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बिहारियों का प्रवास बिहार विधानसभा चुनावों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा

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एक इंटरव्यू के दौरान देश के गृह मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता अमित शाह कह रहे हैं कि बिहार के अंदर जमीन की कमी है, इसलिए कोई भी बड़ी इंडस्ट्री लानी है तो जमीन मिलने में बहुत दिक्कत होती है। इस चुनौती का समाधान बताते हुए अमित शाह ने कहा कि चूंकि बड़ी भूमि-आधारित इंडस्ट्री मुश्किल है, इसलिए ऐसी इंडस्ट्री लानी चाहिए जिसमें कम जमीन की जरूरत हो। 

वहीं दूसरी तरफ उनकी सरकार ने अडानी को 1 रुपए एकड़ के हिसाब से हजार एकड़ जमीन दे दी। नीतीश कुमार के नेतृत्व में ‘जंगलराज’ से ‘सुशासन’ के अपने दावे के साथ बिहार निवेशकों को आकर्षित करने में जुटा है। नियमित अंतराल पर कभी एनआरआई मीट तो कभी इन्वेस्टर मीट इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। ऐसे में सवाल उठने लगा हैं कि बिहार में लगातार पलायन हो रहा है, क्योंकि यहां नौकरियां नहीं हैं। बिहारियों का प्रवास बिहार विधानसभा चुनावों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा है या नहीं? वोट बिहार का तो फैक्ट्री गुजरात में क्यों?

अभी पूरे बिहार में सबसे हॉट सीट है मोकामा। उस विधानसभा के रहने वाले अजय पाठक बताते हैं कि,”कभी बिहार का औद्योगिक हब कहलाने वाला मोकामा आज खंडहरों में तब्दील हो गया है। अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण मोकामा शहर जमाने में अंतर्देशीय नौवहन और रेलवे का बड़ा केंद्र हुआ करता था। इसी खासियत की वजह से आजादी के बाद मोकामा में कई बड़ी फैक्ट्रियां लगीं और एक बड़ी थोक मंडी विकसित हुई, जहां आसपास के जिलों से लोग खरीदारी के लिए आते थे। मगर धीरे-धीरे कारखाने बंद हुए, मंडी उजड़ गई और बीते कुछ दशकों से मोकामा की एक ही पहचान रह गई है। वह है अपराध की राजधानी। वहां अक्सर गोलियां चलती हैं और गैंगवार होते हैं।” मोकामा की तरह बिहार के कई शहरों में उद्योग और व्यापार ठप हो चुका है। 

क्या वाकई भारी पड़ेगा पलायन का मुद्दा

बिहार विधानसभा चुनाव के बीच छठ महापर्व के मौके पर घर लौट रहे और फिर यहां से वापस जाने वाले लोगों की परेशानियों ने एक बार फिर पलायन का सच उजागर किया है। यह कोई पहला मौका नहीं है कि लाखों बिहारी मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, राजस्थान, चेन्नई, कर्नाटक और दिल्ली से ट्रेन में अपमानित होकर अपने सबसे लोकप्रिय धार्मिक त्योहार दिवाली और छठ पूजा मनाने के लिए यात्रा कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि यह अपमान बिहारियों की नियति है। सत्ताधीश पार्टी के तमाम नेताओं और केंद्रीय रेल मंत्री दावा करते रहे कि उन्होंने सैकड़ों ट्रेनें चलाई हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

बेंगलुरु से बिहार के सुपौल आने के लिए प्रशांत कुमार बिट्टू को ₹30000 खर्च हुआ। वह बताते हैं कि, “त्योहार के समय घर आते वक्त कोरोना की याद आ जाती है। हमारे जैसे लाखों युवा घर लौटना चाहते हैं, लेकिन रोजगार आज भी हमारे लिए बड़ा मुद्दा है। लोगों से हम अपील भी कर रहे हैं कि वे शिक्षित और ईमानदार प्रत्याशियों को ही चुनें।”

बिहार से बाहर जा रहे मजदूर खुलकर कहने लगे हैं कि, “बिहार के लोग पूरे देश में मजदूरी कर रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्से में बिहार के लोग बड़ी-बड़ी इमारतें, सड़कें, टनल, फैक्ट्रियां बनाते हैं। यानी सच यही है कि- नीतीश कुमार ने यहां से रोजगार मिटाकर बिहार के लोगों को देश का मजदूर बना दिया है।”

जात-पात से इतर अपने बच्चों का मुंह देखकर वोट नहीं डालेंगे तब तक स्थिति यथावत ही रहेगी

चुनावी मौसम में सत्तारूढ़ पार्टी भी रोजगार के लिए किए गए अपने कार्यों को गिना रही है। साथ ही नई घोषणाएं भी कर रहे हैं। चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी दोनों ही रोजगार की बात कर रहे हैं। 

राजद पार्टी की तरफ से इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर कहा गया है कि, “एनडीए के नेताओं में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान नहीं है! उन्हें कोई पीड़ा नहीं है कि बिहारी युवा बाहर दूसरे राज्यों में उपहास और तिरस्कार सहते हुए अपने दानापानी का जुगाड़ करते हैं! एनडीए के नेता जानते हैं कि दोनों गुजराती बिहार में कभी फैक्ट्री लगने नहीं देंगे!

अमित शाह ने तो साफ साफ कह दिया कि बिहार में फैक्ट्री लगाने के लिए जमीन ही नहीं है! बिहार को अब एनडीए पर कण भर भी भरोसा नहीं!”

जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर तो पिछले तीन साल से गांव-गांव घूमकर लोगों को यह समझा रहे हैं कि जब तक आप जात-पात से इतर अपने बच्चों का मुंह देखकर वोट नहीं डालेंगे, तब तक स्थिति यथावत ही रहेगी। 

वह इस मुद्दे पर लगातार कहतें रहें हैं कि, “बिहार में चुनाव होता है, नेता वोट मांगते हैं, जनता भरोसा करती है, लेकिन उसका फायदा गुजरात की फैक्ट्रियों और उद्योगों को मिलता है। बिहार के नौजवान रोजगार की तलाश में वहां जाकर मशीन चलाते हैं, जबकि बिहार में खेत बंजर व उद्योग वीरान पड़े हैं। बिहार को केंद्र सरकार लगातार ठग रही है। चाहे भाजपा की सरकार हो या उससे पहले की सत्ता, किसी ने भी बिहार को उसके हिस्से का हक नहीं दिया। बिहार के युवाओं में अपार प्रतिभा है, लेकिन व्यवस्था ऐसी है कि उन्हें घर से हजारों किलोमीटर दूर जाकर अपनी मेहनत बेचनी पड़ती है। आजादी के 75 साल बाद बिहार में कोई ऐसा जिला नहीं है, जहां उद्योग का पहिया स्थायी रूप से घूमता हो।”

Ramswaroop Mantri

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