डॉ. विकास मानव
उपनिषद का वचन है :
नायमात्मा बलहीनेन सभ्य: ‘
अर्थात आत्मा बलहीनो को प्राप्त नही होता!
प्राणायाम से सुर्यचक्र (ह्रदय स्थल में) का विकास होता है। सुर्यचक्र आमाशय का वह भाग जहाँ पेट व पसलिया मिलती है।
बौद्ध धर्म मे” जन” नामक प्राणायाम का काफी प्रचार रहा है।युनान मे प्लेटो से पहले एवं जापान मे विद्वान “हकुइन देशी ” ने प्राणायाम का खुब प्रचार किया है। प्राणायाम से शरीर कि सुक्ष्म क्रिया पद्धति को उपर अदृश्य रूप से विज्ञान सम्मत प्रभाव पडता है जिससे रक्त संचार, नाडी ,संचालन, पाचन क्रिया, स्नायविक दृढ़ता , प्रगाढनिद्रा, स्फूर्ति व मानसिक विकास होता है।
प्राणायाम मे श्वास खीचने को पूरक, बाहर निकालने को रेचक और श्वास रोकने को कुंभक कहते है। श्वास को भीतर रोकें उसको अन्तः कुंभक तथा रेचक करने के बाद कुछ देर श्वास रोके उसको बाह्यकुंभक कहते है। श्वास खेंचते समय भावना करें कि परमात्मा या दिव्य प्रकाश मेरे शरीर मे प्रविष्ट हो रहा है फिर श्वास रोके ओर यह भावना करे कि मेरे पाप कर्मों से उत्पन्न बाये कोख मे स्थित पाप पुरूष जल गया है मेरी समस्त व्याधि व विकार जलकर भस्म हो गये है फिर श्वास बाहर छोड़े हुये भावना करे कि समस्त पाप विकार पीडा भस्मीभूत होकर बाहर निकल गये है फिर पुनः श्वास रोककर भावना करे कि मेरा शरीर पुष्ट व वज्र के समान हो गया है।
ऐसा प्राणायाम संध्या समय पांच बार अवश्य करे इससे “भूत शुद्धि” कि क्रिया भी पूर्ण हो जाती है प्राणमय कोष सी भूमिका को पार करते हुये दस तरह के प्राणों को संशोधित करना पडता है।
प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान ये महाप्राण है नाग, कूर्म, कृकल , देवदत्त, धनञ्जय ये लघु प्राण है। पानी मे जैसे भ्रमर पडता है वैसे ही सूक्ष्म शरीर मे भ्रमर है जिन का प्राण से साथ संमिश्रण होने से विशेष क्रिया हो जाती है।
महाप्राणों “ओजस” और लघूप्राणों को रेतस् कहते है।जैसे मस्तिष्क मे अगला भाग बडा व पिछला भाग छोटा मस्तिष्क रूप मे जाना जाता है वैसे ही महाप्राण व लघूप्राण एक दुसरे के पूरक है।
प्राण वायु का निवास ह्रदय है। उसी के पास नाग वायु है। अपान गुदा एवं मूत्राशय के बीच मूलाधार के निकट है। उसी के निकट कूर्मलघू प्राण है। समान व कृकल दोनो नाभि मे रहते है। उदान व देवदत्त का स्थान कण्ठ है। व्यान व धनञ्जय मे आकाश तत्त्व का मिश्रण होने से सम्पूर्ण शरीर नें व्याप्त है।
प्राण द्वारा ही शब्द व मस्तिष्क का पोषण होता है। अपान मे मलमुत्र स्वेद आदि का विसर्जन होता है। समान से पाचन परिवाक व उष्णता का संचार होता है। उदान विविध वस्तुयें बाहर से भीतर ग्रहण करता है।
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति परम मुलतत्व से होती है जिन्हें हम परमात्मा, परमेश्वर, ईश्वर,मानते है। इसकी उत्पत्ति एक परम सूक्ष्म परमाणु के रूप में होती है, जिसे पुराणों मे वामनावतार कहा जाता है। इस परमाणु की उत्पत्ति परमात्मा अर्थात शिव के लिंग और योनि से होती है।
वास्तव मे क्या है की मूलतत्त्व मे एक चक्रवात उत्पन्न होता है। जो अत्यंत सूक्ष्म होता है । यह उर्ध्वगामी भंवर शिवलिंग है और इसकी प्रतिक्रिया को रूप मे बनने वाली प्रतिकृति महायोनि। ये दोनो विपरीत विभवान्तर के कारण संयुक्त होकर समागमन करने लगते है और ब्रह्माण्ड का अंकुरित रूप जन्म लेता है। जो बढता ही चला जाता है और शक्ति के अनेकानेक रूपों को उत्पन्न कर नयी नयी संरचनाओं को उत्पन्न कर रहा है। ।ब्रह्माण्ड कि सभी ईकाइ इसी प्रक्रिया इन्हीं सूत्रों के अनुसार जन्म लेती है, विकसित होती एवं क्रिया करती है।
इनके नाभिकीय केन्द्र मे यह वामनावतार परमाणु स्थित है। वही मूलतत्त्व को खींचकर इकाई के शरीर का पोषण करता है।
प्रक्रिया वही है, जो ब्रह्माण्ड की है। ये परमाणु ब्रह्माण्ड के नाभिकीय कण है जो समस्त ब्रह्माण्ड मे इसके नाभिक से निकल कर विचरण करते है और इकाईयों को इसमे समा कर जीवन दे रहे है। यही योगतंत्र आत्मा है।
जो ब्रह्माण्ड मे है वही पिण्ड मे है इसका अर्थ है कि उनकी उर्जा, संरचना, क्रिया, सुत्र आदि एक है। योगतंत्र के संन्यासियों ने कहा कि हमारे अन्दर भी वही वामनावतार है ।उतनी ही शक्ति का है जो ब्रह्माण्ड के नाभिक के मध्य मे बैठा उसे संचालित पोषित कर रहा है।
अन्तर केवल इतना है कि स्थानीय इकाईयों एवं उर्जा धाराओं के प्रभाव से हमारा शरीर उतना सबल नही है ।परन्तु यदि हम इस केन्द्रीय कण को जाग्रत करें तो इस शरीर को असीमित शक्तियाँ प्रदान कर सकता है। चूंकि यह कण लिंग योनि की समागम शक्ति से संचालित हो रहा है और हमारा सर्किट भी इसलिए हम इस लिंग योनि को सशक्त करे क्रियाशीलता बढायें तो कोई भी सिद्धि प्राप्त कर सकते है। यहां तक की सदाशिव को भी प्राप्त कर सकते है।
यही कारण है की ध्यानतंत्र साधकों का एक सम्प्रदाय लिंग योनि के प्रतीक शिवलिंग को गले मे धारण करने लगा जो लिंगायत कहा जाता है। इस लिंगायत सम्प्रदाय का जन्म कौलमार्गी सम्प्रदाय से ही हुआ है।
कौलमार्गी के भी सिद्धान्त सुत्र वही है, परन्तु वे गले मे शिवलिंग नही पहनते है। लिंगायत सम्प्रदाय ने एक नयी तकनीक खोज निकाली इन्होंने कहा कि जब हम रति संलग्न होते है तो यह कण स्वयं ही क्रियाशील हो जाता है इसका कारण यह है कि शरीर की उर्जा मांग बढ जाती है।
इस क्रिया के लिए अधिक मूलतत्त्व की आवश्यकता होती है।इसको पूरा करने की जिम्मेदारी कण की होती है। अतः इसे क्रियाशीलता बढ़ानी पडती है। लिंगायत सम्प्रदाय ने कहा कि यदि चरम सुख और स्खलन से पुर्व ही भाव बदल बदलकर रति भाव को रोका और पुनः प्रारम्भ किया जाये तो इस अभ्यास से आत्मा रूपी कण को सबल सशक्त बनाकर विलक्षण प्रकार कि शक्तियों को प्राप्त किया जा सकता है।यहा तक कि सदाशिव को भी।





