-तेजपाल सिंह ‘तेज’
लोकतंत्र में राजनेताओं को जनता का प्रतिनिधि माना जाता है। सिद्धांततः नेता जनता की आकांक्षाओं, आवश्यकताओं और मूल्यों का प्रतीक होते हैं। लेकिन जब स्वयं समाज में भ्रष्टाचार, अनैतिकता और स्वार्थ की प्रवृत्तियाँ गहराई तक पैठ जाती हैं, तो यह स्वाभाविक है कि वही प्रवृत्तियाँ राजनीति में भी प्रवेश कर जाती हैं। इसीलिए कहा जाता है— “जनता भ्रष्ट तो राजनेता भी भ्रष्ट।” यह कथन केवल नेताओं पर आरोप नहीं है, बल्कि जनता की मानसिकता, आदतों और सामाजिक ढांचे की गहन समीक्षा है। राजनीति दरअसल समाज का दर्पण है — उसमें वही दिखता है जो समाज में प्रचलित है।
लोकतंत्र जनता का शासन है, जनता के लिए है और जनता के द्वारा है। इसका सीधा अर्थ है कि जनता जैसी होगी, शासन और शासक भी वैसे ही होंगे। भारत में अक्सर यह कहा जाता है कि “नेता भ्रष्ट हैं, राजनीति गंदी है।” लेकिन क्या यह भ्रष्टाचार केवल नेताओं की देन है? वास्तव में, राजनीति समाज का दर्पण है। नेता उसी समाज से निकलकर आते हैं, जिसकी सोच, मूल्य और व्यवहार उनकी राजनीति को आकार देते हैं। इसीलिए कहा जाता है— “जनता भ्रष्ट तो राजनेता भी भ्रष्ट।” यह वाक्य किसी एक वर्ग को दोषी ठहराने का बहाना नहीं, बल्कि यह समझाने का प्रयास है कि जनता और नेता दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि जनता ईमानदार और जागरूक है तो नेता भी विवश होकर ईमानदार रहेंगे, और यदि जनता ही भ्रष्ट आचरण को स्वीकार कर लेती है तो नेता भी उसी राह पर चलेंगे।
राजनीतिक दृष्टिकोण:
भारतीय राजनीति पर प्रायः यह आरोप लगता है कि यहाँ घोटाले, भाई-भतीजावाद, वोट बैंक की राजनीति और सत्ता के लिए नैतिकता से समझौता आम बात है। परंतु प्रश्न उठता है— क्या ये सब केवल नेता कर रहे हैं, या जनता भी इसमें सहभागी है?
- चुनावों में अक्सर मतदाता जाति, धर्म या व्यक्तिगत लाभ देखकर वोट डालते हैं, न कि नीति और कार्यक्षमता देखकर।
- कई बार लोग “नोट के बदले वोट” या मुफ्त की घोषणाओं को स्वीकार कर लेते हैं।
- जनता स्वयं नेताओं से अपेक्षा करती है कि वे उसे “विशेष सुविधा” दिलाएँ, चाहे वह नियम-विरुद्ध ही क्यों न हो।
ऐसे हालात में नेता भी समझ जाते हैं कि जनता को प्रभावित करने का आसान रास्ता है भ्रष्टाचार और प्रलोभन भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार, सत्ता-संघर्ष, अवसरवाद और भाई-भतीजावाद लंबे समय से चर्चा के विषय रहे हैं। चुनावी राजनीति में कई बार जनता की भूमिका भी संदिग्ध रही है। विस्तार से समझें—
- वोट बैंक की राजनीति: जनता अक्सर जाति, धर्म, क्षेत्रीयता या व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर वोट डालती है। इससे नेता समझ जाते हैं कि असली काम करने से ज्यादा जरूरी है जातीय समीकरण या धार्मिक ध्रुवीकरण को साधना।
- नोट और शराब के बदले वोट: कई क्षेत्रों में चुनाव से पहले पैसे, शराब या अन्य प्रलोभन बांटना आम है। जनता इसे स्वीकार कर लेती है, और बाद में नेताओं से ईमानदारी की अपेक्षा करती है।
- व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा: जनता का बड़ा वर्ग यह मानकर चलता है कि “हमारा नेता हमें नौकरी दिला देगा, ठेका दिला देगा या नियम तोड़कर भी हमारा काम करवा देगा।” यह मानसिकता नेताओं को भ्रष्टाचार के लिए प्रेरित करती है।
इस प्रकार राजनीति में भ्रष्टाचार केवल नेताओं की चाल नहीं, बल्कि जनता की मांग और सहमति से भी पोषित होता है।
सामाजिक दृष्टिकोण:
भ्रष्टाचार केवल राजनीति में नहीं, बल्कि समाज के ताने-बाने में व्याप्त है।
- स्कूल से कॉलेज तक में नकल और सिफारिश आम हो गई है।
- सरकारी दफ्तरों में लोग बिना घूस दिए काम करवाने की कल्पना तक नहीं करते।
- सामाजिक रिश्तों में भी सुविधा और स्वार्थ प्राथमिकता बन गए हैं।
जब पूरा समाज इस मानसिकता से चलता है, तो राजनीति इससे अछूती कैसे रह सकती है? नेता भी उसी समाज से निकलकर आते हैं, जहाँ “काम निकालना” ईमानदारी से ज्यादा महत्वपूर्ण समझा जाता है। समाज ही राजनीति को आकार देता है। यदि समाज की नींव में ही भ्रष्टाचार और स्वार्थ हो तो राजनीति में शुचिता की आशा करना व्यर्थ है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है—
- शिक्षा व्यवस्था: स्कूल और कॉलेजों में नकल, डोनेशन, सिफारिश और फर्जी प्रमाणपत्रों की प्रवृत्ति आम हो गई है। यही विद्यार्थी भविष्य में प्रशासनिक अधिकारी या नेता बनते हैं।
- दफ्तर और संस्थाएँ: सरकारी दफ्तरों में बिना घूस के फाइल आगे नहीं बढ़ती। लेकिन आश्चर्य यह है कि जनता खुद कहती है— “बिना कुछ दिए काम नहीं होता।” जब समाज इसे सामान्य मान ले, तो नेताओं से भला कैसे उम्मीद की जाए?
- सामाजिक मूल्य: आज ईमानदारी और परिश्रम की बजाय “जुगाड़” और “चालाकी” को सफलता का पैमाना माना जाने लगा है। जब समाज ही भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लेता है, तो नेता भी उसी का अनुसरण करते हैं।
आर्थिक दृष्टिकोण:
भ्रष्टाचार का सबसे गहरा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
- ठेकेदारी, लाइसेंस, करों की चोरी, बैंक घोटाले — ये सब तभी पनपते हैं जब समाज का बड़ा हिस्सा “जुगाड़” को सफलता का साधन मान लेता है।
- छोटे स्तर पर रिश्वत देने वाला व्यक्ति सोचता है कि वह कोई बड़ा अपराध नहीं कर रहा, पर यही प्रवृत्ति बड़े स्तर पर नेताओं को अरबों-खरबों के घोटाले करने की छूट देती है।
- जनता यदि टैक्स ईमानदारी से न दे, तो वह यह नैतिक हक भी खो देती है कि नेताओं से वित्तीय पारदर्शिता की अपेक्षा करे।
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है—
- टैक्स चोरी: जनता का बड़ा हिस्सा कर चुराने या गलत रसीद बनाने को “चतुराई” मानता है। लेकिन यही प्रवृत्ति नेताओं और उद्योगपतियों को अरबों-खरबों का कर घोटाला करने का हक देती है।
- काला धन और नकली रसीदें: चुनावों में काला धन तभी चलता है जब समाज इसे सहज स्वीकार करता है। वोटर भी कई बार मुफ्त सेवाओं या पैसों को खुशी से लेता है।
- घोटाले और ठेकेदारी: सड़क, पुल, बिजली या स्वास्थ्य योजनाओं में गड़बड़ियाँ तब संभव होती हैं जब जनता का रवैया “हमें क्या फर्क पड़ता है” वाला हो।
अर्थव्यवस्था तभी ईमानदार होगी जब जनता कर चुकाने, नियमों का पालन करने और पारदर्शिता की आदत डालेगी।
धार्मिक और सांप्रदायिक दृष्टिकोण:
धर्म और आस्था के क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार की जड़ें दिखती हैं–
- कई लोग धार्मिक अनुष्ठान दिखावे और प्रतिष्ठा के लिए करते हैं, भक्ति के लिए नहीं।
- मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों में चढ़ावे की अपार संपत्ति कभी-कभी पारदर्शिता से नहीं संभाली जाती।
- साम्प्रदायिक राजनीति भी इसी मानसिकता का शिकार है— जनता यदि धर्म के नाम पर वोट डालती है तो नेता भी उसे विभाजन का हथियार बना लेते हैं।
इस प्रकार धार्मिक और साम्प्रदायिक आधार पर जनता की कमजोरी, नेताओं को भ्रष्ट राजनीति करने का अवसर देती है। धर्म और आस्था के क्षेत्र में भी जनता की मानसिकता राजनीति को गहराई से प्रभावित करती है–
- धार्मिक चढ़ावा और दिखावा: मंदिरों, मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों पर चढ़ावे की अपार राशि जाती है, लेकिन उसके पारदर्शी उपयोग पर जनता सवाल नहीं उठाती। यही प्रवृत्ति नेताओं को भी धन के अपार स्रोत जुटाने की छूट देती है।
- साम्प्रदायिक राजनीति: यदि जनता धर्म के नाम पर वोट देती है, तो नेता भी इसे भुनाने के लिए साम्प्रदायिक कार्ड खेलेंगे।
- अंधविश्वास: जब जनता वैज्ञानिक सोच की बजाय अंधविश्वास को प्राथमिकता देती है, तो नेता भी झूठे वादों और अवास्तविक नारों से उसे प्रभावित करने लगते हैं।
इस तरह धार्मिक और साम्प्रदायिक स्तर पर जनता की कमजोरियाँ राजनीति को भ्रष्टाचार और विभाजन की ओर धकेलती हैं।
जनता और नेता का आपसी रिश्ता:
लोकतंत्र में जनता और नेता का रिश्ता दर्पण और प्रतिबिंब जैसा है।
- यदि जनता कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और जागरूक होगी, तो वही प्रवृत्ति राजनीति में दिखाई देगी।
- यदि जनता भ्रष्टाचार सहन करेगी, छोटी रिश्वत को सामान्य मान लेगी और स्वार्थ में उलझी रहेगी, तो नेता भी उसी का फायदा उठाकर भ्रष्टाचार करेंगे।
- यदि जनता कानून तोड़ने को सामान्य मान ले, तो नेता भी कानून से ऊपर उठने की कोशिश करेगा।
- यदि जनता वोट के बदले पैसे लेगी, तो नेता भी सत्ता के बदले घोटाले करेगा।
- यदि जनता ईमानदारी को महत्व देगी, तो नेता भी ईमानदारी दिखाने को मजबूर होगा।
राजनेता अलग ग्रह से नहीं आते; वे इसी समाज से जन्म लेते हैं। उनकी सोच और आचरण में जनता की मानसिकता झलकती है। नेता कोई अलग वर्ग नहीं, बल्कि उसी जनता से निकलते हैं। जनता जैसी होगी, नेता भी वैसे ही होंगे। नेता समाज का प्रतिबिंब हैं; इसलिए राजनीति का सुधार जनता के सुधार पर ही निर्भर है।
सुधार की राह:
भ्रष्टाचार के इस चक्र को तोड़ने के लिए जनता को अपनी भूमिका समझनी होगी।
1. शिक्षा और जागरूकता: सच्चे अर्थों में शिक्षित समाज ही भ्रष्टाचार को चुनौती दे सकता है।
2. नैतिकता का पालन: छोटी-छोटी गलतियों को भी स्वीकार न करना ही बड़े भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार है।
3. जवाबदेही की मांग: जनता को नेताओं से पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सख्ती से मांगना होगा।
4. सामाजिक परिवर्तन: समाज में सत्य, ईमानदारी और परिश्रम को महत्व देना आवश्यक है।
भ्रष्टाचार के इस चक्र को तोड़ने के लिए जनता को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यानी जनता को यह समझना ही होगा —
1. शिक्षा और नैतिकता: केवल साक्षरता नहीं, बल्कि मूल्यपरक शिक्षा जरूरी है। बच्चों को ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और जिम्मेदारी का संस्कार मिलना चाहिए।
2. छोटे भ्रष्टाचार से इनकार: यदि जनता छोटे स्तर पर घूस और सिफारिश को अस्वीकार कर दे, तो नेता बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार नहीं कर पाएंगे।
3. लोकतांत्रिक जागरूकता: जनता को अपने मत का मूल्य समझना होगा और वोट जाति, धर्म या प्रलोभन के आधार पर नहीं, बल्कि नीतियों और कामकाज के आधार पर देना होगा।
4. जवाबदेही की मांग: जनता को नेताओं से लगातार प्रश्न पूछना चाहिए— आपने वादा किया था, वह पूरा क्यों नहीं हुआ?
5. सामाजिक परिवर्तन: समाज में ऐसे व्यक्तियों और नेताओं को सम्मान देना होगा जो ईमानदारी से कार्य करते हैं। तभी अच्छे लोग राजनीति में आने के लिए प्रेरित होंगे।
सारांशत: यह कहा जा सकता — “जनता भ्रष्ट तो राजनेता भी भ्रष्ट” कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि यथार्थ का प्रतिबिंब है। नेता समाज की उपज हैं, इसलिए राजनीति में वही गुण और दोष दिखाई देंगे जो समाज में प्रचलित हैं। यदि जनता ईमानदार, जागरूक और सशक्त बनेगी, तो राजनीति भी ईमानदार और जिम्मेदार बनेगी। यह भी कि नेताओं के सुधार की शुरुआत जनता के सुधार से ही होती है। यदि जनता अपने आचरण से भ्रष्टाचार को अस्वीकार कर दे, तो कोई भी नेता भ्रष्ट होने का साहस नहीं कर पाएगा।
“जनता भ्रष्ट तो राजनेता भी भ्रष्ट” यह वाक्य लोकतंत्र की सच्चाई को उजागर करता है। नेता किसी और ग्रह से नहीं आते; वे उसी समाज की उपज हैं जहाँ से हम-आप आते हैं। यदि समाज में अनैतिकता, स्वार्थ और जुगाड़ को ही सफलता का मानदंड मान लिया गया है, तो राजनीति भी वैसी ही होगी। इसलिए यदि राजनीति में शुचिता चाहिए, तो पहले समाज को बदलना होगा। जनता ईमानदार होगी तो नेता भी विवश होकर ईमानदार होंगे। जनता जागरूक होगी तो नेता भी जिम्मेदार होंगे। जनता नैतिक होगी तो नेता भी नैतिक होंगे।
अतः निष्कर्ष यही है— राजनेता सुधार की प्रतीक्षा नहीं करते, वे जनता के सुधार के साथ ही सुधरते हैं। यदि जनता भ्रष्टाचार को अस्वीकार कर दे, तो कोई भी नेता भ्रष्ट होने का साहस नहीं कर पाएगा।





