संवैधानिक इतिहास में संशोधन की एक छुपी कवायद चल रही है। कुछ टिप्पणीकार अब तर्क देने लगे हैं कि संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बेनेगल नरसिंह राव (बीएन राव) ही भारत के संविधान के वास्तविक निर्माता थे और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने तो पहले से तैयार संविधान को केवल ऊपरी तौर पर झाड़-पोंछ कर चमका दिया था। यह तर्क भले ही अकादमिक और मासूम लगे, लेकिन ऐसा नहीं है। यह भारत की स्थापना की कहानी में दलितों की भूमिका को कम करने और गणतंत्र के निर्माण में डॉ. आंबेडकर द्वारा समाहित नैतिक बल को मिटाने की एक कोशिश है।
आंबेडकर और राव एक दूसरे के पूरक थे, प्रतिस्पर्धी नहीं
वे दोनों लोग संविधान के निर्माण के लिए अपरिहार्य थे, लेकिन उनकी भूमिकाएं पूरी तरह से अलग थीं। सर बीएन राव एक प्रतिष्ठित सिविल सेवा अधिकारी और न्यायविद थे। उन्हें जुलाई 1946 में संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था। उनका कार्य तकनीकी और प्रारंभिक था। राव ने ब्रिटिश भारत में, 1935 के भारत सरकार अधिनियम का मसौदा तैयार करने में मदद की थी। ग्यारह साल बाद, उन्हें संविधान सभा की समितियों की रिपोर्टों और अन्य संविधानों के अपने अध्ययन के आधार पर संविधान का एक कार्यकारी मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी।
उन्होंने अमेरिकी, कनाडाई, आयरिश, ऑस्ट्रेलियाई और वीमर (जर्मन) मॉडलों की जांच की और फेलिक्स फ्रैंकफर्टर और हेरोल्ड लास्की जैसे न्यायविदों से परामर्श किया। अक्टूबर 1947 में, उन्होंने 243 लेखों और 13 अनुसूचियों के साथ अपना मसौदा प्रस्तुत किया। राव के दस्तावेज़ ने संविधान सभा को एक शुरुआती आधारबिंदु प्रदान किया था।
आंबेडकर का कार्य एक अलग ही स्तर का था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, उन्हें एक कानूनी मसौदे को एक राजनीतिक अनुबंध में बदलना था। विभाजन की उथल-पुथल और महात्मा गांधी की हत्या जैसे झंझावातों के दौर से गुज़ारते हुए वे संविधान को मुकाम तक ले गये और संविधान सभा में इसके प्रावधानों का खंड-दर-खंड बचाव किया। उनकी ज़िम्मेदारी न केवल पाठ को परिष्कृत करने की थी, बल्कि तीव्र रूप से विभाजित हितों के बीच आम सहमति बनाने की भी थी। राव ने इसका ढाँचा तैयार किया। आंबेडकर ने इसे न्याय का एक जीवंत साधन बनाया।
आंबेडकर ने राव के योगदान को कभी नकारा नहीं। 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा को दिये अपने समापन भाषण में उन्होंने कहा: “जो श्रेय मुझे दिया जाता है, वह वास्तव में मेरा नहीं है। इसका कुछ श्रेय संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बीएन राव को जाता है, जिन्होंने प्रारूप समिति के विचारार्थ संविधान का एक कच्चा मसौदा तैयार किया था।”
उन्होंने यह भी कहा, “इसका कुछ श्रेय प्रारूप समिति के सदस्यों को भी जाता है, जिन्होंने 141 दिनों तक बैठक की… इसका कहीं ज़्यादा श्रेय संविधान के मुख्य प्रारूपकार श्री एस.एन. मुखर्जी को भी जाता है। जटिल से जटिल प्रस्तावों को सरलतम और स्पष्ट कानूनी रूप में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता, और कड़ी मेहनत की उनकी क्षमता, की बराबरी शायद ही कोई और कर सके।”
इस प्रकार, जिन शब्दों का प्रयोग अक्सर यह दावा करने के लिए किया जाता है कि संविधान के वास्तविक रचयिता आंबेडकर नहीं, बल्कि राव थे, वास्तव में उनका संदर्भ और आशय इसके विपरीत है। आंबेडकर ने राव के कार्य को एक “रफ ड्राफ्ट” (कच्चा मसौदा) कहा था, न कि एक पूर्ण पाठ। प्रारूप समिति और संविधान सभा ने उस कच्चे माल को उस दस्तावेज़ में बदल दिया जो अंततः जनवरी 1950 में लागू हुआ। कहीं कोई ऐसा प्रमाण भी मौजूद नहीं है जो यह दर्शाये कि राव ने कभी संविधान के रचयिता होने का दावा किया था। उस समय आंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू के साथ उनके पत्राचार से सम्मान और सहयोग का भाव प्रकट होता है। उन्हें “संविधान का जनक” घोषित करने का वर्तमान प्रयास, दस्तावेजों में दर्ज़ इतिहास और राव की अपनी विनम्रता, दोनों को विकृत करता है।
राजनीतिक मकसद
राव को ऊपर उठाने और आंबेडकर को दरकिनार करने का अभियान सिर्फ़ विद्वता से प्रेरित नहीं है। यह बताता है कि कुछ लोग इस विचार से असहज हैं कि भला एक दलित विचारक गणतंत्र की स्थापना के केंद्र में कैसे खड़ा हो सकता है। राव को संविधान के प्रमुख लेखक के रूप में स्थापित करने की कोशिशें दरअसल ‘लेखक’ होने के जातिगत विशेषाधिकार को फिर से हासिल कर लेने की कोशिशें हैं।
ये कोशिशें आंबेडकर की क्रांतिकारी विरासत को दबाती हैं और एक सामाजिक क्रांति को नौकरशाही की कवायद में बदल देती हैं। संविधान कोई निष्फल कानूनी दस्तावेज़ नहीं है। इसकी सर्वप्रथम सर्वाधिक महत्वपूर्ण खासियत यह है कि यह व्यक्ति की गरिमा का वादा करने वाला सामाजिक घोषणापत्र है। इसका जन्म संघर्ष, आशा और मुक्ति से हुआ है। यह सत्ता की मेज पर उत्पीड़ितों के आगमन का प्रतीक है। आंबेडकर को इससे अलग करना इसकी आत्मा को छीनने के समान है।
संविधान सभा में आंबेडकर की उपस्थिति अपने आप में एक निर्णायक राजनीतिक बुद्धिमत्ता का परिणाम थी। वे मूल रूप से बंगाल से चुने गए थे, लेकिन विभाजन के बाद उनकी वह सीट पाकिस्तान चली गयी। कांग्रेस के भीतर कई लोग अतीत के मतभेदों के कारण उन्हें वापस लाने में हिचकिचा रहे थे। महात्मा गांधी के हस्तक्षेप से यह समस्या सुलझ गयी।
हालांकि गांधी और आंबेडकर के बीच पृथक निर्वाचक मंडल को लेकर मतभेद थे, फिर भी गांधी ने ज़ोर देकर कहा कि आंबेडकर को संविधान सभा का हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस नेताओं से कहा कि अगर अनुसूचित जातियों को संविधान निर्माण से बाहर रखा गया तो कोई भी संविधान वैधता का दावा नहीं कर सकता।
परिणामस्वरूप, आंबेडकर बंबई प्रेसीडेंसी से पुनः निर्वाचित हुए। गांधी का आग्रह एक दूरदर्शितापूर्ण कार्य था। 1947 में, जब राष्ट्र धर्म के आधार पर विभाजित था, एक दलित नेतृत्व को अलग-थलग कर देना इस विभाजन को और गहरा कर सकता था। आंबेडकर को शामिल करके गांधी ने एक ऐसे संकट को रोका जो नए गणराज्य के जन्म के समय ही उसे कमज़ोर कर सकता था। आंबेडकर के बाद के नेतृत्व ने उस समावेश को सही साबित किया। उन्होंने संविधान निर्माण को एक ऐसे नैतिक उद्यम में बदल दिया जिसने पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया।
राव के मसौदे ने संविधान को व्यवस्था और संरचना प्रदान की। आंबेडकर ने संविधान को नैतिक गहराई प्रदान की। मौलिक अधिकारों, नीति निर्देशक सिद्धांतों और सकारात्मक कार्रवाई संबंधी प्रावधानों पर उनकी छाप है। विधानसभा में उनके भाषणों ने संविधान को एक जीवंत नैतिक दर्शन बना दिया।
आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि सामाजिक और आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक समानता विफल हो जाएगी। उन्होंने कहा, “हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को कब तक नकारते रहेंगे? इसे लंबे समय तक नकारने का मतलब होगा अपने राजनीतिक लोकतंत्र को ही खतरे में डाल देना। हमें इस विरोधाभास को जल्द से जल्द दूर करना होगा, वरना असमानता से पीड़ित लोग राजनीतिक लोकतंत्र के उस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे जिसे इस सभा ने इतनी मेहनत से खड़ा किया है।” यह चेतावनी आज भी भारत के संवैधानिक इतिहास का सबसे शक्तिशाली नैतिक कथन है।
हमें अपनी स्मृति को संजो कर रखना चाहिए
प्रत्येक गणराज्य को अपनी स्मृति की रक्षा करनी चाहिए। राव को आंबेडकर से ऊपर उठाने का प्रयास, संविधान की क्रांतिकारी भावना को नष्ट करने के एक बड़े प्रयास का हिस्सा है। यह संविधान की स्थापना को सामाजिक परिवर्तन के बजाय तकनीकी दक्षता के रूप में प्रस्तुत करता है। आंबेडकर का सम्मान करने का अर्थ राव को कमतर आंकना नहीं है। दोनों ने गणतंत्र की निष्ठापूर्वक सेवा की। लेकिन संविधान मात्र एक कानूनी ढाँचा नहीं है। यह राष्ट्रीय उद्देश्य का एक बयान है। इसके लिए एक विद्वान की सटीकता की जरूरत तो थी ही, लेकिन एक सुधारक के दृढ़ विश्वास की जरूरत भी थी। आंबेडकर वह सुधारक थे।
जब संविधान को अपनाया गया, तो नेहरू, पटेल और प्रसाद समेत सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आंबेडकर की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार किया। किसी ने भी यह नहीं कहा कि राव संविधान के मुख्य लेखक थे। वे एक पाठ का मसौदा तैयार करने और राष्ट्र की अंतरात्मा को आकार देने के बीच के अंतर को समझते थे।
राव एक कुशल सलाहकार के रूप में प्रशंसा के पात्र हैं। आंबेडकर संविधान के नैतिक निर्माता के रूप में श्रद्धा के पात्र हैं। संविधान औपनिवेशिक कार्यालयों में शांतिपूर्वक बैठ कर नहीं लिखा गया था, बल्कि इसे देश के विभाजन की विभीषिका, महात्मा गांधी की हत्या और जातिगत उत्पीड़न की छाया में लिखा गया था। आंबेडकर को इसके केंद्र में रखना कोई प्रतीकात्मक उदारता नहीं थी, बल्कि यह वह संदेश था कि भारत की नई व्यवस्था उन सभी लोगों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण होगी जो कभी बहिष्कृत थे।
आंबेडकर ने कभी भी एकमात्र लेखक होने का दावा नहीं किया। फिर भी, प्रारूप समिति का उनका नेतृत्व, हर खंड का उनका बचाव, और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के उनके दृष्टिकोण ने भारतीय गणराज्य को परिभाषित किया है। उनकी भूमिका को कम करना गणराज्य के मूल वादे के साथ विश्वासघात है। राव ने इस ढांचे का निर्माण किया; आंबेडकर ने इसे न्याय से परिपूर्ण किया। जहां सर बी.एन. राव संविधान के इंजीनियर के रूप में कृतज्ञता के पात्र हैं, वहीं डॉ. बी.आर. आंबेडकर आधुनिक भारत के आर्किटेक्ट और नैतिक संस्थापक बने हुए हैं।
इस सत्य को नकारना गणतंत्र को नकारना है।
( द हिंदू के से साभार, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े के इस लेख का अनुवाद शैलेश ने किया है।)





