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*अन्नपूर्णा आश्रम में हुई ऐतिहासिक भागवत कथा, हजारों धर्म प्रेमी बने साक्षी*

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*प्रभु जी नागर ने जीवन के मूल्य को कथा के माध्यम से श्रोताओं के मन में उतारने का सार्थक प्रयास किया*

*रामबाबू अग्रवाल* 

मालवा अंचल में मालवी भाषा में कमल किशोर जी नगर की भागवत कथा का अलग ही आकर्षक है जहां भी उनकी कथा होती है वहां हजारों की तादाद में ग्रामीण जुड़ते हैं और कथा स्थल एक ग्राम में जीवन किया जीता जागता उदाहरण बन जाता है नागर जी की अपनी मान्यता है कि वह कथा केवल गांव में ही करते हैं तथा ग्रामीण मान्यताओं को उनकी कथा में आदर मिलता है। कमल किशोर जी की तरह ही अब उनके पुत्र प्रभु जी नगर भी भागवत कथा में नया इतिहास रच रहे है। हाटकेश्वर धाम सेमली से भागवत कथा मर्मज्ञ गौ सेवक प्रभुजी नागर की भागवत कथा गत दिनों इंदौर के अन्नपूर्णा आश्रम में आयोजित की गई थी उनकी कथा का आकर्षण ऐसा था की सातों दिन, दिन हो या रात हजारों लोगों का मेला अन्नपूर्णा आश्रम में लगा रहा। दाल मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल एवं स्वर्गीय मथुरा लाल जी अग्रवाल के परिवार द्वारा आयोजित इस कथा में जितनी भीड़ आई थी वह ऐतिहासिक तो थी ही साथ ही अभी तक इंदौर में जितनी भी कथाएं हुई है उसका रिकॉर्ड तोड़ने वाली भी है।

 कथा सनातन आचरण के मामले में भी आदर्श रही है जहां व्यास पीठ को भी सनातन आदर्श के अनुरूप बनाया गया था वहीं व्यास पीठ के पूजन के लिए भारतीय वेशभूषा धोती कुर्ता अनिवार्य था इसी के साथ बीच कथा में व्यास पीठ पूजन केलिए किसी को भी अनुमति नहीं थी ऐसे ही कुछ अलग नियम प्रभु जी नागर की कथा में थे जो इस कथा को अन्य कथाओं से अलग बनाती है भागवत मर्मज्ञ प्रभु जी नागर ने जहां भाग भागवत के कथानकों को श्रोताओं के आचरण में उतारने का आवाहन किया वहीं जीवन मूल्य पर भी उन्होंने कई विचारणीय मुद्दे उठाएं श्री नागर जी का कहना था कि सच्चा भक्त वही है, जो टोने-टोटके इत्यादि अंध विश्वास से दूर है। क्षणिक लाभ के लिए गलत मार्ग पर जाना भगवान के भक्त को शोभा नही देता है। धर्म स्वयं के कल्याण के लिए होता है और इस मार्ग पर चलकर व्यक्ति इस लोक के साथ ही अपने परलोक को भी सुधारता है, लेकिन इसका कोई शार्टकट नहीं होता है।

श्री नागर जी ने श्रद्धालुओंस कहा कि छोटी-मोटी सिद्धियों से लोग प्रभावित तो हो सकते हैं और उनके छोटे-मोटे स्वार्थ भी सिद्ध हो सकते है, लेकिन यह बहुत छोटी चीज है। तत्वरूपी धर्म को भगवान के बताए हुए रास्ते पर ही चलकर मूल रूप से प्राप्त किया जा सकता है। प्रभुजी नागर ने सभा में एकत्रित किसानों का उदाहरण देते हुए कहा कि फसल प्राप्त करने के लिए पहले जमीन बनाई जाती है फिर उसमें अच्छे उपचारित बीज बोए जाते हैं, उसे समय-समय पर सिंचित करना पड़ता है, तब जाकर फसल पककर तैयार होती है और इसके लिए किसान को कठोर परिश्रम करना पड़ता है। इसी प्रकार मोक्ष प्राप्त करने के लिए और ईश्वर को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अच्छे कर्म करते हुए भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण के बताए हुए मार्ग पर चलना पड़ता है। यही धर्म का मार्ग है जो भक्तिकाल में मीरा ने चुना था, जो कि कठिन है और इसके लिए व्यक्ति को काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या से दूर रहते हुए आत्मसयम के साथ अपना-अपना कर्म करते हुए जीवन जीना पड़ता हव्यक्ति का कर्म ही उसका धर्म

जीवन में कर्म की प्रधानता को उल्लिखित करते हुए श्री नागर जी ने कहा कि भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने जीवन जीने के सिद्धांतों को प्रतिपादित किया है, जिसके अनुसार व्यक्ति का कर्म ही उसका धर्म है और इस मृत्युलोक में जो व्यक्ति अपने धर्म को मानते हुए कर्म करता है, उसे उसका वांछित फल जरूर प्राप्त होता है। भगवान को मनुष्य का निर्मल व पवित्र मनुष्य ही प्रिय है। इसलिए व्यक्ति को छल, कपट, अनैतिक कार्य, अनाचार, दुराचार, बेईमानी इत्यादि से दूर रहना चाहिए और कुसंगति से बचना चाहिए। सदगृहस्थ मनुष्य को अपने परिवारजनों के साथ रोज मंदिर जरूर जाना चाहिए, ताकि अपने बच्चों में भी संस्कार पैदा हो। 

रामबाबू अग्रवाल 

अध्यक्ष, मारुति नंदन बालाजी सेवा संस्थान, इंदौर

Ramswaroop Mantri

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