संसद में एक तरफ वंदे मातरम को लेकर बहस चल रही है और मौलाना मदनी ने फिर मोटे तौर पर वही दोहरा दिया कि मुसलमान देश से प्रेम करते हैं, लेकिन देश की पूजा नहीं कर सकते क्योंकि ये उनके धर्म के ख़िलाफ़ हो जाता है, क्योंकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की पूजा नहीं की जा सकती वगैरह-वगैरह. उधर, प्रधानमंत्री ने संसद में जिन स्वतंत्रता सेनानियों को ये कहते हुए याद किया जो वंदे मातरम् कहते हुए फांसी पर झूल गए थे, उनमें अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां का भी उन्होंने नाम लिया.अमेरिका यानी USA के बारे में तो बच्चा-बच्चा जानता है, लेकिन क्या आपने कभी ‘USI’ यानी ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ के बारे में सुना है? जी हां, यह वो सपना था जो भगत सिंह से भी पहले राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां ने देखा था.बिस्मिल और अशफाक सपने देखते थे एक ऐसे भारत के, जहां सब बराबर हों, कोई शोषण न हो, संघीय ढांचा हो. “यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया” मतलब एक मजबूत संघ, जहां राज्य अपनी आज़ादी रखें लेकिन देश एक हो. प्रधानमंत्री ने उनका नाम लिया वंदे मातरम् की बात करते हुए तो आप भी तो जान लो, कि इस देश का इतिहास सिर्फ़ हिंदू-मुस्लिम नहीं है, आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ कांग्रेस-मुस्लिम लीग-RSS-आज़ाद हिंद फ़ौज की कहानी नहीं है. जिनका कोई नामलेवा नहीं बचा उनके उत्तराधिकारी हम सब हैं. हम भारत के लोग. वंदे मातरम्. सौ बात की एक बात.
अब अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां वंदे मातरम् गाते हुए शहीद हुए या अगर ऐसा था तो वो क्या कम मुसलमान हो गए, ये बहस तो लोग करते ही रहेंगे. लेकिन ज़्यादातर पब्लिक तो आज शायद ये जानती भी नहीं कि अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां थे कौन? प्रधानमंत्री ने जो नाम लिए वंदे मातरम् के 150 साल पर संसद में बोलते हुए, उनमें वो चार नाम- राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी- कौन थे, किस पार्टी के थे?
शायद काकोरी केस के बारे में कुछ लोग आज ज़रूर जानते हैं, लेकिन क्या किसी को ये बताया जाता है कि ये लोग एक ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया’ बनाने निकले थे? अमेरिका का तो सबको पता है कि वो USA है-यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका. लेकिन अपने देश का ही हमें बताया नहीं जाता कि यहां भी एक पार्टी बनी थी जो ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया’ बनाने की राह पर चली थी. आज़ादी की लड़ाई की बात करो तो पब्लिक को ये तो पता है कि एक कांग्रेस थी, एक RSS था, एक मुस्लिम लीग थी, एक हिंदू महासभा थी- ये भी शायद कई लोग जानते हैं और कम्युनिस्ट पार्टी भी बन गई थी. और कई लोग ये भी जानते हैं कि सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई थी. लेकिन बाक़ी दलों और पार्टियों को भुला दिया गया है. ये जो नाम लिए प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम् की बात करते हुए-रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी- ये ना कांग्रेस में थे, ना RSS में थे, ना हिंदू महासभा में थे और ना ही कम्युनिस्ट पार्टी में थे.
न कांग्रेस, न संघ: वो HRA के सिपाही थे
इन्होंने पार्टी बनाई थी HRA यानी ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नहीं, वो तो HSRA थी जो बाद में चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह ने बनाई थी. और भगत सिंह का बलिदान इतना मशहूर हो गया था कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के बारे में भी कुछ लोग जानते हैं, लेकिन जो ओरिजिनल पार्टी थी उस विचारधारा की यानी HRA, उसको भुला दिया गया है.
तो ये असल में एक क्रांतिकारी संगठन था, जो 1924 में बना. उस समय भारत अंग्रेज़ों का ग़ुलाम था. महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू किया, जिसमें लाखों लोग शामिल हुए कि अग्रेज़ सरकार के साथ सहयोग नहीं करेंगे. हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन सहयोग नहीं करेंगे और अग्रेज़ों पर दबाव डालेंगे. लेकिन 1922 में क्या हुआ कि आपको पता होगा एक जगह थी चौरी-चौरा, वहां हिंसा हो गई. हिंसा हो गई तो गांधीजी ने आंदोलन को रोक दिया. वो अहिंसा पर अड़े हुए थे. लेकिन कई युवा इससे काफ़ी निराश हुए. उन्हें लगता था कि अहिंसा से काम नहीं चलेगा, हथियार उठाने पड़ेंगे. तो, राम प्रसाद बिस्मिल, सचिंद्रनाथ सान्याल, जोगेश चंद्र चटर्जी जैसे लोग मिले और कानपुर में HRA बनाया.
रूसी क्रांति और अमेरिकी लोकतंत्र का अनूठा संगम
इसका मकसद था अंग्रेज़ों को हथियारों के दम पर भारत से भगाना और भारत को आज़ाद कराना. और इसके सदस्य ज़्यादातर युवा और पढ़े-लिखे लोग थे. सचिंद्रनाथ सान्याल ने इसका मेनिफेस्टो लिखा, जिसका नाम था ‘द रेवोल्यूशनरी’. ये 1 जनवरी 1925 को उत्तर भारत में बांटा गया. इसमें लिखा था कि भारत को विदेशी शासन से मुक्त करने के लिए संगठित सशस्त्र विद्रोह ज़रूरी है.
माहौल सोचिए दुनिया का कैसा रहा होगा उस वक़्त. कुछ टाइम पहले ही रूस में क्रांति हो गई थी और राजशाही को हटाकर जनता का कम्युनिस्ट शासन आ गया था. उधर अमेरिका में लोकतंत्र चल रहा था. तो इन लोगों ने दोनों से प्रेरित होकर नया भारत बनाने की कल्पना की थी. कि रूसी क्रांति की तरह अंग्रेज़ों को खदेड़ेंगे और फिर यहां अमेरिका की तरह सारे राज्यों को जोड़ कर एक संघीय ढांचा बनाएंगे.
इन्होंने उसको नाम दिया था ‘फ़ेडरल रिपब्लिक ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया’. क्योंकि उन्होंने ये देखा था कि देश में विविधताएं बहुत हैं. धर्म अलग-अलग हैं, भाषाएं अलग-अलग हैं, कहीं राजवाड़े हैं, कहीं नवाब हैं, कहीं क़बीले हैं, कहीं ब्रिटिश राज की सीधे हुकूमत है, तो अंग्रेजों को खदेड़ने के बाद सबको अपनी आज़ादी भी देंगे और सब एक साथ भी होंगे. USA की तरह USI-यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया.
काकोरी कांड और फांसी का फंदा
- साथ ही ये रूसी क्रांति की तरह किसानों और मज़दूरों को साथ लेकर क्रांति के रास्ते से अंग्रेज़ों तो बाहर निकालना चाहते थे. इन्होंने एक सेंट्रल काउंसिल बनाई थी, जो फ़ैसले लेती थी.
- फिर प्रांतीय कमेटियां थीं, जैसे आगरा, इलाहाबाद, बनारस और लखनऊ में. अलग-अलग विभाग भी बनाए गए. एक विभाग प्रचार के लिए, एक नए सदस्य भर्ती करने के लिए, एक पैसा जुटाने के लिए, एक हथियार लाने के लिए, और एक विदेशों से संपर्क करने के लिए.
- ये पार्टी दो तरह से काम कर रही थी- एक दुनिया के सामने रहकर और दूसरा अंडरग्राउंड रह कर. पब्लिक के सामने ये ऐसे काम करते थे जैसे मज़दूर यूनियन बनाना और गुप्त तरीक़े से काम होते थे हथियार चोरी करने के वगैरह.
- इन्होंने पैसा जुटाने के लिए लूट की. 1923 में द्वारिकापुर और बिचपुरी में लूट की घटनाएं कीं. लेकिन सबसे बड़ी वारदात थी काकोरी ट्रेन डकैती. 9 अगस्त 1925 को, इन्होंने लखनऊ के पास ट्रेन रोकी, सरकारी ख़ज़ाना लूटा.
- अंग्रेज़ों ने छापे मारे, कई पकड़े गए. काकोरी षड्यंत्र केस चला, और इन चार को फांसी हुई- बिस्मिल, अश़फ़ाक़, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी. 1927 में फांसी हुई. इससे HRA का संगठन ही एक तरह से ख़त्म हो गया.
HRA से HSRA तक: समाजवाद का उदय
लेकिन HRA का विचार ख़त्म नहीं हुआ. 1928 में चंद्रशेखर आज़ाद ने इसे नया नाम दे दिया ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’, यानी HSRA. यानी इसमें ‘सोशलिस्ट’ या ‘समाजवादी’ नाम में जोड़ दिया गया क्योंकि लेफ़्ट की विचारधारा तब दुनिया में फैलने लगी थी. और भगत सिंह भी इसी HSRA के साथ जुड़े.
दिल्ली के फिरोज़शाह कोटला में मीटिंग हुई. ‘सोशलिस्ट’ जोड़ा नाम में क्योंकि उनकी कल्पना समाजवादी के ज़रिये ग़रीबों के लिए असली आज़ादी लाने की थी. औऱ भगत सिंह औऱ आज़ाद के क़िस्से तो बहुत लोग जानते हैं कि साइमन कमीशन का विरोध किया, लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया, सॉंडर्स को मारा, असेंबली में बम फेंका. फिर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हुई. आज़ाद पुलिस मुठभेड़ में शहीद हुए.
संविधान से 25 साल पहले लिखा गया भविष्य
- लेकिन जहां से ये विचारधारा शुरू हुई थी उसको वंदे मातरम् के बहाने ही सही, आप जान तो लो. वो भी तो हमारा ही इतिहास है. कि एक HRA पार्टी भी थी. वो अगर सफल हुई होती तो एक ‘फ़ेडरल रिपव्लिक ऑफ़ युनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया’ बनाती. हिंदू-मुसलमान की बात ही नहीं थी उस पार्टी में. भारत-पाकिस्तान का झगड़ा नहीं था.
- रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह की दोस्ती ही सब के लिए मिसाल थी. भारत को एक संघीय गणराज्य बनाना चाहते थे, जहां अलग-अलग राज्य हों, उनके अपने अधिकार हों, बस एक केंद्र सरकार से जुड़े हुए हों. सबको वोट के समान अधिकार की बात उन्होंने अपने लिखी थी. क्योंकि वो चाहते थे कि आज़ाद भारत में इंसान का इंसान द्वारा शोषण खत्म हो. ये सब उन्होंने तभी प्लैन कर लिया था.
- हमारा संविधान उसके 25 साल बाद बना है. ये उससे 25 साल पहले उन्होंने मेनिफ़ेस्टो बना लिया था. रेलवे, परिवहन, संचार, खदानें, बड़े उद्योग जैसे स्टील और जहाज़ बनाने वाले उद्योग वो चाहते थे कि राष्ट्र की संपत्ति हों, जैसे रूस में हुआ था क्रांति के बाद. वो गांधीजी की आलोचना करते थे. कहते थे कि शांतिपूर्ण तरीकों से आज़ादी नहीं मिलेगी, क्योंकि अंग्रेज़ तलवार से राज करते हैं.
हम भारत के लोग, उनके वारिस हैं
HRA के लोग सपने देखते थे एक ऐसे भारत के, जहां सब बराबर हों, कोई शोषण न हो, संघीय ढांचा हो. “यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया” मतलब एक मजबूत संघ, जहां राज्य अपनी आज़ादी रखें लेकिन देश एक हो. प्रधानमंत्री ने उनका नाम लिया वंदे मातरम् की बात करते हुए तो आप भी तो जान लो, कि इस देश का इतिहास सिर्फ़ हिंदू-मुस्लिम नहीं है, आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ कांग्रेस-मुस्लिम लीग-RSS-आज़ाद हिंद फ़ौज की कहानी नहीं है. जिनका कोई नामलेवा नहीं बचा उनके उत्तराधिकारी हम सब हैं. हम भारत के लोग. वंदे मातरम्. सौ बात की एक बात.





