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*न्यायपालिका पर सत्ता का शिकंजा — संविधान के मूल ढांचे पर आघात*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          रवीश कुमार जी के अनुसार, नए जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार आमने-सामने हैं। और इस बार मुक़ाबले में हैं जस्टिस बीआर गवई। जी हाँ, वही जस्टिस गवई, जिनकी पहचान एक निष्पक्ष, ईमानदार और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति निष्ठावान जज के रूप में है। अब ज़रा सोचिए, जब देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे उम्रदराज़ जज को सरकार से हाथ मिलाना पड़े, तो हालात और भी बदतर हो जाते हैं। इसमें रॉकेट साइंस की कोई ज़रूरत नहीं है। यह बिल्कुल साफ़ है कि सरकार अपने पसंदीदा लोगों को ही जज बनाना चाहती है। लेकिन जस्टिस गवई कह रहे हैं कि जज वही होगा जो काबिल हो, न कि वो जो सिर्फ़ सत्ताधारी दल का करीबी हो। और यहीं से टकराव शुरू होता है। कॉलेजियम ने कई नामों की सिफारिश की, लेकिन केंद्र सरकार ने उनसे सहमत होने से इनकार कर दिया। यानी आप कह सकते हैं कि न तो सरकार को संविधान की परवाह थी, न ही प्रक्रिया की। सरकार बस अपने लोगों को कुर्सी दिलाने के लिए दौड़ में तत्पर है।यह वही सरकार है जो 2014 में सत्ता में आई थी। और उसी समय से न्यायपालिका पर कब्जा करने की कोशिशें शुरू हो गई थीं।

·         National Judicial Appointments Commission (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) एक ऐसा कानून है जिसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला किया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को असंवैधानिक करार दिया था, लेकिन उसकी मंशा सबको समझ आ गई थी।

·        यह एक प्रस्तावित संवैधानिक संस्था थी जिसे भारत में उच्च न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट) के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से लाया गया था।

 

संक्षिप्त पृष्ठभूमि:

·         एनजेएसी अधिनियम, 2014 और संविधान (99वां संशोधन) अधिनियम, 2014 के माध्यम से इसे लागू किया गया था।

·         इसका उद्देश्य कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेना था, जिसमें केवल सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया संचालित होती थी।

·         लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में एनजेएसी को असंवैधानिक करार दिया, यह कहते हुए कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।

            अब जस्टिस गवई ने एक बार फिर वो सवाल उठाया है, जिससे सरकार को बचाया जा रहा है। क्या न्यायपालिका को भी सरकार का हिस्सा बना देना चाहिए? सवाल सिर्फ़ एक नियुक्ति का नहीं है। सवाल ये है कि क्या न्यायपालिका की आत्मा बची रहेगी या उसे भी सरकार के हवाले कर दिया जाएगा? और आज जब जस्टिस गवई सामने खड़े हैं, तो ये सिर्फ़ एक जज की लड़ाई नहीं है, ये संविधान की आखिरी दीवार को बचाने की लड़ाई है।

            ऐसा क़ानून, जो संसद के दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत से पारित हुआ। यहाँ तक कि राष्ट्रपति ने भी उस पर अपनी मुहर लगा दी। हर तरफ़ तालियाँ बजीं। मीडिया ने इसे ऐतिहासिक बताया। लेकिन जब यही क़ानून सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो कोर्ट ने कहा, ज़रा रुकिए, थोड़ा सोचिए। क्योंकि जो लोकतांत्रिक लग रहा था, वो असल में न्यायपालिका की आज़ादी पर हमला था। एनजेएसी कानून का मकसद, जजों की नियुक्ति पर सरकार का पूरा नियंत्रण। यानी कौन जज होगा, कौन नहीं, कौन सा केस कौन सुनेगा, किसका तबादला होगा, ये सब सरकार तय करेगी। और यहीं सुप्रीम कोर्ट ने सीधे मना कर दिया।

            साफ़ है, यह संविधान के मूल ढाँचे के ख़िलाफ़ है। और एनजेएसी क़ानून को निरस्त कर दिया गया। अब सवाल यह है कि 2014 से 2025 तक, मोदी सरकार बार-बार न्यायपालिका को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश क्यों कर रही है? क्या संविधान की तीनों शाखाओं में एक जैसी सोच होनी चाहिए? या सब कुछ सरकार के निर्देशों के अनुसार चलेगा? अब देखिए, ख़बरें साफ़ कहती हैं कि कॉलेजियम द्वारा दिए गए नामों को केंद्र सुप्रीम कोर्ट स्वीकार नहीं करता।

            कई जजों की नियुक्ति अटकी हुई है। यानी सुप्रीम कोर्ट ने जो कॉलेजियम व्यवस्था स्थापित की थी, उसकी अनदेखी हो रही है। और याद रखिए, कॉलेजियम कोई चाय की दुकान नहीं है। देश के शीर्ष पाँच जज यहाँ बैठते हैं, जिनमें मुख्य न्यायाधीश CJI भी शामिल हैं। वे पाँचों जजों के नाम तय करते हैं, और उन नामों को सिफ़ारिश के तौर पर केंद्र सरकार को भेजते हैं। सरकार बस औपचारिक मुहर लगाती है। लेकिन अब सरकार चाहती है कि जज वही हों, जो सरकार की लाइन पर हों, और न्याय भी यहीं हो। जजों की सूची तैयार हो गई है। वह सूची केंद्र सरकार को भेज दी गई है। लेकिन सरकार चुप है। कोई जवाब नहीं है। न हाँ, न ना। यानी न्यायपालिका इंतज़ार कर रही है और सरकार मौन व्रत पर है।

            क्यों? क्योंकि जो नाम भेजे गए हैं, वो सरकार की मर्ज़ी के मुताबिक़ नहीं हैं। और ये नाम जस्टिस बीआर गवई ने चुने हैं। अब ज़रा सोचिए, जो जज न सरकार से डरता है, न झुकता है, न दबता है, वो जब नए जजों के नाम तय करेगा, तो क्या करेगा? वो ऐसे नाम भेजेगा, जो सरकार से नहीं, संविधान से डरते हैं। और सरकार इस बात से सहमत नहीं है। क्योंकि सरकार को डर है कि कहीं कोई और जस्टिस बीआर गवई न खड़ा हो जाए। या जस्टिस बीआर गवई अकेले न रह जाएँ, बल्कि न्याय अधिकारियों की एक पूरी फौज बन जाएँ, जो कहे कि संविधान सबसे ऊपर है, सत्ता नहीं। अब सरकार क्या चाहती है? सरकार 23 नवंबर, 2025 का इंतज़ार कर रही है। जिस दिन जस्टिस बीआर गवई रिटायर होंगे, सरकार को उम्मीद है कि गवई के बाद कोई CJI होगा जो कहेगा, “सर, जैसी आपकी मर्ज़ी।” जैसा आप कहें। याद रखिए, लोकतंत्र ख़त्म होगा और अत्याचार शुरू होगा। अब देखिए, ख़बरों में साफ़ लिखा है, केंद्र कॉलेजियम द्वारा दिए गए नामों पर सहमत नहीं है।

            सुप्रीम कोर्ट नाराज़ है, कई जजों को निलंबित कर दिया गया है। और इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट उन बयानों की सूची को भी ख़त्म करने पर राज़ी हो गया है, जिन पर सरकार जानबूझकर देरी पर सवाल उठा रही है। मतलब अब कोर्ट ख़ुद ही सवाल पूछने वाला है। सरकार, आप संविधान को क्यों रोक रहे हैं? तो अब सवाल सीधा है। क्या न्यायपालिका में वही लोग होंगे जो सरकार को पसंद करते हैं, या वो जो संविधान को सर्वोपरि मानते हैं? जवाब आपको भी पता है। और सरकार को भी। इसको यहाँ नीचे सिलसिलेवार दिया जा रहा है।

            भारत का संविधान न केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज़ है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता और समानता की वह जीवित आत्मा है, जिसने करोड़ों नागरिकों को लोकतंत्र पर विश्वास करने की ताकत दी है। इस संविधान की रक्षा तीन स्वतंत्र स्तंभों — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — की परस्पर दूरी और संतुलन से होती है। इनमें से न्यायपालिका को सबसे पवित्र और तटस्थ माना गया है, क्योंकि वही सत्ता और जनता के बीच न्याय का अंतिम पुल है। परंतु आज यह पुल भी खतरे में है। सरकार एक ऐसी नीति की ओर बढ़ रही है, जहाँ जजों की नियुक्ति “भर्ती” की तरह की जाएगी, जैसे किसी विभाग में क्लर्क या सिपाही रखे जाते हैं। यह विचार केवल संवैधानिक व्यवस्था के लिए ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के लिए भी घातक है। जज, जो अब तक संविधान और न्याय बोध से संचालित होते थे, अगर सरकारी चयन से आएँगे, तो क्या वे सत्ता से सवाल पूछ पाएँगे? क्या वे पीड़ित को सत्ता के खिलाफ न्याय दिला पाएँगे?

            यह लेख  उसी गहरी आशंका को स्वर देने का प्रयास है — एक ऐसे समय में, जब न्याय की कुर्सी पर भी सरकार की नज़र है और संविधान की आत्मा पर चुपचाप एक युद्ध चल रहा है। भारतीय लोकतंत्र की नींव तीन स्तंभों पर टिकी हुई है: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इन तीनों की स्वतंत्रता और परस्पर संतुलन ही हमारे संविधान की आत्मा है। परंतु वर्तमान केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली इन तीनों स्तंभों की स्वायत्तता को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा है। चुनाव आयोग, जाँच एजेंसियों (CBI, ED, IB आदि) के बाद अब न्यायपालिका  को अपने प्रभाव में लेने की कोशिशें स्पष्ट रूप से देखी जा रही हैं। यह न केवल लोकतंत्र के लिए खतरा है, बल्कि संविधान के मूल ढाँचे के लिए भी एक गंभीर चुनौती है।

1. न्यायपालिका पर नियंत्रण: सरकार की मंशा क्या है?

            2014 के बाद से केंद्र सरकार की न्यायपालिका पर पकड़ मजबूत करने की कोशिशें लगातार तेज़ हुई हैं। पहले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के ज़रिए इस प्रयास की शुरूआत हुई। इस कानून के ज़रिए सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति में सीधा हस्तक्षेप देने की कोशिश की गई। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के मूल ढाँचे के खिलाफ  बताते हुए असंवैधानिक करार दिया, लेकिन इससे सरकार की मंशा उजागर तो हो ही गई।

            राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून की असफलता के बाद सरकार ने अपनी रणनीति बदली। अब वह प्रत्यक्ष नियंत्रण के बजाय जजों की नियुक्ति में विलंब और कॉलेजियम की सिफारिशों की अनदेखी के ज़रिए दबाव बनाने की नीति अपना रही है।

2. जजों की नियुक्ति: न्यायपालिका बनाम केंद्र सरकार:

            आज न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव अपने चरम पर है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई, जो संविधाननिष्ठ, निष्पक्ष और ईमानदार छवि के जज हैं, सरकार की मंशा के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। कॉलेजियम द्वारा चुने गए योग्य और स्वतंत्र सोच रखने वाले जजों की सूची को केंद्र सरकार महीनों और वर्षों तक लटकाए रखती है। उदाहरण के लिए:

  • कई जजों की नियुक्ति की सिफारिशें 2019 से लंबित पड़ी हुई हैं, जिन पर अब तक सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
  • वरिष्ठता का सिद्धांत प्रभावित हो रहा है; यानी जानबूझकर योग्य उम्मीदवारों को पीछे धकेला जा रहा है।
  • सरकार की चुप्पी एक रणनीतिक हथियार बन चुकी है — न हाँ, न ना।

इससे साफ़ पता चलता है कि सरकार ऐसे जज चाहती है जो सरकार की लाइन पर  हों, न कि संविधान के मुताबिक़ न्याय देने वाले।

3. बीआर गवई का प्रतिरोध: एक व्यक्ति, एक आत्मा, एक चेतावनी:

            जब देश की सबसे बड़ी अदालत के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई सरकार की नीतियों के खिलाफ खड़े होते हैं, तो यह मात्र एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं रह जाती, यह संविधान की अंतिम दीवार को बचाने की लड़ाई बन जाती है। वे साफ़ तौर पर कहते हैं कि— “जज वही होगा जो काबिल हो, न कि वो जो सिर्फ सत्ता का वफादार हो।”

            सरकार 23 नवंबर 2025 का इंतजार कर रही है — जिस दिन जस्टिस गवई रिटायर होंगे। सरकार को उम्मीद है कि उनके बाद कोई ऐसा CJI आएगा जो आदेश को ‘सुझाव’ न मानकर ‘हुक्म’ माने। यह न्याय पालिका को पूरी तरह कार्यपालिका का अधीनस्थ बना देने का सपना है।

4. कॉलेजियम व्यवस्था और संवैधानिक संतुलन पर हमला:

            कॉलेजियम प्रणाली — भले ही इसकी आलोचना भी होती हो—लेकिन यह न्यायपालिका की स्वायत्त नियुक्ति प्रणाली है। इसमें CJI समेत पाँच वरिष्ठतम जज मिलकर नए न्यायाधीशों के नाम तय करते हैं। सरकार को इस पर केवल औपचारिक मुहर लगानी होती है।

लेकिन आज सरकार:

  • सिफारिशों को लटकाकर रखती है।
  • सूची को पुनर्विचार के लिए लौटा देती है।
  • कभी-कभी मीडिया में लीक करवा कर दबाव की राजनीति करती है।

            यह सब इसीलिए किया जा रहा है ताकि कॉलेजियम भी अंततः सरकार के अनुकूल नाम ही भेजे। इस व्यवस्था को खोखला करने का यह सुनियोजित प्रयास है।

5. लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा:

            जैसा कि जस्टिस अरविंद दत्तार ने कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा –“कुछ नाम चार साल से केंद्र सरकार के पास लंबित हैं, जिससे उनकी वरिष्ठता पर असर पड़ रहा है।” इस प्रकार योग्य न्यायाधीश बनने के पहले ही बाहर कर दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप–

  • न्यायाधीशों का मनोबल टूटता है।
  • युवा व स्वतंत्र विचार वाले न्यायविद् न्यायिक सेवा से दूर रहते हैं।
  • न्यायपालिका की स्वायत्तता पर जनता का विश्वास डगमगाने लगता है।

यदि यह प्रक्रिया जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब जज भी अफसरशाही की तरह “ट्रांसफर-पोस्टिंग की राजनीति”  में फँस जाएँगे।

6. लोकतंत्र और संविधान की रक्षा: आखिरी दीवार:

            आज जब जाँच एजेंसियाँ (CBI, ED, NIA) से लेकर चुनाव आयोग तक सरकार की मुट्ठी में जा चुके हैं, तो न्यायपालिका ही अंतिम उम्मीद है। अगर न्यायपालिका भी सत्ता के अधीन हो गई, तो भारत का लोकतंत्र मात्र एक “औपचारिक लोकतंत्र”   बनकर रह जाएगा जिसमें चुनाव होंगे, लेकिन विकल्प नहीं होंगे; संविधान होगा, पर न्याय नहीं होगा।

            इस संदर्भ में जिस “जजों की नियुक्ति के लिए भर्ती बोर्ड” की बात हो रही है, वह दरअसल सरकार द्वारा न्यायपालिका पर नियंत्रण स्थापित करने के एक नए औजार के रूप में उभर रहा है। यह न केवल संविधान की आत्मा के खिलाफ है, बल्कि न्याय की सुलभता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता — इन तीनों को जड़ से हिला देने वाला कदम हो सकता है।

प्रस्तावित ‘जज चयन बोर्ड’ क्या है?

            वर्तमान में उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के तहत होती है। इसमें–

  • सुप्रीम कोर्ट के 5 वरिष्ठतम जज (CJI सहित) नए जजों के नाम तय करते हैं।
  • केंद्र सरकार को उन नामों पर अंतिम मंजूरी देनी होती है (जिसे संविधान के तहत “सामंजस्य और परामर्श” कहा गया है)।

अब सरकार इसे बदलकर एक भर्ती बोर्ड या आयोग बनाना चाहती है — जिसमें–

  • सरकार की भूमिका निर्णायक होगी।
  • ‘योग्यता’ और ‘काबिलियत’ की परिभाषा सरकार तय करेगी।
  • चयन में नौकरशाही, सत्तारूढ़ दल से जुड़ी संस्थाएँ और कथित विशेषज्ञ भी शामिल हो सकते हैं।

अगर यह व्यवस्था लागू हुई तो क्या होगा?

1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अंत

  • जज वही बनेगा जो सरकार को ‘सुविधाजनक’ लगे।
  • संवैधानिक, तर्कशील और असहमति वाले स्वरों को चयन प्रक्रिया में पीछे धकेल दिया जाएगा।
  • सरकार विरोधी विचार रखने वाले, या सामाजिक न्याय की पक्षधरता रखने वाले काबिल लोग पहले ही बाहर हो जाएँगे।

2. संविधान के मूल ढांचे पर आघात

            भारतीय संविधान का मूल ढांचा यह सुनिश्चित करता है कि तीनों स्तंभ (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) स्वतंत्र और एक-दूसरे के प्रति जवाबदेह हों, लेकिन अधीनस्थ न हों। यदि सरकार ही जज तय करने लगे तो:

  • “Check and Balance” खत्म हो जाएगा।
  • न्यायपालिका कार्यपालिका की कठपुतली बन जाएगी।
  • लोकतंत्र का ‘लोक’ केवल दिखावा रह जाएगा।

3. जनता और न्याय के बीच और दूरी

  • जो न्याय पहले ही महँगा और विलंबित है, अब वह सत्ताधारी सोच का बंधक बन जाएगा।
  • दलित, आदिवासी, पिछड़े, महिलाएँ, अल्पसंख्यक — इन वर्गों को पहले ही जिस न्याय के लिए दशकों तक संघर्ष करना पड़ता है, अब वह पूरी तरह “सरकारी अनुमति” पर आधारित हो जाएगा।
  • यदि जज सरकार के इशारे पर बैठेंगे, तो क्या वे सरकार के ख़िलाफ़ फैसले देंगे?

ऐतिहासिक दृष्टिकोण: क्या ऐसा पहले भी हुआ है?

            “हां”, आपातकाल (1975–77) के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज को दरकिनार कर अपने पसंदीदा जज को CJI नियुक्त किया था — यह था “कुशल जज, मगर सरकार के प्रति वफादार” वाली नीति का चरम। इससे न्यायपालिका का नैतिक बल टूट गया था। वही इतिहास दोहराया जा रहा है, पर इस बार संविधान के आवरण में, लोकतंत्र के नाम पर

डॉ. भीमराव अंबेडकर की चेतावनी:

            “यदि एक दिन कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका — तीनों एक ही मानसिकता के लोग बन जाएँ — तो यह लोकतंत्र का अंत है।” सरकार द्वारा जजों की नियुक्ति के लिए भर्ती बोर्ड बनाना अंबेडकर की इस चेतावनी को चरितार्थ करता है।

तकनीकी पक्ष: संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) और 217(1) के अनुसार–

  • सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
  • परंतु यह मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से परामर्श  के आधार पर होता है।

1993 और 1998 के “तीन जजों के फैसलों”  में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया — “परामर्श” का अर्थ केवल औपचारिक सलाह नहीं, बल्कि निर्णायक राय है। इसलिए यदि सरकार किसी ‘भर्ती बोर्ड’ के ज़रिए जज नियुक्त करने लगे, तो यह इन ऐतिहासिक फैसलों और संविधान की व्याख्या का सीधा उल्लंघन होगा।

निष्कर्ष: हमें किस ओर जाना चाहिए?

  • सरकार द्वारा ‘जज भर्ती बोर्ड’ बनाना लोकतंत्र के लिए एक स्थायी संकट  बन सकता है।
  • न्याय की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए कॉलेजियम प्रणाली को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाया जा सकता है — लेकिन सरकार के अधीन नहीं किया जाना चाहिए।
  • आज जो संघर्ष जस्टिस बीआर गवई जैसे लोग लड़ रहे हैं, वह हर जागरूक नागरिक की लड़ाई है।

            न्याय वही होता है जो न सिर्फ़ हो, बल्कि होता हुआ दिखे भी। और अगर न्यायपालिका खुद न्याय के लिए सरकार से भीख माँगने लगे, तो यह संविधान की मृत्यु है।

जब जज भी ‘सरकारी चयन’ से आएँगे–न्याय की आत्महत्या का युग

            भारतीय लोकतंत्र की आत्मा न्याय है, और न्याय की आत्मा स्वतंत्रता। जब न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं रह जाती, तब संविधान केवल एक दस्तावेज़ बनकर रह जाता है और लोकतंत्र एक तमाशा। आज हम एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं जहाँ सरकार जजों की नियुक्ति को भी “भर्ती” की तरह संचालित करने की कोशिश में है — जैसे पुलिस या पटवारी की नौकरी बाँटी जाती है। यह प्रस्ताव न केवल संविधान के मूल ढाँचे पर सीधा हमला है, बल्कि न्याय की आत्महत्या का उद्घोष है।

1. प्रस्तावित भर्ती बोर्ड: क्या यह ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ का अंत है?

            सरकार की योजना है कि जजों की नियुक्ति के लिए एक केंद्रीय चयन बोर्ड (Central Selection Commission for Judges) बनाया जाए, जिसमें–

  • सरकार नामांकित विशेषज्ञ, नौकरशाह, विधि मंत्री या संबंधित अधिकारी हों,
  • कॉलेजियम का अधिकार सीमित हो जाए या समाप्त हो जाए,
  • जजों की नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानांतरण आदि सब पर सरकार का निर्णायक नियंत्रण हो।

इसका नतीजा क्या होगा?

“जज वही बनेगा जो सत्ता के प्रति वफादार होगा, न कि संविधान के प्रति प्रतिबद्ध।”

2. न्यायपालिका: सत्ता का अधीनस्थ या संविधान का रक्षक?

            डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था–“न्यायपालिका का स्वतंत्र रहना ही नागरिक स्वतंत्रता की गारंटी है।” पर जब जज सरकारी चयन से आएँगे, तो वे सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने के बजाय उन्हें वैध ठहराने का औजार बन जाएँगे।

  • सोचिए, यदि वही सरकार जो CBI, ED, IT जैसी संस्थाओं को विपक्ष के खिलाफ़ इस्तेमाल करती है, अब जज भी अपने अनुसार चुने, तो —
  • क्या कोई जज उनके खिलाफ़ निष्पक्ष सुनवाई करेगा?
  • क्या हाशिए के वर्गों, सामाजिक न्याय के सवालों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कोई आवाज़ बचेगी?

3. कॉलेजियम बनाम भर्ती बोर्ड: चयन की आत्मा क्या है?

कॉलेजियम प्रणाली:

  • 1993 और 1998 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों में मान्यता प्राप्त,
  • वरिष्ठतम जजों की आपसी सहमति से योग्य नामों की सिफारिश होती है,
  • केंद्र सरकार को उन नामों को स्वीकारना होता है (या ठोस आपत्ति देनी होती है)।

भर्ती बोर्ड (सरकारी प्रस्ताव):

  • सरकार द्वारा नाम तय होंगे,
  • ‘योग्यता’ की परिभाषा राजनीति तय करेगी,
  • पूरी न्यायपालिका पर एक समान सोच और दृष्टिकोण थोपा जाएगा।

“कॉलेजियम की खामियाँ सुधारने के लिए उसे पारदर्शी बनाया जा सकता है, पर उसे समाप्त करके सरकार को जज नियुक्त करने देना, आत्मघाती है।”

4. न्याय की हत्या: सुस्त न्याय नहीं, अब ‘सत्ता नियंत्रित न्याय’

भारत में पहले से ही न्याय:

  • विलंबित है — लाखों मुकदमे लंबित हैं,
  • महँगा है — आमजन के लिए वकील, अपील, पुनर्विचार एक विलासिता है,
  • पहुंच से बाहर है — ग्रामीण, दलित, आदिवासी, मुस्लिम, महिला पीड़ित न्याय तक पहुँचने से पहले थक जाते हैं।

अब इस पर सरकारी चयन का शिकंजा डल जाए तो–

  • जज सरकार चुनेंगी, न कि न्याय की समझ,
  • फैसले जनता के लिए नहीं, सत्ता के हित में होंगे,
  • न्यायपालिका खुद सत्ता के संरक्षण की याचक बन जाएगी।

5. ऐतिहासिक चेतावनी: क्या हम इमरजेंसी की पुनरावृत्ति देख रहे हैं?

            1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने वरिष्ठतम जज ए. एन. रे को छोड़कर अपने पसंदीदा जज को मुख्य न्यायाधीश बना दिया था। वह असंवैधानिक था, पर खुल्लमखुल्ला था। आज की सत्ता वही कार्य संवैधानिक लबादे में लपेट कर करने को आमादा है–‘भर्ती बोर्ड’ के नाम पर।

याद रखिए: जब न्यायपालिका सरकार की दोस्त बन जाती है, तो न्याय दुश्मन बन जाता है।

6. जस्टिस बी.आर. गवई का प्रतिरोध: आख़िरी चेतावनी:

            वर्तमान में कॉलेजियम का नेतृत्व कर रहे जस्टिस गवई सरकार की इस मानसिकता के खिलाफ़ स्पष्ट और दृढ़ हैं। वे–

  • योग्य और संविधाननिष्ठ नामों की सिफारिश करते हैं;
  • सरकार की मंशा के आगे नहीं झुकते;
  • न्यायपालिका की आत्मा की रक्षा कर रहे हैं।

            सरकार 2025 में उनकी रिटायरमेंट का इंतज़ार कर रही है ताकि “सरकारी मन मुताबिक़ CJI” को बैठाया जा सके — और तब जजों की भर्ती में पूरी सत्ता की घुसपैठ सुनिश्चित हो सके।

यह केवल नियुक्ति की लड़ाई नहीं है, यह लोकतंत्र की आख़िरी साँस है:

            जब न्याय भी भर्ती बन जाए — तो यह सिर्फ़ संवैधानिक विडंबना नहीं, बल्कि न्याय की आत्महत्या है।

  • क्या हम चाहते हैं कि जज वही हो जो सत्ता को भाए?
  • क्या हम संविधान की आत्मा को किसी भर्ती आयोग में गिरवी रख सकते हैं?
  • क्या न्याय सिर्फ़ एक सरकारी सेवा  बनकर रह जाएगा, जिसमें चुप रहना ही पदोन्नति की शर्त होगी?

अगर नहीं — तो आज, हमें खड़े होना होगा। जस्टिस गवई की तरह — न झुकना, न बिकना, न चुप रहना। क्योंकि जब न्याय भी ‘सरकारी चयन’ से आएगा — तब संविधान की आत्मा से न्याय का शव निकलेगा।

            भारत का लोकतंत्र आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ हमें यह तय करना है कि क्या हमें वास्तव में एक संवैधानिक राष्ट्र चाहिए, या केवल एक नियंत्रित प्रहसन जिसमें संसद, न्यायालय, मीडिया सब सत्ता के इशारे पर ताली बजाएँ। जजों की नियुक्ति में सरकार की निर्णायक भूमिका स्थापित करने का प्रस्ताव, केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि यह संविधान की आत्मा में सेंध है। जब जज सरकारी चयन से आएँगे, तो वे सरकार के कर्ज़दार बनेंगे, न कि संविधान के रक्षक। और जब न्याय खुद सत्ता के पक्ष में खड़ा हो जाए, तो पीड़ितों, दलितों, अल्पसंख्यकों, हाशिए पर खड़े करोड़ों नागरिकों के लिए न्याय केवल एक सपना बनकर रह जाएगा।

            आज न्यायपालिका पर सरकार का शिकंजा केवल एक संवैधानिक संघर्ष नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को बचाने की लड़ाई है। यह संघर्ष केवल जज गवई का नहीं है, यह हर नागरिक का संघर्ष है जो संविधान में विश्वास करता है। अगर आज आवाज़ नहीं उठाई गई, तो कल हर अदालत सरकार की अदालत बन जाएगी — और न्याय, केवल सरकार की सुविधा पर आधारित एक दिखावा।

सवाल है — क्या हम संविधान के साथ खड़े हैं, या सत्ता की चुप्पी में शामिल हो गए हैं?

            जस्टिस बी.आर. गवई जैसे न्यायाधीश आज संविधान की अंतिम दीवार पर अकेले खड़े हैं, मगर वे हमें याद दिला रहे हैं कि चुप रहना भी अन्याय में साझेदारी है। अगर हमने आज इस लड़ाई को न समझा, न लड़ा तो कल हमारा संविधान, सिर्फ़ दीवारों पर टंगा एक फ्रेम बन जाएगा, जिसकी आत्मा मर चुकी होगी। इसलिए आज हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि सरकार क्या तय कर रही है, बल्कि यह पूछना चाहिए — क्या संविधान हमें बुला रहा है? और अगर वह बुला रहा है — तो क्या हम उसके साथ खड़े हैं?

संदर्भ: (https://www.facebook.com/watch/?v=24204717409215159&rdid=YzI9Z0q6kvFV7W8C)

Ramswaroop Mantri

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