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*बिहार के 4 नेता जो कपड़े की तरह बदलते हैं पार्टियां*

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पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले भी बदलाव की बयार बहने लगी है. जेडीयू के साथ रहे परबत्ता के विधायक संजीव ने हाल ही आरजेडी ज्वाइन किया. देवेंद्र प्रसाद यादव भी पार्टी बदलकर अब जन सुराज में शामिल हो गए हैं. उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही बदलाव की बयार गति पकड़ेगी. जिन्हें अपने दल में इस बार टिकट कटने का आभास हो गया है, वे अभी से दूसरी पार्टियों के टिकट के जुगाड़ में लग गए हैं. विलय तो चुनाव के वक्त नहीं होता, लेकिन बाद में अपनी सहूलियत के मुताबिक एक पार्टी दूसरे दल में विलय कर लेती है. आज ऐसे कुछ नामों पर यहां चर्चा करेंगे, जो दल बदल या पाला बदल के लिए चर्चित रहे हैं.

JDU नीतीश कुमार की चौथी पार्टी

जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के सीएम नीतीश कुमार पाला बदल के लिए बदनाम रहे हैं. नीतीश ने अपने राजनीतिक जीवन में दल बदल तो नहीं किया, लेकिन जेडीयू उनकी चौथी पार्टी है. उनका राजनीति में प्रवेश जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से उपजी जनता पार्टी में हुआ था. बाद में लालू प्रसाद यादव के साथ वे जनता दल में आ गए.

जनता दल में नीतीश कुमार के साथ लालू प्रसाद यादव भी रहे. बाद में लालू ने राष्ट्रीय जनता दल बनाया तो नीतीश कुमार ने जार्ज फर्नांडीस और शरद यादव के साथ समता पार्टी बनाई. कुछ समय बाद समता पार्टी का अस्तित्व भी समाप्त हो गया और जनता दल (यूनाइटेड) अस्तित्व में आया.समता पार्टी के समय से ही नीतीश भाजपा के साथ रहे. बीते 20 साल में तीन ऐसे मौके आए, जब नीतीश ने सियासी खेमा बदला. 2013 में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा ने पीएम फेस घोषित किया तो नीतीश ने एनडीए से अलग हो गए. 2015 का विधानसभा चुनाव उन्होंने महागठबंधन में रह कर लड़ा.

2017 में वे फिर भाजपा के साथ आ गए. 2022 में नीतीश का मन फिर बदला और उन्होंने महागठबंधन की सरकार बना ली, लेकिन यह रिश्ता लंबा नहीं चला. 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले वे भाजपा के साथ फिर आ गए. तब से एनडीए में हैं.

कुशवाहा की पार्टी JDU में समा गई

पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी तीसरी बार राजनीतिक दल बनाया है. सबसे पहले उन्होंने राष्ट्रीय समता पार्टी (RSM) बनाई. उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) का गठन किया. आरएलएसपी का 2021 में उन्होंने जेडीयू में विलय कर दिया. कुशवाहा इतने तक ही नहीं रुके. नीतीश कुमार से मतभिन्नता के कारण वे फिर अलग हो गए और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) नाम की नई पार्टी का गठन किया.

आरएलएम अभी एनडीए के साथ है. 2014 में भी उपेंद्र् कुशवाहा की तत्कालीन आरएलएसपी एनडीए का हिस्सा थी. नरेंद्र मोदी की लहर में कुशवाहा की पार्टी के भी 3 लोग सांसद बन गए. उपेंद्र कुशवाहा को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिली. फिलवक्त कुशवाहा राज्यसभा के सदस्य हैं. बिहार में उन्हें कुशवाहा समाज का प्रखर नेता माना जाता है.

आरसीपी सिंह की चौथी पार्टी JSP

नौकरशाह से नेता बने आरसीपी सिंह की पहली पार्टी जेडीयू रही. नीतीश कुमार के अति प्रिय लोगों में उनकी गिनती होती थी. नीतीश ने उन्हें राज्यसभा भी भेजा. सदस्यता की अवधि समाप्त होने पर नीतीश ने दोबारा उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा. इससे उनके मन में नाराजगी के भाव जगे. नाराजगी की भी वजह थी. आरसीपी ने नीतीश की मर्जी के खिलाफ केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का फैसला कर लिया.

दरअसल, 2019 में जब एनडीए की केंद्र में सरकार बनी तो अकेले बहुमत में रहने के कारण भाजपा ने सहयोगी दलों के एक सदस्य को मंत्रिमंडल में शामिल होने का फैसला किया. नीतीश ने एक पद लेने से इनकार कर दिया था. उन्होंने यह भी घोषणा कर दी कि एनडीए में तो बने रहेंगे, लेकिन मंत्रिमंडल में जेडीयू शामिल नहीं होगा.

इसके बावजूद जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते उन्होंने मोदी मंत्रिमंडल में एक पद का ऑफर स्वीकार कर लिया. नीतीश कुमार से उनकी खटपट की यही वजह थी. जेडीयू छोड़ने के बाद उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली. पर, भाजपा ने उन्हें तवज्जो नहीं दी तो अलग होकर उन्होंने आप सबकी आवाज पार्टी (ASAP) बनाई. उन्होंने राजनीति में पैर जमाने की कोशिश तो की, लेकिन जल्द ही उन्हें अपनी औकात का पता चल गया. आखिरकार उन्होंने प्रशांत किशोर की नेतृत्व वाली जन सुराज पार्टी में अपनी पार्टी का विलय कर दिया.

पप्पू यादव ने कई बार पार्टी बदली

राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय सांसद चुने गए हैं. उनका भी दल बदल और विलय का इतिहास रहा है. वर्ष 1991, 1996, 1999, 2004, 2014 और 2024 में बिहार के कई निर्वाचन क्षेत्रों से वे कभी निर्दलीय तो कभी समाजवादी पार्टी, लोक जनता पार्टी, आरजेडी से विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ते रहे हैं.

उन्होंने अपनी जन अधिकार पार्टी का लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस में विलय कर दिया था, लेकिन लालू यादव और तेजस्वी के अड़ जाने के कारण कांग्रेस के सिंबल से वे वंचित रह गए. तब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा. कांग्रेस की बैठकों-सभाओं में वे शामिल होते रहे हैं, लेकिन तकनीकी कारणों से वे निर्दलीय सांसद ही कहलाएंगे.

Ramswaroop Mantri

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