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बिहार चुनाव में दलितों की राजनैतिक आकांक्षाएं 

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गोल्डी जॉर्ज

6 अक्टूबर को बिहार विधानसभा चुनावों की औपचारिक घोषणा की गई। इलेक्शन कमीशन के फ़ाइनल रोल में 7.42 करोड़ वोटर लिस्टेड हैं। यह एक स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के बाद हुआ है, जिसमें 69 लाख से ज़्यादा एंट्री हटाई गईं और लगभग 21.5 लाख नए नाम जोड़े गए।

हालांकि राजग, महागठबंधन, और हाल ही में गठित जन सुराज जैसी पार्टियां भी दलितों का ध्यान खींचने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन ज़मीन पर अब अलग-अलग वादों के बजाय ज़िम्मेदारी के सवाल उठ रहे हैं। बिहार में दलित वोट का सवाल कभी भी केवल जातियों की गणना या सीटों के आरक्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज मे व्याप्त ऊंचनीच, भेदभाव, संसाधनों पर सवर्णों के कब्जे आदि के खिलाफ हुंकार है।

कैसा रहा गठबंधनों का स्कोर कार्ड 

2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 9 एससी आरक्षित सीटें जीती थीं जबकि जदयू ने 8 सीटें हासिल की थीं और जीतनराम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा ने 3 एससी सीटें जीती थीं। मुकेश सहनी की वीआईपी को एक सीट मिली थी जो पिछले चुनाव में एनडीए का हिस्सा थी। पिछले चुनाव में राजद ने 10 एससी सीटों पर जीत हासिल की, कांग्रेस को दो एससी सीटें मिली थीं और वाम दलों को पांच सीटें मिली थीं।

बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 38 अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। 2010 में, राजग ने इनमें से 37 सीटें जीतकर पूरा मैदान लगभग साफ कर दिया। 2020 तक, इसकी बढ़त घटकर 21-17 रह गई थी। 2015 में, जब जनता दल (यूनाइटेड) ने महागठबंधन के हिस्से के रूप में चुनाव लड़ा, तो गठबंधन ने 38 आरक्षित सीटों में से 29 सीटें जीतीं।

2020 तक, भाजपाऔर राजद दोनों ने नौ-नौ सीटें हासिल कीं, जबकि जदयू और कांग्रेस-भाकपा (माले) -भाकपा गठबंधन ने आठ-आठ सीटें जीतीं।

बिहार के जटिल जातीय समीकरण में दलितों को एक निर्णायक समूह माना जाता है लेकिन नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके बीच भी एक विभाजन नज़र आता है।

नीतीश कुमार ने राजनीतिक लाभ-हानि को देखते हुए दलित वर्ग को महादलित और दलित में बाँटकर रामविलास पासवान की जाति दुशाद को कुछ ऐसी सुविधाओं से अलग रखा था जिन्हें महादलित के नाम पर दिया गया था। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस मुद्दे पर रामविलास पासवान के बाद चिराग पासवान भी नीतीश कुमार से खार खाए रहते हैं।

एनडीए का जातीय समीकरण 

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में सभी गठबंधन और पार्टियों ने अपनी चुनावी रणनीति को संतुलित करने हेतु जातिय प्रतिनिधत्व पर ध्यान दिया है। इस चुनाव में सवर्ण जातियों के प्रत्याशियों के साथ-साथ, खास इलाकों में गैर-सवर्ण जाति के प्रत्याशियों को मैदान में उतारा गया है ताकि जातिगत दबदबे का मुकाबला हो सके। 

राजग के सीट बंटवारा फार्मूले के अंतर्गत जदयू और भाजपा 101-101 सीटों पर चुनाव मैदान मे उतारेगी। लोजपा (आर) को 29, और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) एवं उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोक मोर्चा को 6-6 सीट मिली हैं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जदयू ने ओबीसी, ईबीसी और एससी समुदायों से सबसे ज़्यादा प्रत्याशियों को टिक्कत दिया है। खुद को नॉन-यादव ओबीसी और ईबीसी की पॉलिटिकल आवाज़ के तौर पर प्रोजेक्ट करते हुए, नीतीश ने ओबीसी को 37 टिकट, ईबीसी को 22, एससी को 15 और एसटी को एक टिकट दिया है। 

लोजपा (आर) ने 29 सीटों में से राजपूत और यादव से पांच-पांच और पासवान और भूमिहार से चार-चार उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इसके अलावा पार्टी ने ब्राह्मण, तेली, पासी, सुधी, रौनियार, कानू, रजवार, धोबी, कुशवाहा, रविदास और मुस्लिम समुदाय से एक-एक को भी टिकट दिया है।

राजग के बड़े पार्टनर भाजपा की 71 प्रत्याशियों की पहली सूची में करीब 50% उम्मीदवार दलित, ओबीसी, ईबीसी और एससी/एसटी समुदायों से थे। वैसे जनसंख्या के आधार पर देखा जाए तो भाजपा ने सवर्ण उम्मीदवारों को ज्यादा महत्व दिया।

कहाँ खड़ा है महा गठबंधन 

विपक्षी महागठबंधन के भीतर की दरारें भर नहीं पाई हैं। कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), भाकपा (माले) और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद 11 सीटों पर फ्रेंडली फाइट टल नहीं सकी। 

महागठबंधन की ओर से राजद ने 143 सीटों में से 51 यादवों को टिकट दिया है। वही इस दफा ऊंची जातियों और ईबीसी के उम्मीदवार पूर्व से अधिक हैं।

कुल मिलाकर, आरजेडी ने 18 कुर्मी-कुशवाहा, 51 यादव, 8 वैश्य, 14 अपर-कास्ट, 33 ईबीसी, 19 एससी, और 18 मुस्लिम उम्मेदवार को मैदान में उतारा है। कांग्रेस, जो 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, ने अपने लगभग एक-तिहाई कैंडिडेट – कुल 21 – अपर-कास्ट कम्युनिटी से नॉमिनेट किए हैं। इसकी कैंडिडेट लिस्ट में 5 यादव, 6 ईबीसी, 3 वैश्य, और 12 एससी भी शामिल हैं। 

कुल मिलाकर महागठबंधन 254 उम्मेदवार उतारेगी, जिसमे से 11 सीटों पर फ़्रेंडली फाइट का फार्मूला होगा। यानि कांग्रेस-आरजेडी-वीआईपी और सीपीआई (एमएल) के बीच 11 सीटों पर सीधा दोस्ताना जंग।

खेदजनक बात यह है कि 11 सीटों पर अंदरूनी मुकाबला ऐसे वक्त में हो रहा है जब महागठबंधन को एकजुट चेहरा दिखाने की जरूरत थी। दिलचस्प यह है कि इन 11 सीटों में से सात फिलहाल राजग के कब्जे में हैं, जबकि शेष विपक्षी दलों के पास। ऐसे में यह दोस्ताना मुकाबला महागठबंधन के लिए चुनावी समीकरणों को मुश्किल बना सकता है। खासकर तब, जब 2020 के चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच वोट शेयर का अंतर महज 0.03 प्रतिशत रहा था।

केवल माले ने एक जगह दलित उम्मेदवारों को सामान्य सीट से उतारा है। एक और खास बात यह है कि प्रशांत किशोर द्वारा नवगठित जन सुराज पार्टी ने भी एक अनारक्षित सीट हरनौत से एससी उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की होम सीट है।

दलितों की राजनैतिक आकांक्षाएं

यह चुनाव यह टेस्ट कर सकता है कि बिहार की जनतंत्र केवल दिखावे वाली लीपापोती है, या उससे कुछ कदम आगे बढ़ेगी। दलित अब हाशिए पर नहीं रहना चाहते, बल्कि वे सत्ता और निर्णय लेनेवाली प्रक्रिया के केंद्र मे आना चाहते हैं। गुलामी से बैलेट तक और गुमनामी से दावे तक का उनका सफ़र शायद बिहार के लोकतांत्रिक वादे और इस चुनाव की सबसे सच्ची झलक है।

दलितों का उभरता हुआ राजनीतिक आत्मविश्वास जाति के ज़ुल्म के खिलाफ़ संघर्ष के लंबे इतिहास से आता है, जो बंधनों को तोड़कर अपने हक-अधिकार तक के सफ़र को दिखाता है। कभी ज़मीन, पढ़ाई-लिखाई और इज़्ज़त से दूर रखे जाने वाले और बंधुआ मज़दूर कहे जाने वाले मूल्यहीन समुदाय अब सामाजिक और राजनीतिक सेल्फ-डिटरमिनेशन (स्व-निर्णय के सिद्धांत) की तरफ़ लगातार बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

Ramswaroop Mantri

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