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*क्या मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने दाखिल किया है हिंदू विरोधी हलफनामा*

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सोशल मीडिया पर कुछ स्क्रीनशॉट्स वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार हिंदू-विरोधी है। वायरल स्क्रीनशॉट्स सुप्रीम कोर्ट में चल रहे OBC आरक्षण के हलफनामा के बताए गए, जिनमें कुछ ऐसे विवादित बयान थे जो हिंदू सभ्यता को निशाना बनाने वाले विवादित दावों से जुड़े थे।

इन स्क्रीनशॉ्टस के सोशल मीडिया पर वायरल होने के कुछ घंटों बाद ही 1 अक्टूबर 2025 को मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने ‘हिंदू-विरोधी’ आरोपों पर फैक्ट-चेक जारी कर दिया।

ट्विटर पर वायरल कुछ स्क्रीनशॉट्स में और भी अजीब बातें लिखी दिखीं। एक जगह दावा किया गया था कि रामायण में ‘ऋषि शंबूक’ की हत्या जाति उत्पीड़न का उदाहरण है। लेकिन सच्चाई ये है कि श्रीराम ने शंबूक को उसकी जाति की वजह से नहीं मारा था बल्कि उसके इरादे माता पार्वती के प्रति गलत थे, इसलिए उसे दंड दिया गया।

एक और दावे में कहा गया कि मनुस्मृति में शूद्रों की जानवरों से तुलना करके उन्हें अपमानित किया है। इसमें ये भी लिखा था कि अंग्रेजों के सुधार और पेरियार की ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की वजह से जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ। यहाँ तक कि इस दस्तावेज में ये दावा भी किया गया कि हिंदू समाज को जानबूझकर सदियों तक बँटा हुआ रखा गया ताकि ऊँची जातियों का वर्चस्व बना रहे।

मनुस्मृति को लेकर अक्सर हिंदुओं पर आरोप लगाए जाते हैं लेकिन जो लोग मनुस्मृति की सबसे ज्यादा आलोचना करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद हिंदू कोड बिल बनाते समय मनुस्मृति का हवाला दिया था और उससे मदद ली थी।

आलोचना का दूसरा बड़ा हिस्सा पेरियार को लेकर है। कहा जाता है कि जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ करने का श्रेय ई.वी. रामास्वामी यानी पेरियार को जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि पेरियार खुले तौर पर हिंदू-विरोधी विचारों वाले व्यक्ति थे। इतना ही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक उनसे नाराज रहते थे।

नेहरू ने 5 नवंबर 1957 को मद्रास के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कामराज को लिखे एक पत्र में साफ लिखा था, “मैं ई.वी. रामास्वामी नायकर द्वारा लगातार चलाए जा रहे एंटी-ब्राह्मण अभियान से बेहद दुखी हूँ। मैंने पहले भी आपको इस बारे में लिखा था और मुझे बताया गया था कि इस मामले पर विचार किया जा रहा है।”

नेहरू ने अपने पत्र में और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था। उन्होंने लिखा, “मुझे लगता है कि रामास्वामी नायकर बार-बार वही बातें दोहरा रहे हैं और लोगों को उकसा रहे हैं कि वे मौका आने पर छुरा भोंकें और हत्या करें। ऐसी बातें केवल कोई अपराधी या पागल व्यक्ति ही कह सकता है।”

प्रधानमंत्री नेहरू ने मद्रास के मुख्यमंत्री से कहा, “मैं उन्हें ठीक से नहीं जानता कि तय कर सकूँ वे असल में क्या हैं, लेकिन एक बात साफ है कि इस तरह की बातें देश पर बहुत ही बुरा असर डाल रही हैं। तमाम असामाजिक और आपराधिक तत्व यह मानने लगते हैं कि वे भी इसी तरह की हरकतें कर सकते हैं।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का मानना ​​था कि पेरियार जैसे ब्राह्मण-विरोधी ‘कार्यकर्ताओं’ को पागलखाने में रखा जाना चाहिए जहाँ उनके ‘विकृत दिमागों’ का इलाज किया जा सके।

इस पूरे मुद्दे ने सोशल मीडिया पर गुस्सा भड़का दिया। खासकर हिंदू संगठनों और उनसे जुड़े लोगों ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसने अदालत के हलफनामे में कथित तौर पर ‘वामपंथी प्रोपेगेंडा’ का समर्थन करके अपनी वैचारिक जड़ों से गद्दारी की है। कई घंटों तक ‘एंटी-हिंदू’ कहकर सरकार के खिलाफ हैशटैग ट्रेंड होते रहे, जिसे विपक्षी दलों ने और हवा दी।

हलफनामा नहीं, कॉन्ग्रेस-कालीन आयोग की रिपोर्ट
मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने जारी किए स्पष्टीकरण में साफ किया कि ये टिप्पणियाँ उनके हलफनामें का हिस्सा नहीं है। सरकार ने बताया कि विवादित कन्टेन्ट रामजी महाजन की अध्यक्षता वाले मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतिम रिपोर्ट से लिया गया है, जिसका गठन 17 नवंबर 1980 को कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुआ था। आयोग ने 22 दिसंबर 1983 को अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

Ramswaroop Mantri

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