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*आजादी के 78 वर्ष का भारत :  ‘आजाद भारत पर एक ख्याल’*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’ 

          स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने और राष्ट्रीय गीत गाने का दिन नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष, त्याग और बलिदान की स्मृति है जिसने भारत को राजनीतिक बंधनों से मुक्त कराया। 15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी का उद्देश्य केवल अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति भर नहीं था, बल्कि एक ऐसे भारत का निर्माण भी था जहाँ सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और राजनीतिक अधिकार सभी वर्गों को समान रूप से उपलब्ध हों। इस दृष्टि से आजादी के बाद की यात्रा का मूल्यांकन करना आवश्यक हो जाता है कि क्या यह स्वतंत्रता वास्तव में सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँची है। बीते सात दशकों से अधिक समय में किसानों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, पूंजीपतियों, छोटे व्यापारियों और राजनेताओं का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उत्थान अलग-अलग गति और दिशा में हुआ है। यह असमान प्रगति न केवल भारत के लोकतंत्र की जटिलताओं को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि स्वतंत्रता का सपना अब भी अधूरा है।

          स्वतंत्रता के बाद का भारत एक जटिल सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक यात्रा का साक्षी रहा है, जिसमें विभिन्न वर्गों का उत्थान असमान रूप से घटित हुआ। आजादी के पहले जिन किसानों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और छोटे व्यापारियों के श्रम और संघर्ष ने स्वतंत्रता की नींव रखी, वे आज भी अपेक्षाकृत हाशिये पर हैं, जबकि पूंजीपति और राजनेता वर्ग निरंतर शीर्ष पर पहुँचते गए। किसानों के जीवन में हरित क्रांति, सहकारी आंदोलन और कृषि तकनीक का प्रवेश हुआ, जिससे उत्पादन बढ़ा, किंतु लागत, कर्ज और बाजार की अस्थिरता ने उनकी आर्थिक स्थिति को स्थायी रूप से सुदृढ़ नहीं होने दिया। सामाजिक जागरूकता और आंदोलनों ने उनकी आवाज बुलंद की, परंतु राजनीतिक निर्णय-प्रक्रिया में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी सीमित रही।

आज़ाद भारत के 78 वर्षों की राजनीति:

          15 अगस्त 1947 को भारत ने लगभग दो शताब्दियों की अंग्रेज़ी गुलामी से मुक्ति पाई। आज़ादी के साथ ही एक नये युग की शुरुआत हुई, जिसमें लोकतंत्र, संविधान, सामाजिक-आर्थिक विकास और राष्ट्रीय एकता जैसे आदर्शों को केंद्र में रखकर भारतीय राजनीति ने अपनी यात्रा प्रारंभ की। इन 78 वर्षों में देश ने राजनीतिक दृष्टि से अनेक उतार-चढ़ाव देखे—कभी स्थिर और सशक्त नेतृत्व, तो कभी अस्थिरता और गठबंधन का दौर; कभी विकास की ऊँचाइयाँ, तो कभी गहरे संकट। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव रखी गई। 1950 में संविधान लागू हुआ, जिसने भारत को संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से औद्योगिकीकरण और कृषि विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए गए। अंतरराष्ट्रीय मंच पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन के द्वारा स्वतंत्र नीति अपनाई गई। इस दौर में विभाजन की त्रासदी, शरणार्थी संकट, हैदराबाद और गोवा का विलय, तथा 1962 के चीन युद्ध जैसी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। नेहरू के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में देश का नेतृत्व किया और “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1971 का युद्ध हुआ, जिससे बांग्लादेश का गठन हुआ, साथ ही बैंकों का राष्ट्रीयकरण और हरित क्रांति जैसे कदम उठाए गए। परंतु 1975–77 की आपातकाल अवधि ने लोकतांत्रिक मूल्यों को गहरा आघात पहुँचाया। 1977 में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई, किंतु आंतरिक कलह के कारण यह अधिक समय टिक नहीं सकी। 1980 के दशक में पंजाब में आतंकवाद, असम आंदोलन और ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी घटनाएं हुईं। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने तकनीकी आधुनिकीकरण और दूरसंचार क्रांति को बढ़ावा दिया।

          1989 से 2014 का काल गठबंधन युग के रूप में जाना गया। 1991 में आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को अपनाया गया, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नये मार्ग पर अग्रसर किया। भाजपा का उभार राम मंदिर आंदोलन के साथ हुआ और 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी। इसी काल में पोखरण परमाणु परीक्षण ने भारत की वैश्विक स्थिति को सुदृढ़ किया। 2004 से 2014 तक यूपीए सरकार के दौरान मनरेगा, सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून बने, परंतु इस दौर को 2G और कोयला घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के मामलों से भी आलोचना मिली।

          2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता प्राप्त की। स्वच्छ भारत मिशन, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, जीएसटी, अनुच्छेद 370 का निष्कासन, तीन तलाक कानून और कोविड-19 प्रबंधन जैसे कदम इस दौर की विशेषताएँ रहे। विदेश नीति में सक्रिय कूटनीति और “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य सामने आया। हालांकि विपक्ष ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, बेरोजगारी और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों पर सरकार की आलोचना की। 2019 में भाजपा ने और भी मजबूत बहुमत प्राप्त कर राजनीतिक केंद्रीकरण की प्रवृत्ति को और स्पष्ट कर दिया।

          78 वर्षों की इस यात्रा में भारतीय राजनीति ने स्थिरता, अस्थिरता, संघर्ष और प्रगति—सभी चरण देखे हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसने अनेक संकटों के बावजूद अपनी निरंतरता बनाए रखी है। चुनाव आयोग, न्यायपालिका, मीडिया और सिविल सोसाइटी जैसी संस्थाओं ने लोकतांत्रिक ढाँचे को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है। सामाजिक न्याय और आरक्षण नीतियों ने वंचित वर्गों के राजनीतिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त किया है। फिर भी भ्रष्टाचार, राजनीतिक ध्रुवीकरण, चुनावी खर्च, क्षेत्रीय असमानता, तथा जातीय-धार्मिक तनाव जैसी चुनौतियाँ आज भी विद्यमान हैं। वैश्विक परिदृश्य में बदलते सामरिक और आर्थिक समीकरण भी भारत की राजनीति के लिए नयी कसौटियाँ तैयार कर रहे हैं। इन सबके बीच यह अपेक्षा की जाती है कि भारतीय राजनीति केवल सत्ता-संघर्ष तक सीमित न रहकर सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़े। यही स्वतंत्रता की सच्ची सार्थकता होगी।

          यथोक्त के आलोक में यदि आज के भारतीय समाज के उत्थान-पतन के बात करें तो देखने को मिलता है कि दलित समाज को संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण और अधिकारों ने शिक्षा, नौकरियों और आत्मसम्मान के नए अवसर दिए, किंतु जमीनी स्तर पर भेदभाव और हिंसा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। राजनीतिक रूप से उन्होंने कई राज्यों में सत्ता में हिस्सेदारी हासिल की, किंतु यह लाभ समुदाय के एक हिस्से तक सीमित रहा और आर्थिक रूप से वे बड़े पैमाने पर अभी भी दिहाड़ी और असंगठित श्रम पर निर्भर हैं। पिछड़े वर्ग ने मंडल आयोग के बाद उल्लेखनीय राजनीतिक और सामाजिक पहचान प्राप्त की और कुछ जातियाँ व्यापार व सरकारी नौकरियों में मजबूत हुईं, किंतु इसी वर्ग के भीतर आर्थिक असमानताएँ गहरी हुईं।

          अल्पसंख्यक, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, शिक्षा और औद्योगिक अवसरों में पिछड़ा रहा, जिसकी पुष्टि सच्चर कमेटी रिपोर्ट ने भी की। वे पारंपरिक कारीगरी और छोटे व्यापार में सक्रिय रहे, परंतु औद्योगिक और कॉर्पोरेट क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति सीमित रही। राजनीतिक नेतृत्व अक्सर दूसरे दलों के संरक्षण में रहा, जिससे उनके मुद्दों पर ठोस नीति-निर्माण दुर्लभ रहा।   आदिवासी समाज, जिनकी भूमि और संसाधन खनन, उद्योग और विकास परियोजनाओं में इस्तेमाल हुए, विस्थापन और सांस्कृतिक क्षरण से जूझता रहा। राज्य निर्माण और संवैधानिक अधिकारों के बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसरों में वे पीछे हैं।

          इसके विपरीत पूंजीपति वर्ग ने स्वतंत्रता के बाद से औद्योगिक, व्यापारिक और सेवा क्षेत्रों में लगातार विस्तार किया। उनकी आर्थिक शक्ति के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ा, और नीति-निर्माण में उनका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबदबा बना रहा। छोटे दुकानदार और स्वरोज़गार वाले, जो कभी स्थानीय अर्थव्यवस्था के स्तंभ थे, आज मॉल संस्कृति, ई-कॉमर्स और बड़ी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हैं, जिससे उनकी आय अस्थिर हुई है। राजनीति, जो आदर्शतः जनसेवा का माध्यम होनी चाहिए थी, समय के साथ सत्ता और संपत्ति अर्जन का साधन भी बनी। कई नेता जनहित में कार्यरत रहे, किंतु सत्ता के केंद्रीकरण और भ्रष्टाचार के उदाहरण भी प्रचुर हैं।

          समग्र रूप से देखा जाए तो स्वतंत्रता के बाद का विकास असमान और वर्ग-विशेष केंद्रित रहा। सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के क्षेत्र में लगभग सभी वर्गों ने प्रगति की, किंतु आर्थिक दृष्टि से पूंजीपति और राजनीतिक वर्ग सबसे अधिक लाभान्वित हुए, जबकि किसानों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की प्रगति सीमित रही। अमीरी-गरीबी और अवसरों की खाई, जो आजादी के समय मौजूद थी, कई मामलों में और चौड़ी हुई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक समानता में निहित है, जिसकी प्राप्ति अब भी अधूरी है।

          स्वतंत्रता के बाद का भारत एक ओर लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की मजबूती का उदाहरण है, तो दूसरी ओर असमान विकास और अवसरों की खाई का भी। पूंजीपति और राजनीतिक वर्ग ने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सर्वाधिक लाभ अर्जित किया, जबकि किसानों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और छोटे व्यापारियों के लिए विकास की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी रही। इस असमानता ने न केवल अमीरी-गरीबी की दूरी को बढ़ाया, बल्कि समाज में असंतोष और असुरक्षा की भावना को भी जन्म दिया। वास्तविक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आजादी में नहीं, बल्कि उस सामाजिक और आर्थिक न्याय में निहित है, जिसकी कल्पना स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने की थी। आज, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, हमें यह आत्ममंथन करना चाहिए कि विकास का फल समान रूप से हर हाथ तक कैसे पहुँचे और लोकतंत्र के इस वटवृक्ष की छाया में कोई भी वर्ग उपेक्षित न रह जाए।    अन्य-अन्य लोगों/विशेषज्ञों के आकलन में माना गया है कि नीतियों, तकनीकी प्रगति और सामाजिक जागरूकता के चलते सभी वर्गों में सुधार होगा, लेकिन पूंजीपति और राजनेता अभी भी सबसे ऊपर रहेंगे, जबकि आदिवासीअल्पसंख्यक और छोटे दुकानदार अपेक्षाकृत पीछे रहेंगे, भले ही उनकी स्थिति आज से बेहतर हो जाएगी। 

भविष्य के दस साल का संभावित भारत: विभिन्न वर्गों का सामाजिकराजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य:

          यदि हम अगले दस वर्ष  के भारत की कल्पना करें, तो स्वतंत्रता के लगभग नौ दशकों के बाद देश एक नए सामाजिक-आर्थिक संतुलन की ओर बढ़ता दिख सकता है। हालांकि असमानता पूरी तरह समाप्त होना कठिन है, फिर भी अनेक वर्गों की स्थिति आज की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बेहतर हो सकती है।

Ø किसान वर्ग के संदर्भ में उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में कृषि केवल जीविका का साधन न रहकर एक संगठित और लाभकारी उद्यम बन जाएगी। तकनीकी नवाचार, ड्रोन आधारित सिंचाई, जैविक खेती, फसल बीमा और पारदर्शी बाजार व्यवस्था किसानों को न केवल स्थिर आय देंगे बल्कि उन्हें कृषि-उद्योग से जोड़ेंगे। इससे उनका सामाजिक सम्मान भी बढ़ेगा और राजनीतिक तौर पर उनकी हिस्सेदारी मज़बूत होगी।

Ø अगले दस वर्ष तक दलित समाज  शिक्षा, सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों तथा उद्यमिता में ठोस स्थान बना सकता है। आरक्षण के साथ-साथ उच्च शिक्षा में निवेश, कौशल विकास और सामाजिक जागरूकता आंदोलनों की बदौलत वे सामाजिक भेदभाव को काफी हद तक चुनौती देंगे। राजनीतिक दृष्टि से भी दलित नेतृत्व न केवल क्षेत्रीय बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाएगा, जिससे नीति निर्माण में उनकी आवाज़ अधिक प्रभावी होगी।

Ø पिछड़ा वर्ग, जो पहले से ही मंडल आयोग के बाद राजनीतिक रूप से सशक्त हुआ है, अगले दस वर्ष तक आर्थिक क्षेत्र में भी गहरी पैठ बना सकता है। शिक्षा और उद्यमिता में बढ़त, साथ ही क्षेत्रीय राजनीति पर पकड़, उन्हें सामाजिक और आर्थिक दोनों ही मोर्चों पर मजबूत करेगी। हालांकि आंतरिक आर्थिक असमानताओं को कम करना उनके लिए एक प्रमुख चुनौती होगी।

Ø अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम समाज, अगले दस वर्ष तक यदि शिक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और उद्यमिता में निवेश करता है, तो उनकी आर्थिक स्थिति आज की तुलना में कहीं बेहतर हो सकती है। छोटे व्यापार और पारंपरिक कारीगरी को आधुनिक विपणन व ई-कॉमर्स से जोड़कर वे नए बाजारों तक पहुँच पाएंगे। हालांकि, यह तभी संभव होगा जब सरकार और समाज दोनों उन्हें आर्थिक मुख्यधारा में शामिल करने के लिए ठोस कदम उठाएँ।

Ø आने वाले दस वर्ष में आदिवासी समाज का भविष्य तक काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि वे अपने प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व बनाए रख पाते हैं या नहीं। यदि खनन और औद्योगिक परियोजनाओं में उन्हें साझेदार बनाया गया और शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार सीधा उनके गांवों तक पहुँचा, तो वे न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेंगे बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी सुरक्षित रखेंगे।

Ø पूंजीपति वर्ग पहले से ही आर्थिक विकास के शीर्ष पर है, और अगले दस वर्ष तक यह स्थिति और मज़बूत हो सकती है। वे वैश्विक बाजार में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करेंगे। चुनौती यह होगी कि उनकी प्रगति का लाभ समाज के निचले तबकों तक भी पहुँचे, जिसके लिए सामाजिक उद्यमिता और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) की भूमिका अहम होगी।

Ø छोटे दुकानदार और स्वरोज़गार वाले अगले दस वर्ष  में पारंपरिक बाजार से आगे बढ़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स से जुड़े रहेंगे। सामूहिक ब्रांडिंग, ऑनलाइन पेमेंट और वितरण तंत्र के माध्यम से वे बड़ी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे, हालांकि प्रतिस्पर्धा की तीव्रता उनके लिए एक स्थायी चुनौती बनी रहेगी।

Ø राजनीतिक वर्ग की स्थिति अगले दस वर्ष में और भी प्रभावशाली हो सकती है, बशर्ते लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे। यदि राजनीति में ईमानदारी और जनसेवा का भाव मजबूत हुआ, तो यह वर्ग वंचित समुदायों के उत्थान का वास्तविक वाहक बन सकता है।

          अंततः संभावना है कि अगले दस वर्ष  का भारत एक ऐसा राष्ट्र हो सकता है जहाँ किसानों का सम्मान, दलितों का आत्मविश्वास, पिछड़ों की राजनीतिक ताकत, अल्पसंख्यकों की आर्थिक प्रगति, आदिवासियों का सांस्कृतिक संरक्षण, पूंजीपतियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा, छोटे दुकानदारों की तकनीकी अनुकूलन क्षमता और नेताओं की जवाबदेही मिलकर एक संतुलित समाज का निर्माण करें। हालांकि, इसके लिए आज से ही समावेशी नीतियों, शिक्षा, तकनीकी विकास और सामाजिक न्याय पर निरंतर निवेश आवश्यक होगा।

Ramswaroop Mantri

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