-तेजपाल सिंह ‘तेज’
कोविड-19 महामारी की अराजकता के बीच मार्च 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “PM CARES Fund” की घोषणा की।उस वक्त राष्ट्र भय, अनिश्चितता और आपदा के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था, जहाँ हर भारतीय योगदान देना चाहता था — कोई अपनी तनख्वाह का हिस्सा दे रहा था, कोई CSR फंड से मदद कर रहा था, कोई अपनी संस्था के जरिये राहत सामग्री भेज रहा था। “पीएम केयर” का नाम सुनते ही यह विश्वास जागा कि यह वही कोष है जो “देश की सर्वोच्च व्यवस्था” की निगरानी में है और जो पारदर्शी रूप से जनहित में खर्च होगा।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, यह विश्वास सवालों में बदलने लगा।
क्योंकि — तब भरोसे का सवाल सत्ता से बड़ा हो जाता है —
· कोष की कानूनी स्थिति अस्पष्ट है,
· इसका लेखा-जोखा सार्वजनिक नहीं,
· और इसकी जवाबदेही किसी संवैधानिक संस्था के प्रति नहीं।
·
अब पाँच साल बाद, दिल्ली हाईकोर्ट और नागरिक समाज की अदालतों में यह प्रश्न गूँज रहा है:
क्या यह फंड वास्तव में “पीएम का” है — या “जनता का”?
“PM CARES Fund” की घोषणा की, तो देश-भर से इस कोष में दान की बाढ़ आ गई। इसे “राष्ट्रीय आपदा से लड़ने में जनता की सहभागिता” का प्रतीक बताया गया। लेकिन पाँच साल बाद, यह कोष भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कठिन प्रश्न बन चुका है—
· क्या यह सरकारी कोष है या निजी ट्रस्ट?
· क्या इसमें लोक लेखा परीक्षण (CAG audit) और जन सूचना का अधिकार (RTI) लागू होना चाहिए और
· क्या एक लोक पद पर बैठे व्यक्ति को राजकीय प्रतीक और पदनाम का प्रयोग किसी निजी कोष के लिए करने का अधिकार है?
1. संवैधानिक संदर्भ: “राज्य” और “पब्लिक अथॉरिटी” की परिभाषा:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के अनुसार “राज्य” में केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, संसद और उनके अधीन आने वाले संस्थान शामिल हैं। RTI अधिनियम की धारा 2(h) भी कहती है कि “कोई भी संस्था जो सरकार द्वारा स्थापित या नियंत्रित हो या जो सरकारी धन से वित्तपोषित हो, वह ‘पब्लिक अथॉरिटी’ मानी जाएगी।” अब सवाल उठता है—
अगर पीएम केयर फंड:
· प्रधानमंत्री कार्यालय से संचालित हो,
· सरकारी वेबसाइट (.gov.in) पर चलाया जाए,
· और उसके ट्रस्टी वही मंत्री हों जो सरकार में हैं,
· तो क्या यह “सरकारी नियंत्रण” की श्रेणी में नहीं आता?
सरकार का उत्तर: नहीं… यह एक “स्वतंत्र सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट” है।
आलोचकों का उत्तर: ऐसा दावा तथ्यात्मक रूप से असंगत है, क्योंकि यह न केवल सरकारी प्रतिष्ठानों से संचालित होता है बल्कि उसके प्रतीकों और पदनाम का भी उपयोग करता है।
2. ट्रस्ट की संरचना और हितों का टकराव:
· ट्रस्ट डीड के अनुसार— प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष हैं; गृह, रक्षा और वित्त मंत्री इसके सदस्य। यह संयोजन स्वयं में “संविधानिक और निजी भूमिका” के बीच एक पतली रेखा बनाता है।
· हितों का टकराव (Conflict of Interest) तब पैदा होता है जब कोई व्यक्ति नीति-निर्माता भी हो और उस नीति से लाभ पाने वाले संस्थान का भी सदस्य हो।
कानून में ऐसे उदाहरणों को विश्वासगत कर्तव्य का उल्लंघन (“fiduciary breach”) कहा जाता है — यानी विश्वास संबंध का उल्लंघन।
यह स्थिति भारतीय ट्रस्ट अधिनियम (1882) और महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम (1950) — दोनों के विपरीत प्रतीत होती है।
3. वित्तीय पारदर्शिता का अभाव:
PM CARES की वेबसाइट पर केवल शुरुआती वर्षों (2020–22) की संक्षिप्त रिपोर्ट प्रकाशित की गयी; लेकिन वित्तीय वर्ष 2023–24 तक की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं है।
यह कोष न तो CAG (Comptroller and Auditor General) द्वारा ऑडिट होता है,
न ही इसका विस्तृत व्यय-विवरण सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध है। अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में, अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में “Prime Minister’s Relief Funds” संसद की लेखा समिति या सार्वजनिक लेखा परीक्षा के अधीन होते हैं। भारत में इस कोष का इससे बाहर रहना अस्वाभाविक लगता है।
4. CSR और वेतन कटौती विवाद: कई सरकारी कर्मचारियों और पीएसयू कंपनियों ने PM CARES में दान दिया —रेलवे, रक्षा मंत्रालय और कई विद्युत-उद्यमों के कर्मचारियों की वेतन कटौती की रिपोर्टें आईं। केंद्रीय सरकार कहती है कि यह “स्वैच्छिक योगदान” था, लेकिन आलोचक मानते हैं कि सरकारी निर्देशों और संस्थागत दबाव के कारण यह “अनिवार्य-सा” बन गया। इसी तरह, कई कंपनियों ने अपने CSR बजट से दान दिया — जबकि CSR (Corporate Social Responsibility) का उद्देश्य निजी, सामाजिक कल्याणकारी संस्थाओं को सहायता देना है, किसी अर्द्ध-सरकारी ट्रस्ट को नहीं।
5. FCRA छूट और विदेशी योगदान:
विदेशी कंपनियों से प्राप्त चंदे पर सवाल इसलिए उठा क्योंकि किसी भी NGO को FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के तहत अनुमति लेनी पड़ती है। लेकिन पीएम केयर फंड को इस अधिनियम से छूट दी गई। यह “नीतिगत विशेषाधिकार” (policy privilege) है या “अवैध छूट” — यह अब न्यायिक व्याख्या का विषय है।
6. राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग:
राष्ट्रीय प्रतीक दुरुपयोग निवारण अधिनियम, 2005 के तहत किसी निजी संस्था को भारत सरकार के चिह्न, नाम या प्रतीक के उपयोग की अनुमति नहीं होती। फिर भी, PM CARES ने “अशोक स्तंभ” और “भारत सरकार” के प्रतीक का उपयोग किया। यदि सरकार कहती है कि यह सरकारी संस्था नहीं, तो प्रतीक का उपयोग कानूनी रूप से गलत ठहर सकता है।
7. न्यायपालिका की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट (2020) ने यह कहा था कि “PM CARES Fund एक स्वैच्छिक सार्वजनिक ट्रस्ट है, और इसे NDRF में विलय करना आवश्यक नहीं।” परंतु इस निर्णय में पारदर्शिता और जवाबदेही की अनिवार्यता पर विचार नहीं हुआ। वर्तमान में दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही याचिकाओं में मुख्य प्रश्न यही है — क्या इसे “राज्य निधि” घोषित किया जाए ताकि यह RTI और CAG के दायरे में आए?
निष्कर्ष: पारदर्शिता ही सर्वोच्च देशभक्ति है ;
PM CARES फंड की स्थापना निस्संदेह एक राष्ट्रीय आपदा की पृष्ठभूमि में हुई थी —
उसकी मंशा शायद ईमानदार रही हो। लेकिन जब किसी लोकपदधारी के नाम, प्रतीक और सरकारी तंत्र का उपयोग किया जाए, तो पारदर्शिता से बचना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन बन जाता है। यह प्रश्न किसी व्यक्ति या दल का नहीं —राज्य की सीमाओं, नागरिकों की जवाबदेही और लोकतंत्र की आत्मा का है। क्योंकि लोकतंत्र में विश्वास तभी टिकता है जब सत्ता के केंद्र को भी जांच के घेरे में आने में डर न हो।
जवाबदेही ही राष्ट्रवाद की आत्मा है:
किसी लोकतंत्र की मजबूती का माप उसकी सड़कों या इमारतों से नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि वह अपने नागरिकों से सच बोलने में कितनी ईमानदार है। PM CARES फंड ने देश के करोड़ों लोगों की उदारता को एकत्र किया, परंतु उसी जनता से उसका लेखा छिपाना, उस उदारता का अपमान है। यह सवाल नरेंद्र मोदी या किसी दल का नहीं, यह सवाल उस व्यवस्था का है जो कहती है कि “प्रधानमंत्री” शब्द केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक संवैधानिक पद का प्रतीक है। और जब उस पद के नाम पर कोई कोष बनाया जाए, तो वह जन – संपत्ति मानी जानी चाहिए, निजी ट्रस्ट नहीं। जब एक लोकतंत्र में शासन और जनता के बीच भरोसे की खिड़की बंद हो जाती है, तो सत्ता चाहे जितनी ऊँची हो, पारदर्शिता की रोशनी भीतर नहीं पहुँचती। इसलिए यह लेख किसी विरोध का नहीं — एक आग्रह का लेख है–“प्रधानमंत्री चाहे कोई भी हो, जनता का धन जनता को जवाब देना चाहिए।” यही लोकतंत्र की आत्मा है। और यही जवाबदेही — इस राष्ट्र की सबसे बड़ी राष्ट्रभक्ति।
जवाबदेही ही राष्ट्रवाद की आत्मा है
किसी लोकतंत्र की मजबूती का माप उसकी सड़कों या इमारतों से नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि वह अपने नागरिकों से सच बोलने में कितनी ईमानदार है। PM CARES फंड ने देश के करोड़ों लोगों की उदारता को एकत्र किया, परंतु उसी जनता से उसका लेखा छिपाना, उस उदारता का अपमान है। यह सवाल नरेंद्र मोदी या किसी दल का नहीं, यह सवाल उस व्यवस्था का है जो कहती है कि “प्रधानमंत्री” शब्द केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक संवैधानिक पद का प्रतीक है। और जब उस पद के नाम पर कोई कोष बनाया जाए, तो वह जन- संपत्ति मानी जानी चाहिए, निजी ट्रस्ट नहीं। जब एक लोकतंत्र में शासन और जनता के बीच भरोसे की खिड़की बंद हो जाती है, तो सत्ता चाहे जितनी ऊँची हो, पारदर्शिता की रोशनी भीतर नहीं पहुँचती। इसलिए यह लेख किसी विरोध का नहीं —एक आग्रह का लेख है– “प्रधानमंत्री चाहे कोई भी हो, जनता का धन जनता को जवाब देना चाहिए।” यही लोकतंत्र की आत्मा है। और यही जवाबदेही — इस राष्ट्र की सबसे बड़ी राष्ट्रभक्ति।
निष्कर्षात्मक टिप्पणी):
भारत को उस दिशा में बढ़ना चाहिए जहां “Prime Minister’s Trust” या “Public Charitable Fund” जैसी संस्थाएँ — न केवल जन-दान लें, बल्कि जनता को जवाब भी दें।
अगर दान “जनता का” है, तो उसका लेखा-जोखा भी जनता का अधिकार होना चाहिए। (संदर्भThttps://youtu.be/z8N_hlWcEJE?si=Q1Nfc37QvnhTxHzi) 0000





