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*लोहिया विचार का सामाजिक परिवर्तन पर असर देखना है ?*

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रमाशंकरसिंह,

पूर्व मंत्री, मध्यप्रदेश

पूरा तो बिलकुल ही नहीं आंशिक ही सही तो एक बार खुले द्ल दिमाग मन से बिहार और यूपी के पिछले पचास साठ सालों में हुये सामाजिक परिवर्तन पर नजर डाल लीजिये लेकिन एकदम निष्पक्ष निरपेक्ष ऑंख से और सिर्फ तथ्यों पर !
गंभीर अध्येता लिखते भी हैं शोध ग्रंथ या लेख के रूप में तो अभी अशिक्षा या कुशिक्षा या साज़िशन ज्यादा लोगों तक पहुंच नहीं पाता । बहुजन तक भी नहीं पहुंचा । लेकिन शायद आखिरी लड़ाई अगले बीस तीस बरसों में गंगा जमुना के मैदान में ही लड़ी जायेगी जो कि द्रविड़ क्षेत्र में बहुत हद तक जीती जा चुकी है । और ऐसा भी नहीं है कि इसकी प्रतिक्रिया न हो , हो चुकी है और पिछले दस ग्यारह बरसों में हिंदुत्व और प्रचार माध्यमों में ढोंगी बाबा मंडली का अभूतपूर्व उठान इसी का सुबूत है । हजारों बरसों से अपने चौतरफा प्रभुत्व को इतनी आसानी से आधी सदी में ही खिसकता कैसे देख सकते हैं वे सामाजिक समूह जिनके पास ताकत के सभी अंग केंद्रित रहे हैं ज्ञान , पैसा , धर्म और साधारण जन की अंधआस्था ।
सामाजिक दृष्टिबाधित नहीं देख सकते चाहे कितने ही शिक्षित खुद को समझते रहें । मानेंगें तो बिलकुल ही नहीं कि वे सम्पूर्ण रूप से शोषणकारी जातिप्रथा के घनघोर मनसा वाचा कर्मणा समर्थक हैं लेकिन सदा आरोप यही लगाते हैं कि तुम्हारी( हमारी ) सोच जातिवादी , छोटी और तुच्छ है ।
ये पीछे देखू समूह क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक बदलाव हो जाने के बाद ही शायद मानें , शायद नहीं भी ! लेकिन अभी तो सभी राजनैतिक दल अपना पुराना स्टैंड छोडकर इस विषय पर ऊपरी तौर पर सहमत दिख रहे हैं पर ऊपरी तौर ही और चुनावों की मजबूरियों के कारण ।

१९६७ के पूर्व यूपी बिहार के पुख्ता हिंदी क्षेत्र में यह सोचना मात्र भी असम्भव था कि कोई दलित वंचित पिछड़ा कमेरा जाति का व्यक्ति सत्ता के केंद्र में आने की सोच भी सकता है ! सारे प्रशासनिक , आध्यात्मिक व राजनीतिक सत्ता के पद सिर्फ उन्हीं के पास होते थे जो जन्म से श्रेष्ठ हुये और शिक्षा पर भी सबसे पहला अधिकार उनके पास रहता था कि गरीब पिछड़ा मानसिक आर्थिक रूप से तैयार नहीं हो सका था कि वैसा सोचना उसके लिये हजारों बरसों की दासता के कारण सम्भव न रहा था । संस्कार भी कहॉं से पैदा होते ? राजनीतिक प्रभुत्व भी उन्हीं श्रेष्ठि वर्ग के पास था । स्पष्ट शब्दों में कहें तो ब्राह्मणों के हाथों में लेकिन क्षत्रिय और वैश्य के सक्रिय मूर्खतापूर्ण सहयोग व समर्थन से । यूपी में ब्राह्मण आबादी सबसे अधिक है भारत में लेकिन पूरे भारत में औसतन ३.५-४% पर नियंत्रण करीब करीब सभी पर ८०-८५% था । आजादी के पहले अंगरेजी राज में अंग्रेजों का और मुगल राज में मुसलमानों कायस्थों का ।सामाजिक रूप से जो पिछडे व वंचित दलित थे वह बहुजन आबादी ८०% के करीब ही रही जिसमें कुछ पिछड़े मुसलमान भी शामिल । आंकडें मामूली ऊपर नीचे हो सकते हैं कि अभी तक जातीय जनगणना सम्भव नहीं हो सकी है । क्यों नहीं कराई ? आप खुद समझिये कि क्यों नहीं ? यदि होती या हो जाये तो सब खुल जाये कि शोषण अन्याय कैसे कौन कर रहा है ? आजादी के बाद पहली जनगणना १९५१ में जब भी हुई और २०११ तक मुख्य दलों में से किसी ने भी जातीय जनगणना की मॉंग लगातार दर किनार क्यों की ? पांच बरस से ज्यादा समय तक पूरी अवधि के प्रधानमंत्री पद पर पं नेहरू , इंदिराजी राजीव, नरसिम्हा राव , मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी रहे हैं यानी कांग्रेस व भाजपा । इनके गुण अवगुणों की चर्चा मत करिये अभी सिर्फ यह सोचिये कि पिछड़ोको विशेषअवसर नहीं देने पर दोनों के बीच सैद्धांतिक एका क्यों रहा ?

डा० लोहिया ने समूचे राजतंत्र का तमाम विरोध झेलते हुये सामाजिक पिछडे वर्गों को जाग्रत करना शुरु किया और उन्हें राजनीतिक शक्ति के लिये तैयार किया । यह काम साथ साथ बाबा साहेब भी कर रहे थे पर मात्र दलितों के लिये । यूपी बिहार अंगडाई लेने लगा और अपना हिस्सा मांगने के लिये बेताब होने लगा । लोहिया प्रणीत गैर- कांग्रेसवाद की राजनीति ने वह समुचित आधार दिया कि वंचित समूहों के लोग राजनीतिक नियंत्रण या सत्ता के केंद्रों तक पहुंचने में सफल हुये । १९६७ के पूर्व क्या कम्युनिस्ट क्या हिदूराष्ट्रवादी सभी इस ख्याल के थे प्रतिभा ही पद के योग्य बनाती है । उन्हें समझ कैसे आता कि प्रतिभा पर किस वर्ग का कब्जा रहा है जब अवसर ही नहीं मिल रहा दूसरों को तो प्रतिभा कैसे आयेगी ? । सभी बडे राजनैतिक दलों समूहों में शीर्ष पर वही सामाजिक श्रेष्ठि वर्ग तो बैठा है और हजारों बरसों से । स्कूलो कॉलेजों प्रशासन श्रेष्ठ पेशों सब पर वहीं हैं । जब लोहिया ने विशेष अवसर का सिद्धांत चलाया तब यूपी बिहार जगा और झटके से सम्पूर्ण दृश्य बदलने लगा । यह न तो इतना आसान रहा और न ही सब जगह सब कुछ ठीक ही चला पर शुरु जरूर हुआ और रफ्तार पकड़ने लगा ।

अभी पहले इसी बात को नोट कीजिये , दूसरी चर्चायें भी होंगी और जल्दी ही कि आज बिहार में सभी राजनीतिक दलों की कमान कौन सम्भाल रहे हैं ? टिकिट कौन बांट रहा है ? पचास साल पहले तक यही काम कौन कर रहा था ? लालू जैसा गवई और सम्भ्रांत भाषा न बोल सकने वाला अचानक ही मुख्यमंत्री बन कर पटना नहीं बैठा। कर्पूरी ठाकुर ने पहली लडाई लड़ी – अपमान सहे मुख्यमंत्री रहते हुये पर आ़शा का दिया जला दिया । यह अकल्पनीय हुआ कि नाई जाति का मुख्यमंत्री बना फिर ग्वाला मुख्यमंत्री बना , पंद्रह साल रहा । फिर कुर्मी किसान बिरादरी का नीतीश कुमार है जो पंद्रह बरसों से ज्यादा से मुख्यमंत्री है । भाजपा का जातीय चरित्र भी बदले बिना कैसे रहता पर विचार और मन वहीं है , बदलनें में और समय लगेगा लेकिन बदले बगैर रहेगा नहीं और जल्दी ही । अभी बाकी बातों पर , सुशासन कुशासन पर नहीं पर इस पर भी चर्चा करूंगा ही । अभी सिर्फ़ यह देखिये कि बिहार में विधानसभा के टिकिट कौन बॉंट रहा है ? जदयू राजद हम लोजपा वीआईपी आदि दलों के टिकिट कहॉं से मिल रहे हैं ? वे कौन हैं ? क्या इस समाजिक वर्ग के लोग आज से पचास साल पहले ऐसा सोच भी सकते थे ? कर्पूरी लालू नीतीश चिराग उपेंद्र मांझी और सम्राट चौधरी कैसे उदित
हुये कि वे सत्ता के दावेदार बन गये ?

क्या भाजपा और कांग्रेस भी बदलने की प्रक्रिया में है ? शायद ही पर हिचक स्वाभाविक है कि ये ही तो श्रेष्ठि वर्ग के प्रतिनिधि हैं । रहे हैं ! कहते हैं बोलते हैं पर अधिकार के खिसकने को रोकना चाहते हैं । राहुल पिछडे वर्ग की बात करने लगे हैं – सत्तर साल बाद कांग्रेस ने यह फैसला किया है पर टिकिट उन्हीं को देंगें , आबादी के अनुपात के विरुद्ध । आंकडा देखिये । राहुल के मुंह से बिहार में भी कर्पूरी ठाकुर या डा० लोहिया का नाम भी नहीं निकलता जो इस सामाजिक जागरण के अग्रदूत रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि पिछड़ा वोट उनके लिये टूट पडेगा? टिकिट किन्हे बांटते हैं ? यदि पिछडों को नहीं तो पिछडे किसी की शक्ल देखकर थोडे ही जुड़ेंगे
हिचक अभी रहेगी – जातीय श्रेष्ठता का बोध खत्म होने में वक्त लग सकता है पर बिहार इसकी सफल प्रयोगशाला साबित होगी ।
मुझे मालूम है कि इस में भी सब कुछ आदर्श नहीं है । हो भी नहीं सकता ।

लिख लीजिये कि समयचक्र का पहिया घूमने लगा है । रोकने की बडी कोशिश सफल नहीं होगी यदि लोकतंत्र बचा रहा तो । इसलिये अगला हमला लोकतंत्र पर भी हो सकता है , वह भी असफल होगा ।

और अंततः भारत में न्याय होकर रहेगा यह इतिहास का न्याय होगा और भविष्य की दीवार पर लिखा है !
हजारों बरस बाद ही सही पर जिन्हें शूद्र कहा जाता है उनका बहुमत राज्य स्थापित होगा । बिहार में एक लडाई यह भी है जो कभी रुक कर कभी तेजी से कभी असफल दिखती और कभी सफल दिखती चलती है ।

आखिरी बात इस पोस्ट की यह कि न तो नीतीश का भविष्य मोदी तय करने की हैसियत रखते हैं और न ही तेजस्वी की राहुल ! श्रेय या बदनामी ही ले सकते हैं परिणामों के आधार पर ।

जय लोकतंत्र !
जय संविधान !!

madhav mantri

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