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*आठ साल में बैंकों के पैतीस लाख करोड़ डूबे*

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लाखों कंपनियां बंद, लोन लेकर देश छोड़ने और दिवालिया होने की तथाकथा

सोहिल जैन

देश की बैंकिंग व्यवस्था इन दिनों अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। पिछले आठ वर्षों में बैंकों के करीब 35 लाख करोड़ रुपये डूबंत खातों में जा चुके हैं। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। भारत की आर्थिक संरचना मे बेहद गंभीर विसंगतियां देखने को मिल रही हैं। बैंकिंग क्षेत्र की यह गिरावट महज वित्तीय हानि नहीं, बल्कि शासन, नियमन, कॉर्पोरेट जिम्मेदारी और आर्थिक अनुशासन के कई सवाल खड़े करती है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि इसी अवधि में देशभर में पिछले एक दशक में 2 लाख से अधिक कंपनियां बंद हो चुकी हैं।

इनमें से बड़ी संख्या उन कंपनियों की है। जिन्होंने बैंकों से सैकड़ो और हजारों करोड रुपए का भारी-भरकम लोन लिया। कुछ वर्षों में ही पूरा कारोबार डूब गया। मालिकों ने दिवालिया घोषित होकर ऋण चुकाने से बाहर हो गए। कई हाई-प्रोफाइल मामलों में प्रमोटर देश छोड़ कर भाग गए। कुछ पर मुकदमे शुरू हुए, इंटरपोल नोटिस के बीच विदेश में सुरक्षित बैठे हैं। भारत की बैंकिंग प्रणाली मैं उनसे भुगतान मिलने की आशा ही नहीं है। रिपोर्टें बताती हैं कि छोटी कंपनियों और स्टार्टअप्स पर नोटबंदी और जीएसटी के बाद गहरा प्रभाव पड़ा है।

देश की लाखों कंपनियां बंद हो गई। बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्ट के कारण बैंकों ने जोखिम बढ़ने की आशंका में ऋण वितरण की नीतियाँ कड़ी कर दीं। इसका सीधा असर छोटे उद्योगों, व्यापारियों और उद्यमियों पर पड़ा। जिनकी इकाइयाँ पूंजी के अभाव में लगातार बंद होती जा रही है। सरकार ने इस संकट को संभालने के लिए कई कदम उठाए—पुनर्पूंजीकरण, दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) को सशक्त करना, एनपीए को कम करने के लिए नियमों में बदलाव और बैंकों का विलय करके बैंकों को बचाने जैसा काम किया। इस बदलाव के बावजूद एनपीए का पहाड़ साल दर साल बढ़ता रहा।

सरकार ने नियम बदले बैंकों के मुनाफे से इस डिफॉल्ट कर्ज की राशि को डूबँत खाते में डाल दिया गया। जनता के ऊपर बैंक शुल्क बढ़ा दिए गए। सवाल यह है, जब बैंकों के कर्जों में इतनी भारी डिफॉल्टिंग हो रही थी, तब निगरानी तंत्र ने समय रहते क्यों नहीं पकड़ा? या बड़े कॉर्पोरेट घरानों को विशेष छूटें देकर बड़े पूंजी पतियों को ऋण नहीं चुकाने का बढ़ावा दिया गया? जब करोड़ों का लोन डूबता है। तो उसका भार सीधे जनता पर पड़ता है। सरकारें बैंकों को बचाने के लिए करदाताओं के पैसों से बैंकों के नुकसान की भरपाई करती हैं। सरकार ने बैंकों में दो कानून बनाकर रखे हैं। बड़े-बड़े पूंजीपतियों के लिए अलग और आम नागरिकों, किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए अलग कानून हैं। मामूली चूक पर नोटिस, वसूली और कानूनी कार्रवाई का सामना छोटे व्यापारियों किसानों और आम नागरिकों को करना पड़ता है।

इस असमानता ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर गहरा असंतोष पैदा किया है। 35 लाख करोड़ का यह डूबा हुआ कर्ज सिर्फ घाटे की रिपोर्ट नहीं है। बल्कि अर्थव्यवस्था और बैंकिंग प्रणाली के लिए चेतावनी है। कॉर्पोरेट कर्ज की निगरानी, जोखिम प्रबंधन, लोन सत्यापन और वसूली प्रक्रिया को मजबूत और सख्ती से पालन नहीं किया गया। तो आने वाले वर्षों में यह संकट ओर गहरा हो सकता है। देश को ऐसे सुधारों की तत्काल आवश्यकता है जो बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता सुनिश्चित कर सके।

बड़े डिफॉल्टरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग और दिवाला प्रक्रियाओं को तेज करने की जरूरत है। सबसे बड़ा सवाल यह है,जब देश की मेहनत कश आम नागरिक बैंकिंग व्यवस्था की रीढ़ है। क्या उसके विश्वास को इस तरह से कमजोर किया जा सकता है? बैंकों, सरकार और नियामक संस्थाओं का दायित्व है, अर्थव्यवस्था के वर्तमान संकट से सबक लेते हुए एक ऐसी व्यवस्था तैयार करें।

जिसमें भविष्य में बैंक की व्यवस्था को लेकर आम जनता का विश्वास बढ़े। दिवालिया होने वाले पूंजी पतियों से उनकी और उनके परिवार की निजी संपत्ति से बैंक ऋण की वसूली करे। बैंक के नियम आम और खास के लिए एक समान हों। तभी भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर, सुरक्षित और मजबूत दिशा में आगे बढ़ सकेगी।

Ramswaroop Mantri

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