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*नासा की रिसर्च : मंगल पर जीवन का पक्का सुबूत* 

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      डॉ. विकास मानव

    नासा के परसीवरेंस रोवर को एक धूल भरी नदी की तलहटी में कुछ मडस्टोन मिले हैं जिस पर ऐसे निशान हैं जिन्हें ‘लेपर्ड स्पॉट’ और ‘पॉपी सीड्स’ नाम दिया गया है.

    वैज्ञानिकों का मानना है कि इन निशानों में रासायनिक प्रतिक्रियाओं से पैदा हुए खनिज मौजूद हैं, जो प्राचीन मंगल ग्रह के सूक्ष्मजीवों से जुड़े हैं.

    हालांकि, इसकी भी संभावना है कि ये तत्व प्राकृतिक भूगर्भीय हलचलों की वजह से पैदा हुए हों, लेकिन प्रेस कांफ़्रेंस में नासा ने कहा कि ये निशान, मंगल पर जीवन होने के अबतक के सबसे स्पष्ट संकेत हैं.

    ये निष्कर्ष नासा के उस मानदंडों पर खरे उतरते हैं, जिसे वह ‘पोटेंशियल बायोसिग्नेचर’ कहता है. यानी ऐसा पदार्थ या संरचना जिसका जैविक स्रोत होता है. फिर भी जीवन की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी के बारे में निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले अधिक डेटा और अध्ययन की ज़रूरत होती है.

   इसका मतलब है कि ये संरचनाएं जैविक हैं या नहीं इसे सुनिश्चित करने के लिए नासा आगे बढ़ रहा है. इस बारे में ‘नेचर’ मैग्ज़ीन में प्रकाशित शोध के सह-लेखक और इम्पीरियल कॉलेज लंदन में खगोलीय वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर संजीव गुप्ता कहते हैं, “हमने पहले ऐसा कुछ नहीं देखा है, इसलिए यह बड़ी खोज है. हमें चट्टानों में ऐसी संरचनाएं मिली हैं जिन्हें अगर धरती पर देखा जाए तो सूक्ष्मजीव प्रक्रियाओं से जुड़े जीवविज्ञान के रूप में समझाया जा सकता है. हम यह नहीं कह रहे कि हमने जीवन खोज लिया है, लेकिन हम यह ज़रूर कह रहे हैं कि इस दिशा में खोज को और आगे बढ़ाने का मज़बूत कारण है.”

     नासा की एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर (साइंस मिशन डायरेक्टोरेट) डॉ. निकोला फ़ॉक्स ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, “यह किसी फ़ॉसिल या जीवाश्म जैसा है. यह कभी किसी भोजन का हिस्सा रहा हो सकता है.”

    लेकिन ये तत्व किन्हीं जीवाणुओं से बने हैं, इसकी पुष्टि तभी हो सकती है जब जांच के लिए उन चट्टानों के नमूनों को धरती पर लाया जाए.

     हालांकि नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी ईएसए ने नासा के सैंपल लाने के मिशन का प्रस्ताव दिया है लेकिन इस पर अभी तक अनिश्चितता है.

     अमेरिकी स्पेस एजेंसी फ़ंड में बड़ी कटौती का सामना कर रही है. इसे ट्रंप के 2026 के बजट में शामिल किया गया है और सैंपल लाने के वाला रिटर्न मिशन उनमें से एक है जिनके रद्द होने का ख़तरा है.

   आज मंगल एक ठंडा और बंजर रेगिस्तान है. लेकिन अरबों साल पहले इस पर सघन वायुमंडल और पानी होने के सबूत मिले हैं. इसी वजह से यहां जीवन के निशान खोजने की उत्सुकता बनी हुई है. परसीवरेंस रोवर को इसी काम के लिए भेजा गया था और यह 2021 में मंगल ग्रह की सतह पर उतरा था.

    पिछले चार सालों से यह रोवर जेज़ीरो क्रेटर नामक इलाक़े की खोज कर रहा है, जो कभी प्राचीन झील था जिसमें एक नदी आकर मिलती थी. रोवर ने पिछले साल नदी से बनी एक घाटी के तल पर ‘लेपर्ड प्रिंट’ जैसे निशान वाली चट्टानें तलाशी थीं. यह जगह “ब्राइट एंजल फ़ॉर्मेशन” के नाम से जानी जाती है.

    ये चट्टानें लगभग 3.5 अरब साल पुरानी हैं और “मडस्टोन” के नाम से जानी जाती हैं, जो मिट्टी से बनी महीन दानेदार चट्टान होती है. परसीवरेंस मिशन वैज्ञानिक और इस शोध पत्र के प्रमुख लेखक जोएल हुरोविट्ज़, जो न्यूयॉर्क में स्टॉनी ब्रुक यूनिवर्सिटी से हैं, उन्होंने बताया, “देखते ही हमें लगा कि इन चट्टानों में कोई दिलचस्प रसायनिक प्रतिक्रिया हुई होगी और हम उत्साहित हो गए.”

     जोएल हुरोविट्ज़ कहते हैं, “हमें लगता है कि हमें रासायनिक प्रतिक्रियाओं के सबूत मिले हैं जो झील की तलहटी में जमी कीचड़ में हुई होगी. ऐसा लगता है कि ये रासायनिक प्रतिक्रियाएं कीचड़ और कार्बनिक पदार्थों के बीच हुईं और इससे नए तत्व पैदा हुए.”

    धरती पर ऐसी ही परिस्थितियों में, आम तौर पर तब नए तत्व बनते हैं जब जीवाणुओं की वजह से रासायनिक प्रतिक्रिया होती है.

     वो कहते हैं, “यह उन संभावित व्याख्याओं में से एक है कि ये निशान इन चट्टानों में कैसे बने. यह अब तक हमारे पास मौजूद सबसे ठोस संभावित बॉयोसिग्नेचर के खोज जैसा लगता है.”

     वैज्ञानिकों ने इस बात की भी पड़ताल की है कि बिना कार्बनिक पदार्थों या जीवाणुओं के ऐसे तत्व कैसे बनते हैं और निष्कर्ष निकाला कि रासायनिक क्रियाओं के पीछे प्राकृतिक भूगर्भीय हलचलों का भी हाथ हो सकता है. हालांकि इसके लिए उच्च तापमान की ज़रूरत होती है और इन चट्टानों को देख कर नहीं लगता कि वो कभी गर्म रही हैं.

    हुरोविट्ज़ कहते हैं, “ग़ैर जीव विज्ञानी तरीक़ों को आजमाने में हमें कुछ मुश्किलें आईं, लेकिन हम उन्हें पूरी तरह से ख़ारिज नहीं कर सकते.”

    मार्स पर रहते हुए परसीवरेंस ने सैंपल भी इकट्ठा किए हैं, जिनमें ब्राइट एंगल फ़ॉर्मेशन में पाई गई चट्टानों के सैंपल भी हैं. इन्हें केन में सुरक्षित रखा गया है और मार्स की सतह पर रिटर्न मिशन के लिए इंतज़ार कर रहा है. लेकिन नासा के इस तरह के अभियान का भविष्य अनिश्चित है क्योंकि बजट में कटौती का ख़तरा मंडर रहा है, लेकिन चीन भी रिटर्न मिशन की कोशिश कर रहा है जिसकी शुरुआत 2028 में होनी है.

   हालांकि फैसले पर बहस जारी है लेकिन वैज्ञानिक जल्द से जल्द इसे वापस लाए जाने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. प्रोफ़ेसर गुप्ता कहते हैं, “हमें इस सैंपल को देखने की ज़रूरत है. मुझे लगता है कि अधिकांश वैज्ञानिक इन सैंपल्स की जांच धरती पर करना चाह रहे होंगे, इसीलिए इसे धरती पर लाने को हम प्राथमिकता दे रहे हैं.”

*मंगल द्वार : क्या भीतर हैं दूसरे ग्रह के लोग?*

    अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा पृथ्वी के पड़ोसी ग्रह मंगल पर भेजे गए ‘क्यूरोसिटी’ रोवर ने वहां से एक चौंकाने वाली तस्वीर भेजी है. इस तस्वीर में मंगल ग्रह के कठोर चट्टानों में बड़ी सुघड़ता से काटे गए गुफा का एक मुहाना सा दिख रहा है. कइयों ने इसे ‘दरवाज़े’ जैसी आकृति बताई है, तो कइयों ने कहा कि पृथ्वी से इतर किसी दूसरी सभ्यता के लोगों ने इस ‘रास्ते’ को बनाया होगा.

      नासा ने क्यूरोसिटी रोवर द्वारा मंगल ग्रह की सतह की खींची गई यह तस्वीर 7 मई को जारी की थी. नासा ने इस तस्वीर की पहचान ‘सोल 3466’ सिरीज़ की एक कड़ी के रूप में बताई. इसे ‘मार्स एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम’ की वेबसाइट पर कई फ्रेम में जारी किया गया है.

    यह तस्वीर ख़ास सिरीज़ का महज़ एक हिस्सा भर है. और संपूर्णता में देखने पर इसके आकार को लेकर बनने वाला नज़रिया बदल सा जाता है.

  नासा ने बताया, “यह किसी चट्टान में एक छोटी सी दरार का बहुत, बहुत, बहुत बड़ा शॉट है.”

     इसमें देखा जा सकता है कि जेज़ेरो क्रेटर की चट्टान में यह दरार बहुत छोटी है. इस क्रेटर को ​कुछ हफ़्ते पहले क्यूरोसिटी रोवर ने खोजा है. नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी यानी जेपीएल के वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस दरार का आकार बहुत छोटा यानी 45 सेंटीमीटर लंबा और 30 सेंटीमीटर चौड़ा है. नासा के अनुसार, “इस पूरी तस्वीर में लाइन से कई फ्रैक्चर हैं. यह दरार ऐसी जगह है जहां कई फ्रैक्चर एक दूसरे को काटते हैं.”

   ब्रिटेन के जियोलॉजिस्ट यानी भूवैज्ञानिक नील हॉजसन ने मंगल ग्रह की भू-आकृतियों का काफ़ी अध्ययन किया है. उनका कहना है कि यह तस्वीर ‘उत्सुकता पैदा करने वाली’ तो है. मुझे यह प्राकृतिक कटाव लगता है. इस तस्वीर में चट्टान की जो बनावट दिख रही है, उसमें गाद और रेत की कई परतें हैं.’

    हॉजसन ने बताया, ‘अवसादी चट्टान बनाने वाले हालातों में लगभग 400 करोड़ साल पहले ये परतें जमा होती गईं. यह परत शायद किसी नदी में या हवा के झोंके से टीले के रूप में जमा हुई थी.”

     सतह पर होने वाले फ्रैक्चर स्वाभाविक रूप से ऐसी दरारें बना सकते हैं. इस तरह का कटाव तब बनता है जब कोई फ्रैक्चर ऊपर से नीचे बने और चट्टानों की परतों को काट दे.

*मंगल ग्रह के बारे में 10 ख़ास बातें :*

      1- हमारे सौर मंडल में ग्रहों की बात करें तो मंगल सूरज से 14.2 करोड़ मील की दूरी पर है. सौर मंडल में धरती तीसरे नंबर पर है जिसके बाद चौथे नंबर पर मंगल है. धरती सूरज से 9.3 करोड़ मील की दूरी पर है.

     2- धरती की तुलना में मंगल ग्रह लगभग इसका आधा है. जहां धरती का व्यास 7,926 मील है, मंगल का व्यास 4,220 मील है. लेकिन वजन की बात की जाए को मंगल धरती के दसवें हिस्से के बराबर है.

     3- मंगल सूरज का पूरा चक्कर 687 दिनों में लगाता है. इस आधार पर धरती की तुलना में मंगल सूरज का चक्कर लगाने में दोगुना वक़्त लेता है और यहां एक साल 687 दिनों का होता है.

    4- मंगल पर एक दिन (जिसे सोलर डे कहा जाता है) 24 घंटे 37 मिनट का होता है.

   5- कँपकँपा देने वाली ठंड, धूल भरी आँधी का ग़ुबार और फिर बवंडर-पृथ्वी के मुक़ाबले ये सब मंगल पर कहीं ज़्यादा है. माना जाता है कि जीवन के लिए मंगल की भौगोलिक स्थिति काफ़ी अच्छी है.

   गर्मियों में यहाँ सबसे ज़्यादा तापमान होता है 30 डिग्री सेल्सियस और जाड़े में यह शून्य से घटकर 140 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है.

      6- धरती की तरह मंगल में भी साल में चार मौसम आते हैं- पतझड़, ग्रीष्म, शरद और शीत. धरती की तुलना में मंगल में हर मौसम लगभग दोगुना वक्त तक रहता है.

    7- धरती और मंगल पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति अलग होने के कारण धरती पर 100 पाउंड वज़न वाला व्यक्ति मंगल पर 38 पाउंड वज़न का होगा.

    8- मंगल के पास दो चांद हैं- फ़ोबोस जिसका व्यास 13.8 मील है और डेमियोस जिसका व्यास 7.8 मील है.

    9- मंगल और धरती दोनों ही चार परतों से बने हैं. पहली पर्पटी यानी क्रस्ट जो लौह वाले बसाल्टिक पत्थरों से बना है. दूसरा मैंटल जो सिलिकेट पत्थरों से बना है.

     तीसरे और चौथे हैं बाहरी कोर और आंतरिक कोर. माना जाता है कि ये धरती के कोर की तरह लोहे और निकल से बने हो सकते हैं. लेकिन ये कोर ठोस धातु की शक्ल में है या फिर ये तरल पदार्थ से भरा है अभी इसके बारे में पुख़्ता जानकारी मौजूद नहीं है.

    10- मंगल के वातारण में 96 फ़ीसदी कार्बन डाई ऑक्साइड है, 1.93 फ़ीसदी आर्गन, 0.14 फ़ीसदी ऑक्सीजन और 2 फ़ीसदी नाइट्रोजन है. यहां के वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड के निशान भी पाए गए हैं.

Ramswaroop Mantri

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