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*सही समाधि-लेख:मिड-डे में छह वर्षों से चल रहे स्तम्भ की मौत की घोषणा के मायने*

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(एजाज अशरफ का मुंबई से प्रकाशित मिड-डे में छह वर्षों से चल रहा स्तम्भ बंद हो गया और सोमवार को स्तम्भ के समाधि लेख के साथ उन्होंने स्तम्भ की मृत्यु की घोषणा की। वरिष्ठ पत्रकार और “भीमा कोरेगाँव : चैलेंजिंग कास्ट” के लेखक के इस लेख का अनुवाद यहाँ दे रहे हैं – संपादक)   

मंडे ब्लूस की श्रद्धांजलि लिखने का जी तो कर रहा है, जो आखरी सांस ले रहा है और जैसे ही आप आज इसकी आखरी किश्त पढ़कर समाप्त करेंगे, यह बिना किसी शोरशराबे या अफसोस के मर जाएगा।

लेकिन, मैं खुद को सिर्फ मिड-डे को यह श्रेय देने तक ही सीमित रखूँगा जिसने मुझे अधिकांशत: स्वतंत्र रूप से अपने विचार रखने दिए, वह विचार भी जो मौजूदा सत्ता के लिए अभिशाप जैसे हैं, जो किसी वाचडॉग की चपलता से मीडिया सामग्री को सूँघता और जाँचता रहता है। यदि आपको लग रहा है कि मैं व्यंग्यात्मक हूँ तो आपकी गलती नहीं है। 

कई पत्रकार दोस्त पूछते थे, “आपको यह सब लिखने कैसे दिया जाता है?” लोकतंत्र में इस तरह का सवाल आश्चर्यजनक ही होता है, लेकिन मुझे तब अमेरिकी पत्रकार एजे लीबलिंग की याद आती है जिन्होंने कहा था, “प्रेस की आजादी केवल मालिकों को मिलती है।” मालिक, वास्तव में, तय करते हैं कि उनके लिए काम कर रहे पत्रकारों को किस हद तक आजादी मिलनी चाहिए। मुझे आज तक पूरी आजादी मिली है। 

इसके बावजूद, जब से, मई 2014 से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं, मालिकों को भी प्रेस की आजादी नसीब नहीं है। कश्मीर टाइम्स, सरकारी विज्ञापन रोककर जिसकी जान धीरे-धीरे निकाल ली गई, के मालिक और संपादक जोड़े, अनुराधा भसीन और प्रबोध जामवाल, से पूछ लें। अखबार बंद हो चुका था लेकिन फिर 2023 में डिजिटल संस्करण में वापस आया और रोजाना 52000 लोग साइट पर जाते हैं।

मीडिया के महारथियों के विपरीत, कश्मीर टाइम्स, एक मक्खी की तरह कश्मीर में ज्यादतियों और गलतियों के खिलाफ भिनभिनाता रहा, जिससे राज्य ने बंद जम्मू कार्यालय पर छापा मार दिया और अविश्वसनीय तरीके से वहाँ रखे हथियार ढूंढ लिए। छापे मारने का कारण देश द्रोही गतिविधियों की श्रेणी में आने वाले आरोपों की जांच करना था।

सत्ता ने लोकतंत्र के एक और वाचडॉग, जो कश्मीर टाइम्स के लिए एक सम्मानजनक उपाधि है, को रस्सी से बांध दिया है, जो सजा सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के लिए तय की थी। स्वतंत्र मीडिया को चुप कराने के तरीके असीमित हैं।

हालांकि वह मालिक हैं लेकिन भसीन और जामवाल की प्रेस की आजादी नहीं हो सकी क्योंकि वह खुद भी तेजतर्रार पत्रकार हैं, जो प्रजाति खतरे में पड़ती जा रही है।

अधिकांश मालिक, व्यवसायी हैं, जो अपने पत्रकारों को सेन्सर करते हैं, खबरों को नजरंदाज कर देते हैं। वह झुक जाते हैं क्योंकि उन्हें छापों और टैक्स चोरी के मामलों से डर लगता है, हालांकि उनकी खामोशी उन्हें सरकार के जरिए दिए विज्ञापनों के रूप में कमाई करवाती है। कम से कम उनके मामलों में, सरकार, अपनी असीमित शक्तियों के साथ, मीडिया की कलम तोड़ने के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार पाई जा सकती है। 

बड़ी कॉर्पोरेट हस्तियों के लिए यह बहाना भी नहीं बनता क्योंकि वह मीडिया में नीतियों को प्रभावित करने और क्रोनी पूंजीवाद के लाभार्थी होने के कारण खराब हुई छवि को सुधारने आते हैं। ताकत और पैसा जुटाने के लिए मीडिया आजादी की बलि लेना एक पूर्वशर्त है। यह अपरिहार्य है कि वह सत्तारूढ़ पार्टी के गलत कार्यों को भी मास्टर स्ट्रोक करार देकर पेश करेंगे जैसा कि हाल के बिहार चुनावों में किया गया।

लालच और डर के अलावा, विचारधारा ने भी मीडिया को सरकार की आवाज में बदला है ,जैसा कि मोदी के छठे रामनाथ गोयनका व्याख्यान में सामने आया। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका की ब्रिटिश के विरोध के दशकों बाद आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी का विरोध करने के लिए भी सराहना की।

लेकिन, उसीके साथ, उन्होंने गोयनका की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के पिछले स्वरूप भारतीय जन संघ से नजदीकियों का जिक्र किया, जिसके टिकट पर चुनाव लड़कर वह लोकसभा चुनाव जीते थे। मोदी ने एक तरह से साबित किया कि गोयनका का इंदिरा गांधी का विरोध प्रेस की आजादी के लिए लड़ने के साथ साथ हिन्दुत्व को मजबूत करने के लिए भी था।

पारंपरिक मीडिया मालिकों का बड़ा हिस्सा उस सामाजिक समूह से रहा है जिसने पारंपरिक रूप से आरएसएस और हिन्दुत्व विचारधारा का समर्थन किया है। पत्रकारीय तटस्थता और अपने विचारधारात्मक झुकाव के बीच फंसे अधिकतर मीडिया की स्थिति रस्सी पर चलने वाले उस कलाकार की तरह हो गई है जो संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा हो।

इस टकराव का तनाव दिखता है। मोदी की हल्की आलोचना करने वाले लेख उनकी काबिलियत की तारीफ करने वाले लेखों और उनकी घिसी पिटी टिप्पणियों पर भी मुखपृष्ठों की सुर्खियां बनाने के कारण दब जाते हैं। 

काँग्रेस के शासन के दशकों में काँग्रेस की विचारधारा के प्रति भी अपनापन मीडिया की विशेषता हुआ करती थी। उसने भी मीडिया मालिकों को संसद में भेजा। बुरी बात यह भी है कि नेहरू सरकार ने संघ मुखपत्र ऑर्गनाइजर और वामपंथी प्रकाशन क्रॉस रोड में रोमेश थापर की आलोचना पर प्रतिक्रिया के रूप में अनुच्छेद 19 में “उचित पाबंदियों” का प्रावधान डाला।

इसके बावजूद पार्टी की अंतर्निहित उदारता, जिससे अक्सर समझौते तो किए गए लेकिन जिसे कभी पूरी तरह मिटाया नहीं गया, के कारण समूचे मीडिया को चीयरलीडर नहीं बनाया। साठ के दशक में कॉंग्रेस सरकार ने ऑर्गनाइजर तक को विज्ञापन दिए, जैसा कि अटल बिहारी बाजपाई की जीवनी में अभिषेक चौधरी बताते हैं। 

यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हाल में बड़ी संख्या में पत्रकारों ने टीवी चैनल छोड़कर अपने यूट्यूब चैनल शुरू किए हैं। निडर, निष्पक्ष पत्रकारिता ज्यादातर डिजिटल स्पेस में ही हो रही है, भले ही पैसे की कमी के कारण उन्हें चंदों पर निर्भर रहना पड़ रहा हो। उन्हें भी सरकार के तीखे वारों का सामना करना पड़ा है, जिसमें सबसे तीखा वार न्यूजक्लिक पर किया गया, जिसके 80 से ज्यादा कर्मचारियों और लेखकों पर 2023 की एक सुबह छापे मारे गए।

इस अँधियारे समय में, यह चमत्कार ही है कि मंडे ब्लूस छह साल से अधिक जिंदा रहा – यह इस कॉलम के लिए एकदम सही समाधि-लेख है, जो अपनी आखिरी सांस के साथ अलविदा कहता है।  

(मिड-डे से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत।)

Ramswaroop Mantri

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