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*बंगाल में कागजों पर हो रहा है ‘खेला’: 7.5% वोटर ल‍िस्‍ट से गायब, 90 सीटों पर समीकरण बदलना तय*

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पश्चिम बंगाल की सियासत में ‘खेला होबे’ का नारा बहुत मशहूर है, लेकिन 2026 के चुनाव से पहले जो ‘खेला’ हो रहा है, वह मैदान में नहीं बल्कि कागजों पर हो रहा है. चुनाव आयोग के एक आंकड़े ने बंगाल की राजनीति में हड़कंप मचा दिया है. राज्य में 56.37 लाख वोटर ‘अनकलेक्टिबल’ यानी संदिग्ध पाए गए हैं, जिन्हें लिस्ट से हटाया जा रहा है. यह आंकड़ा कुल वोटरों का करीब 7.5% है. राजनीति का सीधा नियम है- 2% का वोट स्विंग सरकार बदल देता है, यहां तो 7.5% वोट ही सिस्टम से बाहर हो रहे हैं. यह सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि बंगाल की 294 सीटों का गणित बदलने वाला सियासी खेल है. लेकिन इसका फायदा क‍िसे मिलेगा?पश्चिम बंगाल में 2026 चुनाव से पहले 56 लाख नाम वोटर लिस्ट से कटना महज सफाई नहीं, बल्कि एक बड़ा सियासी ‘खेला’ है. समझिए, कैसे 7.5% वोटों का गायब होना उन 90 सीटों का पूरा गणित पलट देगा जहां जीत का अंतर बेहद कम है. क्या बिहार की तर्ज पर बंगाल में भी नतीजे वोटिंग से पहले तय हो रहे हैं? जानिए, इस कटौती से ममता बनर्जी या बीजेपी, किसे होगा असली फायदा.

एक सीट से 19,000 वोट ‘माइनस’

  • सबसे पहले इस आंकड़े को समझिए. राज्य में 7.66 करोड़ फॉर्म की जांच हुई, जिसमें से 56 लाख से ज्यादा नाम हटाने लायक मिले. अगर हम इसे बंगाल की कुल 294 विधानसभा सीटों में बराबर बांट दें, तो हर सीट पर औसतन करीब 19 हजार वोट हुए.
  • अब आप खुद सोचिए, जिस विधायक की जीत का अंतर ही 5 या 10 हजार वोटों का था, अगर उसकी सीट से 19 हजार वोट अचानक गायब हो जाएं, तो उसकी जीत की क्या गारंटी बची? यह संख्या इतनी बड़ी है कि किसी भी उम्मीदवार की जमानत जब्त करवा सकती है या हारे हुए को जिता सकती है.

डेंजर जोन में 90 सीटें

  • इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर होगा, जिन्हें ‘मार्जिनल सीट्स’ कहा जाता है. 2021 के नतीजों को देखें तो बंगाल में 80 से 90 सीटें ऐसी हैं, जहां हार-जीत का फैसला 15,000 वोटों से कम के अंतर से हुआ था.
  • मान लीजिए किसी सीट पर तृणमूल या बीजेपी का उम्मीदवार 5,000 वोट से जीता. अब वहां लिस्ट पुनरीक्षण (Revision) में 19,000 नाम कट गए. गणित कहता है कि कटने वाले वोट जीत के अंतर से 4 गुना ज्यादा हैं. अगर इन कटे हुए वोटों में थोड़ा भी झुकाव किसी एक पार्टी की तरफ था, तो उस सीट का रिजल्ट पलटना 100% तय है.

‘मुर्दा’ वोट ठीक, लेकिन 30 लाख ‘लापता’ लोग कौन?

असली पेंच यहां फंसा है. 56 लाख में से 23 लाख तो मृतक हैं (इनका कटना सही है), लेकिन बाकी के 30 लाख से ज्यादा वोटर ऐसे हैं जो ‘शिफ्टेड’ (पता बदल गया) या ‘अनट्रेसेबल’ (मिले ही नहीं) हैं.

बिहार चुनाव में भी यही हुआ था. वहां आरोप लगे थे कि ‘लापता’ बताकर विरोधी पार्टी के कोर वोटरों (खासकर गरीबों और अल्पसंख्यकों) को लिस्ट से बाहर कर दिया गया. बंगाल में भी विपक्ष को यही डर है कि ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर चुन-चुन कर नाम काटे जा रहे हैं.

सबसे बड़ा सवाल ममता को फायदा या बीजेपी की चांदी?
इस 7.5% कटौती का लाभ किसे मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि ‘कटने वाले’ कौन हैं.
पहला: बीजेपी को फायदा कैसे? बीजेपी लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि बंगाल में लाखों फर्जी वोटर, घुसपैठिए और रोहिंग्या वोटर लिस्ट में शामिल हैं, जो ममता बनर्जी का कोर वोट बैंक हैं. अगर चुनाव आयोग की सख्ती से ये बोगस या घुसपैठिए वोटर बाहर हो रहे हैं, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा और तृणमूल को उन सीटों पर भारी नुकसान होगा जहां वह एकतरफा जीतती थी.


दूसरा: ममता बनर्जी (TMC) को फायदा कैसे? दूसरा पहलू यह है कि बंगाल में बड़ी संख्या में लोग काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं या अपना पता बदलते हैं. अगर BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) ने स्थानीय प्रशासन के प्रभाव में आकर बीजेपी समर्थक वोटरों या एंटी-इंकंबेंसी (सरकार विरोधी) वाले वोटरों को ‘अनट्रेसेबल’ बताकर लिस्ट से बाहर कर दिया, तो इसका सीधा फायदा ममता बनर्जी को मिलेगा. बिहार में भी आरोप लगा था कि सत्ता पक्ष ने विरोधी वोटों को ‘डिलीट’ करवाया.
वोटिंग बाद में, फैसला अभी!
कुल मिलाकर बात यह है कि बंगाल चुनाव 2026 की जंग पोलिंग बूथ से पहले वोटर लिस्ट पर लड़ी जा रही है. जिस सीट पर 25 हजार वोट कट जाएंगे, वहां रैलियों में भीड़ जुटाने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा.
अगर यह 30 लाख ‘लापता’ वोटर वाकई में असली नागरिक हैं और उन्हें सिस्टम से बाहर किया जा रहा है, तो समझिए कि बंगाल की 90 सीटों पर जनादेश (Mandate) को तकनीकी रूप से ‘हैक’ किया जा रहा है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह 7.5% की कैंची ममता के वोट बैंक पर चली है या बीजेपी के समर्थकों पर

Ramswaroop Mantri

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