अखिलेश अखिल
गर राजनीति में कुछ भी संभव है और राजनीति में कोई किसी का न स्थाई दोस्त होता है और न ही दुश्मन तो क्या इस बात की सम्भावना से कोई इंकार कर सकता है कि बिहार जैसे राज्य में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद बीजेपी मौन रहे और अपनी स्थाई सरकार नहीं बनाये। अगर बीजेपी इतनी बड़ी जीत के बाद भी बिहार में अपनी सरकार नहीं बना पाती है और अपना मुख्यमंत्री नहीं बहाल कर पाती है तो यह भी बीजेपी के गुणा-गणित के हिसाब से ठीक नहीं हो सकता। जो बीजेपी कम सीटों के बाद भी कई राज्यों में उलटफेर करके सरकार बनाती रही है, भला वह बिहार में कैसे चूक कर सकती है ?
बीजेपी की अगली रणनीति क्या हो सकती है इसे रेखांकित करने की ज़रूरत है। सबसे पहले यह जान लें कि बिहार के हालिया चुनाव परिणाम में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला है। ऐसा बहुमत जिसकी कल्पना एनडीए के लोग भी नहीं कर रहे थे। अब यह प्रचंड जीत क्यों और कैसे हुई इस पर कई तरह की बातें की जा सकती हैं लेकिन एक साधारण सी बात तो यही है कि एनडीए और खासकर बीजेपी की इतनी बड़ी जीत के पीछे चुनाव आयोग का खेल और नकदी वितरण की कहानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिस बिहार की अधिकतर आबादी आज भी गरीबी, असमानता और पलायन का दर्द झेल रही हो उस बिहार की हकीकत को जानते हुए वहां की जनता को लोभ में फंसाने में कोई दिक्कत किसी को नहीं हो सकती।
फिर बीजेपी इस लोभ जाल का फायदा कैसे नहीं उठाती। हर महिला को नकदी दस हजार की राशि, बूढ़ों को पेंशन और बेरोजगारों को हजार रुपये का भत्ता देने की बात कोई मामूली बात नहीं है। कोई कह सकता है कि विपक्षी गठबंधन वाले भी कई तरह के वादे करते फिर रहे थे लेकिन सच यही है कि वे नकदी नहीं दे रहे थे, केवल वादा कर रहे थे। यहाँ तो सरकार थी और चुनाव के बीच भी वह नकदी बाँट रही थी। दस हजार की नकदी बिहार जैसे गरीब राज्य के लिए कोई मामूली रकम तो है नहीं। जिसने भी नकदी लिया और भविष्य में दो लाख और पाने का आश्वासन पाया, सब नीतीश -मोदी के मरोड़ होते चले गए। चुनाव में उन्होंने बड़ा खेल किया और बचे खेल को चुनाव आयोग ने पहले से तय समीकरण के मुताबिक अंजाम दे दिया।
हालिया बिहार के चुनावी परिणाम में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आयी। यह कोई मामूली करिश्मा नहीं है। याद कीजिये अब बिहार भी बीजेपी के चंगुल में जा चुका है। समय आने पर यह बिहार भी हिंदुत्व और मुसलमान का अखाड़ा बनेगा। लेकिन मुश्किल यह है कि तब तक नीतीश कुमार बिहारी समाज को बचाने के काबिल नहीं रहेंगे। या तो वे राजनीति से अलग हो जायेंगे या फिर कहीं बियाबान में भटकते नजर आएंगे। बाद में बिहार की दशा को जब वे जानेंगे तो सिर्फ आहें ही भर सकेंगे। कोई चारा नहीं बचेगा। कोई कुछ कर भी नहीं पायेगा।
लेकिन अभी यह सब शीघ्र होने वाला नहीं है। अभी तो ताज किसके सर पर सजेगा इस पर खेल होगा। संभव है इस बार भी यानी दसवीं बार भी नीतीश को भारी मन से बीजेपी मुख्यमंत्री बना दे लेकिन याद रखिये यह ड्रामा स्थाई नहीं होगा। मौजूदा खेल इसलिए किया जाएगा ताकि केंद्र की सरकार में कोई हलचल नहीं हो। मोदी की सरकार पर कोई आफत नहीं आये। इसलिए बिहार के खेल को धीरे-धीरे अंजाम देना है।
बीजेपी ने जिन 101 सीटों पर चुनाव लड़ा, उसमें से उसे 89 सीटों पर जीत हासिल हुई। इस तरह उसका स्ट्राइक रेट 88.1 फीसदी रहा। नीतीश कुमार की जेडीयू ने 85 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि सिर्फ 29 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने 19 सीटें जीतीं। छह सीटों पर चुनाव लड़ने वाली जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा पांच सीटें जीती, उसने सिर्फ 6 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसी तरह छह सीटों पर चुनाव लड़ने वाली उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने चार सीटों पर जीत हासिल कर ली। यहां तक कि असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी पांच सीटें जीतने में कामयाब रही। जबकि विपक्षी महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया। इनमें से 25 सीटें आरजेडी के खाते में गईं।
इन अविश्वसनीय आंकड़ों को देखते हुए राजनीतिक विज्ञानी सुहास पलशीकर ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा: ‘जब पार्टियां 80-90 फीसदी सीटों पर जीत हासिल करें तो क्या चुनाव विश्लेषण इस बात पर केन्द्रित नहीं होना चाहिए कि उन्होंने शेष 10-20 फीसदी सीटें क्यों खो दीं?’
इन आंकड़ों का मतलब यह भी है कि बीजेपी नीतीश की जेडीयू के बिना भी बहुमत के काफी करीब है, जो ‘ऑपरेशन लोटस’ के लिहाज से नीतीश की पार्टी को कमजोर स्थिति में डालता है। एनडीए के घटक दलों की जीत के आंकड़ों का यह भी मतलब है कि अपनी पार्टी की बहुत अच्छी स्ट्राइक रेट के बावजूद नीतीश या तो इस बार मुख्यमंत्री का ताज नहीं पहनेंगे या जल्द ही कुर्सी खो बैठेंगे। और, इस बार दलों की जो स्थिति है, उसे देखते हुए नीतीश के पास एक बार फिर पलटी मारने की धमकी देने का कोई मौका नहीं होगा। बीजेपी ने इसी उम्मीद पर चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करने का जोखिम उठाया। इसलिए, श्रीमान नीतीश कुमार सावधान रहें, आप चाकू की धार पर हैं।
आप कल्पना कीजिये कि अगर नीतीश कुमार सीएम बनने की जिद पर अड़ते हैं तब क्या वे कुछ करने की स्थिति में हैं ? कदापि नहीं। महागठबंधन के पास अब कोई ताकत ही नहीं बची है जिसके आसरे नीतीश कोई बड़ा खेल कर सकते हैं और पलटी मारने के बारे में सोच सकते हैं। यही वह वजह है जहाँ नीतीश कुमार या तो निरुत्तर हो गए हैं या कह सकते हैं कि विपक्ष को काफी कमजोर करके बीजेपी ने नीतीश कुमार को बौना बना दिया है। उन्हें चाकू की धार पर खड़ा कर दिया है।
इसमें कोई शक नहीं कि साल भर के भीतर बिहार की राजनीति में बड़ा खेल हो सकता है। बीजेपी अपनी सरकार बनाने की कोशिश करेगी। या तो वह गैर जदयू एनडीए के बाकी घटक दलों के साथ मिलकर सरकार बना सकती है या फिर सरकार को मजबूती प्रदान करने के लिए जदयू को तोड़ भी सकती है। ठीक वैसे ही जैसे कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में हुआ था। मध्यप्रदेश में बीजेपी ने क्या किया था ? 230 सदस्यों वाली मध्यप्रदेश विधान सभा की कहानी भी विचित्र ही है।
2020 में कांग्रेस के पास कुल 114 विधायक ही थे जबकि बीजेपी के पास 108 विधायक थे। कांग्रेस ने कई छोटी पार्टियों और निर्दलीयों को जोड़कर 121 विधायकों का समर्थन बनाया और सरकार बनाई। उधर बीजेपी अपना खेल कर रही थी। सिंधिया को कांग्रेस से तोड़ा गया और फिर कांग्रेस के 22 विधायकों को तोड़कर कमलनाथ की सरकार को गिरा दिया गया। तब से कांग्रेस बियाबान में ही भटक रही है।
यही हाल गोवा में भी बीजेपी ने किया था। गोवा में कुल 40 विधानसभा सीटों के लिए साल 2017 में जब चुनाव हुए थे तो नतीजों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। उसे कुल 17 सीटें हासिल हुई थीं और दूसरे नंबर पर बीजेपी रही थी। बीजेपी को इस चुनाव में केवल 13 सीटें मिली थीं। चुनाव नतीजों में कांग्रेस बड़ी पार्टी थी लेकिन बीजेपी ने एमजीपी, जीएफपी व 2 निर्दलीय विधायकों के सहारे सरकार बना ली थी। इसी तरह जब साल 2022 में गोवा विधानसभा के चुनाव नतीजे आए तो बीजेपी ने 20 सीटें जीती। यहां भी वह एक सीट से बहुमत पाने में नाकामयाब रही थी। फिर बीजेपी ने 3 निर्दलीय और महाराष्ट्रवादी गोमांतक (एमजीपी) के 2 विधायकों का सपोर्ट लिया और राज्य में अपनी सरकार बना ली।
कर्नाटक का खेल भी सबको याद ही होगा। वह समय था 2018 का। 224 विधान सभा सीटों वाली कर्नाटक विधानसभा में बीजेपी के पास 104 सीटें थीं। तब कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन से वहां सरकार बनी थी। सरकार के साथ 120 विधायक थे। फिर पूरी ताकत लगाकर और दक्षिण के दुर्ग को बचाने के लिए बीजेपी ने ऑपरेशन कमल शुरू किया और 16 विधायक बीजेपी के साथ चले गए। यह 2019 की बात है। गठबंधन की सरकार गिर गई। बीजेपी की सरकार बन गई थी।
इसके बाद हरियाणा में भी बीजेपी ने कुछ ऐसा ही किया। पहले जजपा के साथ गठबंधन किया और बाद में निर्दलीयों का सहारा लेकर जजपा को निकाल कर सरकार बना ली। और सबसे बड़ा खेल तो महाराष्ट्र में हुआ जिसे शिंदे खेल के नाम से जाना जाता है। महाराष्ट्र में शिव सेना को तोड़ा। शिंदे को खड़ा किया। और बाद में शिंदे को दोयम दर्जे का आदमी बना दिया। फिर एनसीपी को भी तोड़कर शरद पवार की राजनीति को ही डेंट लगा दिया।
अब बिहार की बारी है। पहली बार बीजेपी अपनी औकात में है। भले ही वह कुछ समय के लिए नीतीश के साथ बाजी खेल जाए लेकिन लम्बे समय तक यह खेल कारगर नहीं होगा। या तो जदयू में टूट होगी या फिर गैर जदयू के साथ ही बीजेपी अपना अलख जगाने की कोशिश करेगी





