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*मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान विरोध की हर आवाज को कुचल देने पर आमादा,जल जंगल जमीन पर आदिवासियों के अधिकार?*

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लाल बहादुर सिंह

भारत का मौजूदा फासीवादी सत्ता प्रतिष्ठान विरोध की हर आवाज को कुचल देने पर आमादा है। इसकी शुरुआत सीधे सत्ता शिखर से हो रही है। देश कभी भूलेगा नहीं कि जब किसान विरोधी काले कानूनों के खिलाफ किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन चल रहा है जिसने साढ़े सात सौ किसानों की शहादत के बाद अंततः सरकार को घुटने टेकने और काले कानूनों को वापस लेने पर मजबूर कर दिया था, तब प्रधानमंत्री ने स्वयं उनके नेतृत्व को आंदोलनजीवी करार दिया था।इतिहास गवाह है कि चुनाव के माध्यम से सत्ता में पहुंच फासीवादी ताकतों ने पिछली सदी में धीरे-धीरे अपना असली रंग दिखाया और जर्मनी जैसे देशों में अधिनायकवादी फासीवादी शासन थोप दिया। हाल ही में दिल्ली गेट पर दिल्ली के भयानक प्रदूषण के लिए सरकार की जिम्मेदारी के विरुद्ध आवाज उठाने पर 23 छात्रों  को गम्भीर धाराओं में जेल में डाल दिया गया। स्वच्छ हवा में सांस लेने का जो जनता का विशुद्ध मौलिक अधिकार है, उस पर आवाज उठाने पर छात्रों को जेलों में ठूंस दिया गया।

जहां तक हिड़मा अमर रहे का नारा लगाने वालों की बात है, तो सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक रूलिंग के अनुसार जब तक आप राज सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए हथियार नहीं उठाते हैं, महज नारे लगाने से उसे अपराध नहीं माना जाएगा चाहे वह खालिस्तान जिंदाबाद का देश को तोड़ने वाला नारा ही क्यों न हो। लेकिन दिल्ली पुलिस की निगाह में प्रदूषण विरोधी प्रदर्शन में  कुछ छात्रों द्वारा यह नारा देश को तोड़ने वाला राष्ट्र विरोधी भयानक अपराध बन गया।

हिड़मा अमर रहे नारे के संदर्भ में यहां यह साफ कर देना जरूरी है कि तमाम लोग जो भारत में माओवाद के समर्थक नहीं है, वे भी जल जंगल जमीन पर आदिवासियों के अधिकार को स्वीकार करते हैं और उस अधिकार की रक्षा के लिए उनके संघर्ष को जायज मानते हैं। जाहिर है यह अगर लोकतांत्रिक जनांदोलन होता तो व्यापक समाज का समर्थन उन्हें मिलता और हिंसक राजद्रोह का मामला बताकर उसे कुचलना उनके लिए आसान न होता।

दरअसल भारत का मौजूदा फासीवादी सत्ता प्रतिष्ठान विरोध की हर आवाज को कुचल देने पर आमादा है। इसकी शुरुआत सीधे सत्ता शिखर से हो रही है। देश कभी भूलेगा नहीं कि जब किसान विरोधी काले कानूनों के खिलाफ किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन चल रहा है जिसने साढ़े सात सौ किसानों की शहादत के बाद अंततः सरकार को घुटने टेकने और काले कानूनों को वापस लेने पर मजबूर कर दिया था, तब प्रधानमंत्री ने स्वयं उनके नेतृत्व को आंदोलनजीवी करार दिया था।

इधर गृहमंत्री बाकायदा डेड्लाइन तय किए हुए हैं कि 2026 तक माओवाद को खत्म कर देना है। स्वाभाविक रूप से इससे निचले स्तर तक शासन प्रशासन को असहमति और विरोध के स्वरों को कुचलने का जैसे लाइसेंस मिल गया है।

छात्रों के बीच से एक युवा को पकड़कर पुलिस वाला जिस तरह उसका सर दबाए हुए है, उसने लोगों को अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या की याद दिला दी जहां इसी तरह दबाकर गोरे पुलिस वाले ने काले जार्ज की हत्या कर दी थी। यह सर्वविदित है कि जिन जंगलों पर कब्जा किया जा रहा है वहां अकूत खनिज संपदा मौजूद है। उसे अपने चहेते पूंजीपतियों को सौंपने के लिए उन पर कब्जे का अभियान चल रहा है।

आदिवासी अपने जमीन और जंगल पर कब्जे को रोकने के प्रतिरोध के लिए माओवादियों के साथ जा रहे हैं क्योंकि कोई और राजनीतिक ताकत इसमें उनकी मदद नहीं कर रही है। उधर माओवादी भारत में क्रांति की अपनी समझ के चलते सशस्त्र क्रांति के अव्यावहारिक रास्ते पर अड़े हुए हैं जिसका लेनिन ने लेफ्ट विंग कम्नियुज़म एन इन्फैन्टाइल डिसॉर्डर में वर्णन किया है।

जाहिर है भले ही भारतीय राज्य को हथियारबंद प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है लेकिन उसे आदिवासी प्रतिरोध को कुचलने में इससे व्यापक सामाजिक वैधता भी मिल जा रही है, क्योंकि लोगों को  माओवादी हिंसा का औचित्य समझ में नहीं आ रहा है। सैन्य बलों अथवा राजनेताओं की हत्या आदि से आम समाज में सरकार माओवादियों के खिलाफ माहौल को और भी विषाक्त बनाने में सफल हो रही है।

माओवादियों को आतंकवाद की श्रेणी में डालकर उन्हें खत्म करने के नाम पर सरकार जंगल की विपुल खनिज संपदा पर कब्जा करने और उसे अपने चहेते पूंजीपतियों को सौंपने में लगी है।

यह सर्वथा अन्यायपूर्ण और निंदनीय है

उधर, एसआईआर के नाम पर बीएलओ की आत्महत्याओं और असामान्य हार्ट फेल की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। दरअसल चुनाव आयोग ने निर्वाचन सूची के नवीनीकरण के लिए एसआईआर का जो तुगलकी फरमान जारी किया है, वह न सिर्फ असंवैधानिक है, बल्कि मतदाताओं और बीएलओ दोनों के लिए समस्या का सबब बन गया है। इसकी वजह से व्यापक अराजकता और भारी अफरा तफरी का माहौल बन गया है।

इसी बीच बिहार में एसआईआर के बाद हुए चुनावों में भाजपा नीतीश के हाथों कांग्रेस राजद और वामपंथ को करारी हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा चुनाव में भाजपा को अल्पमत में धकेलकर विपक्ष ने जो मनोवैज्ञानिक राजनीतिक बढ़त हासिल की थी, वह खास तौर से बिहार चुनाव की करारी हार के बाद उसने खो दिया है।

ऊपर से चुनावों की विश्वसनीयता पर कर्नाटक और हरियाणा के चुनाव पर राहुल गांधी ने ठोस प्रमाणों के माध्यम से साबित कर दिया है कि चुनाव में जमकर धांधली हो रही है। बिहार चुनाव परिणाम ने धांधली के इस आरोप को और पुष्ट किया है।

स्थिति बद से बदतर  होती  जा रही है

दरअसल जिस तरह पहले से ही वोटर लिस्ट में फर्जीवाड़े के माध्यम से असली मतदाताओं का नाम  काटकर और फर्जी नाम जोड़कर धांधली के माध्यम से चुनाव जीते जा रहे थे जैसा राहुल ने कर्नाटक और हरियाणा के चुनाव के माध्यम से दिखाया, उसे ही अब एक तरह से एसआईआर के माध्यम से कानूनी जामा पहनाया जा रहा है और संस्थाबद्ध रूप प्रदान किया जा रहा है।

लोकतंत्र की बुनियाद जिन दो मूल आधारों पर टिकी है निष्पक्ष चुनाव और जनांदोलन उन दोनों को खत्म कर देने की कोशिश हो रही है। एसआईआर के नाम पर हड़बड़ी में जो फर्जीवाड़ा किया और करवाया जा रहा है उसका इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि तमाम बीएलओ ऊपर से डाले जा रहे तरह तरह के दबाव को बर्दाश्त न कर पाकर आत्महत्या  कर रहे हैं हार्ट अटैक के शिकार हो रहे हैं और नौकरी से इस्तीफा दे रहे हैं।

ऊपर से अलग अलग दिखने वाले ये सारे प्रकरण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जनता के एक वोट मात्र के बुनियादी अधिकार को मजाक बनाकर, अपने अनुरूप चुनाव करवाकर और असहमत आवाजों को बर्बरतापूर्वक कुचल कर, क्या भारत सचमुच इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील होने की ओर निर्णायक ढंग से बढ़ चला है?

लोकसभा चुनाव में अल्पमत में आ जाने के कारण संघ भाजपा भारत को संघ के 100वें वर्ष में हिंदू राष्ट्र घोषित करने का अपना चिर संचित मंसूबा तो पूरा नहीं कर पाये। लेकिन संविधान दिवस  26 नवंबर के दिन को खास तौर से चुना गया अयोध्या में राम मंदिर पर ध्वज फहराने के लिए,जिसमें कोई धर्माचार्य नहीं वरन मोदी के साथ संघ प्रमुख भागवत भी थे और योगी तो थे ही। यह एक तरह से डी फैक्टो हिंदू राष्ट्र का ध्वजारोहण ही था।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)  

Ramswaroop Mantri

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