिकल दुनिया पर कोई असर नहीं डालती है। 

    छठा जो सबसे एक्सट्रीम है वो है के केवल चेतना ही सच है दुनिया में, बाकी सब मोह माया है. सभी कुछ इस चेतना से ही उत्पन्न हुआ है। ये धार्मिक फिलोसोफी के सबसे नज़दीक वाला विचार है। 

     सारे वैलिड विचार हैं मेरी नज़र से, बस जो पहला है कि चेतना कुछ नहीं है वो थोड़ा कम हजम होता है मुझे। आखिरी जो सबसे एक्सट्रीम है वो हजम हो सकता है क्यूंकि इस से सिमिलर कुछ हम वर्चुअल रियलिटी सिमुलेशन थ्योरी में देख रहे हैं जहां के एक सिम्युलेटर की चेतना जो विज़िबल वर्चुअल वर्ल्ड है उसे क्रिएट कर रही है।

     बाकी 4 पूरी तरह से लॉजिकल हैं और हमारी अपने दिमाग की समझ चेतना की समझ और साइंस की पहुँच से बाधित विचार के बीच झूल रहे हैं।

    इंसान का बनना उतनी बड़ी घटना नहीं है विश्व की, बल्कि जो सेलुलर लाइफ बनी वो बड़ी घटना है। अगर कहीं दुनिया में सेल्स बन गए तो कुछ ना कुछ गधा घोडा अमीबा यीस्ट बन ही जाएगा, इंसान का सेल्फ कौन्सियस होना एक बड़ी घटना थी जो के वायरल इन्फेक्शन का नतीजा थी बायोलॉजिकल चेतना के विकास के साथ साथ। 

     सेल्स का बनना विरली घटना थी एकदम, क्यूंकि ये एक बहुत ही काम्प्लेक्स स्ट्रक्चर है या सिस्टम है जो रैंडम नहीं बन सकता यूनिवर्स में. जैसे कि पत्थर या रेत के कण बन सकते हैं। 

     इसीलिए चेतना के विकास को या हमारे शरीर के विकास को सेल्स के बनने के कारण और विकास होकर गधा घोडा इंसान बनने तक ध्यान में रखना जरूरी है। जैसे कैंसर सेल्स को मैंने उस समय के सेल्स से compare किया जब के ऑक्सीजन नहीं था पर्यावरण में। क्यूंकि उन्हें वैसे ही ट्रीट करने पर आप उनपर काबू पा सकते हैं, या काबू ना भी पाएं तो उन्हें समझ सकते हैं. उनके मेटाबोलिज्म को समझकर उनको अटैक कर सकते हैं। 

    ऐसा और भी जीवन की अलग अलग दिक्कतों में हम एवोलुशन के अलग अलग फेज से compare करके हम सलूशन की तरह बढ़ सकते हैं या एटलीस्ट कोशिश कर सकते हैं। 

इसलिए एवोलुशन की डिटेल में समझ बेहद जरूरी है।

    पिछली पोस्ट का मर्म ये है के हेल्थ की नज़र से, के हमें एवोलुशन ने दो प्रमुख चीज़ों के लिए ट्रैन किया है.

    पहला है सर्वाइवल, यानी के आपके शरीर को जब किसी जंगली जानवर से लड़ने की जरूरत पड़ेगी या पहाड़ चढ़ने की तो आपका शरीर उस हिसाब से आप को ढाल देगा, क्यूंकि आपके शरीर का सिस्टम आपका सर्वाइवल चाहता है. आपका सर्वाइवल केवल आपका नहीं है, उन ट्रिलियन सेल्स का भी है जिस से आप बने हैं, उन बैक्टीरिया  का भी है जो आपके शरीर में रहते हैं और सेल्स की तादाद से भी ज्यादा हैं.

    दूसरा है रिप्रोडक्शन. आपका अस्तित्व आज से लाखों साल पहले ही ख़त्म हो गया होता अगर आप reproduce ना कर पाते होते. आपका शरीर  आपको हमेशा reproduce करने लायक बनाने की कोशिश करता रहेगा अगर आप उसे जरूरी रॉ मैटेरियल्स देते रहे तो। 

   इसलिए जो प्रैक्टिकल स्टेप्स आप इस एवोलुशन के सिद्धांत से उठा सकते हैं. जीवन में लागू करने के लिए, वो हैं के अपने शरीर को सर्वाइवल के चैलेंजेज देते रहे हमेशा ही, और एक्सरसाइज इसका सबसे आसान बिना रिस्क वाला तरीका है. आप जंगली जानवरों से भी भिड़ सकते हैं लेकिन उसमे आपके शिकार होने की प्रोबेबिलिटी बढ़ जायेगी. आपके लीचड़ शहरी इंसान होने की वजह से, इसलिए एक्सरसाइज कीजिये. gym में फेलियर तक जाने को इसीलिए कहा जाता है सेट में ताकि आपके शरीर को लगे कि सर्वाइवल का क्राइसिस आ गया है. अब लेवल अप होना पड़ेगा। 

     सार ये है के मरने तक एक्सरसाइज करते रहिये जिसमे फेलियर तक सेट को पहुंचा सकें. दौड़ सकते हैं तो थकने तक दौड़िये, चलते हैं तो पसीना पसीना होने तक चलिए. वेट उठा रहे हैं तो जब शरीर मना करने लग जाए उठाने को तब तक उठाइये। 

    रिप्रोडक्शन  वाले एंगल के लिए आपको अपनी सेक्सुअल हेल्थ पर ध्यान देना होगा. आप जब तक reproduce करने लायक हैं आपका शरीर बेहतरीन रहता है. आपका शरीर चाहता है जीन ट्रांसफर करना. जीवन को अगली पीढ़ी में ट्रांसफर कर देना। 

    इसलिए रोमांस जरूरी है लाइफ में, सेक्स लाइफ जरूरी है, खासकर अधेड़ उम्र के आदमी औरत के लिए,ये जो बाल सफ़ेद होते ही अलग अलग कमरे में सोने लग जाते हैं. मियाँ बीवी मुझे लगता है गलत स्ट्रेटेजी है। 

     रोमांस बढ़ाइए ज़िन्दगी में, सेक्सुअल हेल्थ के लिए सप्लीमेंट्स एक्सरसाइज इत्यादि के बारे में पढ़िए और अपने पार्टर्नर को भी अवगत करवाइए.  मान के चलिए के सेक्स इतना टैबू सब्जेक्ट है कि इसपर कभी खुलकर बात नहीं होती समाज में कि ये क्यों जरूरी है. किसी की मसल्स डाउन जा रही है तो उसे सलाह देने वाले मिल जाएंगे, लेकिन किसी की सेक्स लाइफ खराब जा रही है तो किसी को पता भी नहीं चलना। 

    मियाँ बीवी को खुद ही देखना पड़ेगा एक दुसरे को, रोमांस बढ़ा दीजिये. 40 की उम्र के बाद, हग करना, किस करना, फ़्लर्ट करना, डेली का काम होना चाहिए. सेक्स भी जितना रेगुलर हो सके करना चाहिए. 40 की उम्र के बाद अवश्य क्यूंकि इसी उम्र में नाइट्रिक ऑक्साइड आपका बेहद कम लेवल पर पहुँच जाता है।

     अब इस पर मैं कोई और सीरीज नहीं लिखने वाला हूँ कि अपनी सेक्स लाइफ को कैसे इम्प्रूव करें. यह अश्लील साहित्य की तरह का ही हो जाना है. आप खुद पढ़ सकते हैं, कई अच्छे एक्सपर्ट डॉक्टर्स हैं जो के रिलेशनशिप्स और सेक्स लाइफ पर लिखते बोलते रहते हैं उन्हें सुने। 

     हाँ हार्ट वाली सीरीज में हम इरेक्टाइल डिसफंक्शन को कवर कर रहे हैं. नाइट्रिक ऑक्साइड बूस्ट करवाकर तो उसमे आपको कुछ जरूर सीखने को मिल सकता है, लेकिन सेक्स जितना फिजिकल है उतना ही मेन्टल भी है. वो आपको एक्सपर्ट्स से ही सीखना चाहिए। मगर इसको भी सीरियसली लें एक्सरसाइज के साथ साथ। दोनों ही आपका healthspan बढ़ाएंगे मेरे हिसाब से क्यूंकि evolutionary साइंस यही कहती है के हमारा शरीर इन दोनों के लिए ट्रैन हो रखा है।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें