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फिल्में प्रेरक संदेश पहुंचाती हैं:पर्दे पर ‘इतिहास की गवाही’

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उर्मिलेश

पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सी डी देशमुख ऑडिटोरियम में एक ऐसी फिल्म प्रदर्शित की गई, जिसे सचमुच ‘इतिहास की गवाही’ कहा जा सकता है। वैसे इस फिल्म का नाम(शीर्षक) है: जागरण और गवाही-30 जनवरी। 

कुल 40 मिनट की इस डॉक्युमेंट्री फिल्म का निर्माण 1991 में हुआ था और पहली दफा यह दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर 30 जनवरी, 1992 को दिखाई गयी थी। फिर यह देश के अलग-अगल हिस्सों में भी प्रदर्शित हुई और लोगों ने पसंद किया। वर्षों बाद दिल्ली में फिर से यह फिल्म गणमान्य लोगों के बीच दिखाई गई। 

फिल्म के निर्माता-निर्देशक सुहास बोरकर हैं और पटकथा रामचंद्र गांधी की है। आवाज दी है जसदेव सिंह(दिवंगत) ने। तपन बोस, सुहासिनी मुले, रघु राय और जमीर अहमद जैसी देश की अनेक हस्तियों का इस फिल्म के निर्माण में  योगदान है। सुहास बोरकर एक डॉक्युमेंट्री फिल्म मेकर के अलावा विचारक और पत्रकार भी हैं। 

फिल्म का कथा-संदर्भ रात भर चलने वाला गीत-संगीत-का एक अनोखा कार्यक्रम है, जो दिल्ली के तीस जनवरी मार्ग स्थित ‘गांधी स्मृति’ परिसर में 30 जनवरी, 1991 को आयोजित था। महात्मा गांधी के शहादत दिवस के मौके पर उस दिन देश के कई विख्यात गीतकार-संगीतकार आये थे। इनमें कुछ प्रमुख हिस्सेदार थे: डागर बंधु, अमजद अली खान, गुलाम मुस्तफ़ा खान और शुभा मुद्गल आदि! इन सबने गीत-संगीत के जरिये विविधता भरे भारतीय समाज की एकता और जीवंतता को उस रात बार-बार जीवंत किया। श्रोताओं में देश की कई गणमान्य हस्तियां भी वहां मौजूद रहीं। 

उसी कार्यक्रम से प्रेरित और संदर्भित इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में आधुनिक इतिहास के कुछ बेहद महत्वपूर्ण हिस्सों, खासकर चिंतित करने वाले घटनाक्रमों को बहुत ईमानदारी से दर्ज किया गया है। आजादी के बाद के दशकों में जो कुछ अफसोसनाक और खौफनाक घटित हो चुका है; उसका फिल्म में दस्तावेजीकरण है। 

महात्मा गांधी की नृशंस हत्या सहित और कई घटनाक्रम इसमें दर्ज हैं। हमारे राष्ट्रराज्य और संवैधानिक विचार की आधारशिला को झकझोर देने वाली महात्मा गांधी की हत्या के अलावा महात्मा के जीवन मूल्यों पर फिल्म में ऐतिहासिक महत्व की टिप्पणियां भी हैं। 

इसमें हमारी डेमोक्रेसी और सेक्युलरिज्म को कलंकित करने ऐसे भयानक प्रसंग भी हैं, जो फिल्म बनने के बाद घटित हुए लेकिन जिनके निकट भविष्य में कभी भी घटित होने की आशंका लोगों के बीच जाहिर की जा रही थी। ऐसी ही एक घटना थी, 1992 के दिसम्बर में अयोध्या की बाबरी मस्जिद के ध्वंस की! फिल्म में राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों की फेहरिस्त में कुछ ऐसे प्रसंगों का भी उल्लेख है, जो गैर जरूरी और अटपटे लगते हैं। इससे फिल्म के मूल कंटेंट का अनावश्यक फैलाव होता है। 

सादगी और सहजता भरे प्रेजेंटेशन के बावजूद फिल्म गांधी जी के जीवन मूल्यों-सत्य और अहिंसा की शक्ति के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा करती है। फिल्मकार ने अपने कंटेंट को लोगों के बीच सहजता से ले जाने में गीत-संगीत का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया है। इसमें गांधी जी को प्रिय रहे कुछ लोकप्रिय गीत और भजन भी शामिल हैं। निश्चय ही फिल्म: “जागरण और गवाही-30 जनवरी” हमारे स्वाधीनता आंदोलन के महान् नेताओं, खासकर गांधी जी के विचारों की अच्छी रचनात्मक प्रस्तुति है। मूल्यों के विघटन के आज के दौर में निश्चय ही 

ऐसी फिल्में लोगों के बीच प्रेरक संदेश पहुंचाती हैं। 

Ramswaroop Mantri

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