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*जंगे आजादी के सिपाही: जीजी नहीं रहे*

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प्रोफेसर राजकुमार जैन
गुणवंतराय गणपत लाल पारीख जिनको अदब से जीजी कहा जाता था ‌आज के दौर में अपने आप में एक पहेली थे।
1942 में 17 साल की उम्र में जब वह पढ़ ही रहे थे गांधी जी के आवाहन, पर “अंग्रेजों भारत छोड़ो‌” के जंगे आजादी में कूदने के कारण 10 महीने के कारावास‌ को भोगा था। 80 साल तक सोशलिस्टों के संघर्ष, रचना निर्माण ‌ टूट मिलन में पूरी मुस्तैदी से अपनी भूमिका निभाते रहे। उनकी जिंदगी में एक पल भी ऐसा नहीं आया जब उन्होंने समाजवादी तहरीक, विरासत,‌ पार्टी से नाता तोड़कर किसी और ‌ विचारधारा, पार्टी की तरफ झांका भी हो।


किशोर जीजी के जेल जाने पर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के समाजवाद का ऐसा रंग चढ़ा कि ताउम्र‌ उन्होंने इसी तहरीक में गुजार दी। मुंबई के भूतपूर्व मेयर तथा ‘साइमन गो बैक’ ‌ ‘भारत छोड़ो’ का नारा देने वाले युसूफ मेहर अली और अच्युत पटवर्धन जैसे नेताओं की संगत में वे समाजवादी विचारधारा से बंध गए। पेशे से चिकित्सक जीजी सोशलिस्ट तहरीक के हर उतार चढ़ाव में पहचान के तौर पर प्रजा समाजवादी पार्टी तथा उस गुट से हमेशा खुले रूप से न केवल जुड़े रहे, जमकर शिरकत भी की।
उन्होंने हमेशा अपने को संगठन के प्रचार प्रसार, विस्तार में ही मशगूल रखा। एमपी, एमएलए, मंत्री बनने की किसी दौड़ में कभी भी शामिल नहीं हुए। जीजी के खाते में एक और बड़ा यश जाता है कि संघर्षों के साथ-साथ रचना के कार्यों में भी इन्होंने उसी शिद्दत से अपने को खपाया। 1946 में अंग्रेजी में “जनता” साप्ताहिक को शुरू करके मरते दम तक उसको चलाया। युसूफ मेहर अली के इस शैदाई ने उन्हीं के नाम पर मुंबई के पास पनवेल में “यूसुफ मेहर अली सेंटर” की स्थापना कर स्वास्थ्य‌, शिक्षा, ग्रामीण विकास महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, ‌ रोजगार उपलब्ध कराने ‌,‌ छोटे उद्योगों के जरिए गांधीवादी अर्थव्यवस्था का मॉडल पेश करने का प्रयास किया।”राष्ट्र सेवा दल” जैसे संगठनों की मार्फत ‌ अनगिनत कार्यकर्ताओं को वैचारिक एवं अन्य गतिविधियों से जोड़ा।
जीजी एक और वजह से भी हमेशा याद आते रहेंगे कि वह केवल दिखावे के बातूनी सोशलिस्ट नहीं थे। जब जहां जुल्म ज्यादती, गैर इंसाफी तथा नागरिक हक्कूको पर खतरा आया तो उसके खिलाफ सड़क पर उतरकर उससे लड़े भी। आपातकाल में न केवल वे उनकी पत्नी मंगला पारेख, तथा बेटी सोनल तीनों आपातकाल का विरोध करते हुए जेल गए, यह शायद हिंदुस्तान में एक अकेली ही नजीर होगी।
हिंदुस्तान के सबसे उम्रदराज, तजुर्बेकार तथा असूलों के पाबंद होने कारण पूरे मूल्क के सोशलिस्ट उनसे वक्त बे वक्त न केवल सलाह मशवरा करते थे, उनकी सलाह को मानना भी जरूरी मानते रहे हैं। उनकी वैचारिक जीजिविषा देखिए 100 वर्ष की आयु में बिस्तर पर लेटे हुए भी पुणे में आयोजित समाजवादी एकजुटता सम्मेलन की पूरी रूपरेखा तथा गतिविधियों में रुचि लेते हुए नजर रख रहे थे। उनकी चाहत के अनुसार ‌ दिवंगत होने के बाद उनका शरीर जेजे मेडिकल कॉलेज के‌ छात्रों की‌ तालीम के लिए भेज दिया गया।
मेरा‌ उनसे परिचय ‌ लोहिया, मधु लिमए, राजनारायण के कट्टर अनुयायी के रूप में शुरू में हुआ था। वे जब कभी दिल्ली आते तो उनके साथ उनकी पत्नी मंगला जी भी आती थी तथा वह मधु लिमए के घर मिलने के लिए आते थे उस समय उनके लिए चाय कॉफी बनाने की जिम्मेदारी मेरी रहती थी। उनका वात्सल्यपूर्ण व्यवहार तथा उनकी जिंदगी के किस्सो को अक्सर सुनता था जिसके कारण उनके प्रति मेरा आदर, अनुराग बढ़ता गया। उनके जाने से सोशलिस्ट तहरीक का ऐसा नुमाइंदा जिसने आचार्य नरेंद्रदेव, युसूफ मेहर अली, ‌ अच्युत पटवर्धन, कमला देवी चट्टोपाध्याय, ‌ जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, एसएम जोशी, नानाजी गोरे के साथ-साथ दूसरी ‌ कतार के नेता मधु लिमए, राज नारायण, प्रेम भसीन,‌ कर्पूरी ठाकुर, मधु दंडवते, मृणाल गोरे, प्रमिला दंडवते, मामा बालेश्वर दयाल,
अर्जुन सिंह भदोरिया, मनीराम बागड़ी, किशन पटनायक, बदरी विशाल पित्ती, गोलप बरबोरा जैसे नेताओं के साथ भी काम किया तथा हमारी पीढ़ी को भी रोशनी प्रदान की।
नमन है, जीजी के‌ महाप्रस्थान पर,

Ramswaroop Mantri

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