बिहार जीत के बाद बीजेपी हर हाल में बंगाल को फतह करने की तैयारी में है और उसी तैयारी का एक हिस्सा था वन्दे मातरम पर बहस। देश को आजाद कराने में महती भूमिका निभाने वाले गाँधी के खिलाफ नरेटिव चलाने से जब बीजेपी बाज नहीं आती तो भला राष्ट्रीय गीत लिखने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के खिलाफ कब विचार बदल जाए यह कौन जाने! आज गांधी से ज्यादा सावरकर और गोडसे की चर्चा होती है। बीजेपी के बहुतेरे नेता गाँधी जी के बारे में भला बुरा कहते नहीं थकते। और अंध भक्तों की तो बात ही कुछ अलग है। जिस गाँधी ने आजादी के बाद स्वदेशी का नारा दिया था और स्वदेशी के जरिये स्वावलम्बन की बात कही थी, वहीं बीजेपी नरसिम्हा राव की सरकार से लेकर मनमोहन सिंह की सरकार तक स्वदेशी की बात करती थी, लेकिन जैसे ही मोदी जी सत्तासीन हुए स्वदेशी की बात ख़त्म हो गई।
अखिलेश अखिल
संसद में तीन दिन तक वंदे मातरम पर बहस हुई। बहस इसलिए क्योंकि इसके जरिये बंगाल चुनाव को साधना था। बंगाली भावनाओं को उजागर करना था और सबसे बड़ी बात बंगाली हिन्दुओं को जगाना था। वंदे मातरम पर चर्चा होती तो कोई बड़ी बात सामने आती, वन्दे मातरम के लोगों के लिए कोई बड़ी नीति बनती और लगे हाथ वन्दे मातरम की राह को अपनाकर देश को आगे बढ़ाने की बात होती। लेकिन ऐसा तो कुछ हुआ नहीं।
इसलिए संसद में वन्दे मातरम पर बहस केवल एक राजनीतिक एजेंडा से ज्यादा कुछ भी नहीं था। एजेंडा था कांग्रेस को नीचे दिखाना, ममता बनर्जी के मुस्लिम वोट बैंक को हैमर करना और बीजेपी के खेल को आगे बढ़ाना। याद कीजिए पिछले बंगाल चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी रविंद्र नाथ टैगोर को खूब याद कर रहे थे।
उनकी कथाएं पढ़ते नजर आ रहे थे और सबसे बड़ी बात कई टैगोर की तरह ही दाढ़ी और मूछें भी बढ़ा ली थी। इसका लाभ बीजेपी को मिला भी लेकिन बंगाल के भद्र लोग मोदी के खेल को समझ रहे थे, सत्ता तक पहुँचने नहीं दिया। ममता के ऊपर ही बंगाली समाज ने अपना प्यार-दुलार और सम्मान जताया। लेकिन अब फिर बंगाल में अगले ही साल चुनाव है। बिहार जीत के बाद बीजेपी हर हाल में बंगाल को फतह करने की तैयारी में है और उसी तैयारी का एक हिस्सा था वन्दे मातरम पर बहस।
देश को आजाद कराने में महती भूमिका निभाने वाले गाँधी के खिलाफ नरेटिव चलाने से जब बीजेपी बाज नहीं आती तो भला राष्ट्रीय गीत लिखने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के खिलाफ कब विचार बदल जाए यह कौन जाने! आज गांधी से ज्यादा सावरकर और गोडसे की चर्चा होती है। बीजेपी के बहुतेरे नेता गाँधी जी के बारे में भला बुरा कहते नहीं थकते। और अंध भक्तों की तो बात ही कुछ अलग है। जिस गाँधी ने आजादी के बाद स्वदेशी का नारा दिया था और स्वदेशी के जरिये स्वावलम्बन की बात कही थी, वहीं बीजेपी नरसिम्हा राव की सरकार से लेकर मनमोहन सिंह की सरकार तक स्वदेशी की बात करती थी, लेकिन जैसे ही मोदी जी सत्तासीन हुए स्वदेशी की बात ख़त्म हो गई।
स्वदेशी की जगह पूंजीवाद का ऐसा दौर लाया गया जो अब तक इस देश में कभी नहीं देखा गया। और पूंजीवाद भी ऐसा जिसमें कुछ चुने लोगों के हाथ में देश का सब कुछ दे दिया जाए। अडानी और अंबानी का नाम लेकर तो सिर्फ मोदी और शाह को यह बताने की कोशिश की जाती है कि ये सभी गुजरात से आते हैं। लेकिन सच यही है कि मौजूदा सरकार ने देश के कुछ पूंजीपतियों को खूब फलने -फूलने दिया है। इस खेल के पीछे सिर्फ उन पूंजीपतियों को ही सिर्फ लाभ दिलाना नहीं है, खेल यह भी है कि इनके जरिये बीजेपी जैसी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के कोष को भी भरना है ताकि सत्ता चली भी जाए तो भी भरे कोष के जरिये भविष्य में सत्ता परिवर्तन का खेल किया जा सके।
उदाहरण के तौर पर अभी हाल में कांग्रेस ने खुलासा करते हुए कहा कि चुनावी बांड की समाप्ति के बाद भी बीजेपी के कोष में अभी भी दस हजार करोड़ से ज्यादा की राशि है। आप कल्पना कर सकते हैं कि बीजेपी के पास इतने पैसे आ कहाँ से रहे हैं? और जो लोग बीजेपी को दान देते जा रहे हैं वे कौन हैं और आखिर क्यों दान कर रहे हैं?
अभी हाल में ही छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीजेपी के आधे से ज़्यादा फंड चार नॉर्थ-ईस्ट राज्यों से आए, जो सरकारी कॉन्ट्रैक्ट जीतने वालों से मिले हैं। याद रहे देश का नॉर्थ ईस्ट इलाका काफी छोटा है और पिछड़ा भी। लेकिन अब यह इलाका बीजेपी के लिए धन पशु बन गया है। जिस तरह से पूर्वोत्तर के राज्यों असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में कॉन्ट्रैक्टर-आधारित इकॉनमी बीजेपी के कोष को भर रही है, अभी से पहले कभी नहीं देखा गया था।
बानगी के तौर पर कहा जा सकता है कि 4 जून, 2023 को भागलपुर के सुल्तानगंज में बन रहा पुल अचानक भरभरा कर गिर पड़ा था। पुल गिरने के वीडियो मौके पर मौजूद स्थानीय लोगों ने बनाए थे।घटनास्थल से लगभग 700 किलोमीटर दूर, गिरे हुए पुल ने असम की राजधानी गुवाहाटी में राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी।
इसका असर यह हुआ कि असम राज्य सरकार ने 8.4 किलोमीटर लंबे निर्माणाधीन पुल की जांच शुरू की, जिसे शहर के बीचों-बीच स्थित व्यस्त पान बाज़ार को ब्रह्मपुत्र नदी के पार शहर के उत्तरी छोर से जोड़ना था। बिहार में गिरे हुए पुल और असम में बनने वाले पुल के बीच की कड़ी उसे बनाने वाली कंपनी, एसपीएस कंस्ट्रक्शन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड थी। असम सरकार ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, गुवाहाटी की एक टीम से असम में चल रहे निर्माण की समीक्षा करने के लिए कहा, जबकि बिहार सरकार ने कंपनी को नोटिस जारी किया था।
दो साल से ज़्यादा समय बाद भी, उस समीक्षा के नतीजे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पाया कि कंपनी ने उसी फाइनेंशियल ईयर में भारतीय जनता पार्टी को 5 करोड़ रुपये का डोनेशन दिया था।
एसपीएस कंस्ट्रक्शन अकेली ऐसी कंपनी नहीं है जिसने भारत के नॉर्थ-ईस्ट के अलग-अलग राज्यों में BJP सरकारों से सरकारी कॉन्ट्रैक्ट जीते और पार्टी को डोनेट किया। हमें ऐसी कई कंपनियाँ मिलीं। दो फाइनेंशियल ईयर वित्तीय वर्ष 2022-24 में, BJP ने असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा में डोनर्स से चेक और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर के ज़रिए 77.63 करोड़ रुपये इकट्ठा किए। इसमें से कम से कम 54.89% उन कंपनियों और व्यक्तियों से आया था जिन्हें चार में से किसी एक राज्य सरकार या केंद्र सरकार की एजेंसियों से टेंडर मिले थे और रेगुलेटरी क्लीयरेंस मिला था।
असम में, वित्तीय वर्ष 2023-24 में बीजेपी के लिए ऐसे फंड का 52.34% उन कंपनियों और व्यक्तियों से आया था जिन्हें सरकारी कॉन्ट्रैक्ट या रेगुलेटरी क्लीयरेंस मिला था। पिछले साल, ऐसे पॉलिटिकल डोनेशन का 64.48% सरकारी कॉन्ट्रैक्टरों ने किया था।वित्तीय वर्ष 2023-24 में अरुणाचल प्रदेश से बीजेपी द्वारा इकट्ठा किए गए 20,000 रुपये से ज़्यादा के आधे से ज़्यादा डोनेशन भी उन लोगों से आए थे जिन्होंने राज्य और केंद्र सरकार के कॉन्ट्रैक्ट जीते थे। उसी साल, त्रिपुरा से बीजेपी द्वारा इकट्ठा किए गए इस पैसे का 61.7% से ज़्यादा सरकारी कॉन्ट्रैक्टरों से आया था। पिछले साल, यह संख्या 84.12% थी।
मणिपुर में, वित्तीय वर्ष 2022-23 में, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पाया कि लगभग 5% योगदान उन कंपनियों से था जिन्हें सरकारी कॉन्ट्रैक्ट मिले थे। मई 2023 तक, राज्य में एक सशस्त्र संघर्ष शुरू हो गया था। नतीजतन, वित्तीय वर्ष 2023-24 में बीजेपी का औपचारिक बड़ा कलेक्शन गिरकर 29.8 लाख रुपये हो गया। हमें उस साल सरकारी कॉन्ट्रैक्टरों से जुड़ा कोई डोनेशन नहीं मिला।
कह सकते हैं कि जिस वन्दे मातरम पर बहस संसद में हुई है क्या यही सब उस वन्दे मातरम में दर्ज है? क्या यही सब बापू और पटेल से लेकर नेहरू तक का सपना था? हरगिज नहीं। सपना तो यही था कि देश के सबसे निचले पायदान पर जो लोग खड़े हैं उनके आंसू पोछे जाएं और उन्हें ताकतवर बनाया जाए। उनके कल्याण के लिए वह सब कुछ किया जाए जो अभी तक संभव नहीं हो पाया।
बीजेपी, सरकार और भक्तजन यह कह सकते हैं कि अभी सरकार वह सब कर रही है जो कभी देखने को नहीं मिला। सबको पांच किलो अनाज बांटे जा रहे हैं। इसके साथ ही कुछ नकदी बांटकर लोगों को अपने खेमे में लाने की कोशिश की जा रही है। इस खेल में किसका कल्याण कितना हो रहा है यह पता नहीं लेकिन बीजेपी का वोट बैंक तो बन ही रहा है। बिहार चुनाव में दस हजार की नकदी का कमाल सबने देखा है। बीजेपी को यही चाहिए भी। राष्ट्रवाद का तड़का और सनातनी खेल के जरिए गरीब हिन्दुओं को अपने खेमे में लाने का यह सबसे उत्तम समय है और इसी समय को मोदी काल के रूप में प्रचारित भी किया जा रहा है।
अभी हाल में ही विश्व असमानता रिपोर्ट आई है। असमानता के ताज़ा भारत आंकड़े फिर जाहिर हुए। भारत के एक प्रतिशत (सिर्फ एक प्रतिशत) करोड़पतियों–अरबपतियों–खरबपतियों का देश की 40 प्रतिशत धन-संपदा पर कब्ज़ा है। जाहिर है भारत अब दुनिया के सर्वाधिक असमान देशों में है। टॉप की दस प्रतिशत आबादी को 58 प्रतिशत राष्ट्रीय आय मिलती है, वहीं गांधी के अंतिम व्यक्ति वाली 70 प्रतिशत आबादी के हिस्से केवल 15 प्रतिशत आय आती है। इस असमानता को और वर्गीकृत करें तो टॉप की दस प्रतिशत आबादी के घर-परिवारों के पास भारत राष्ट्र की 65 प्रतिशत धन-संपदा है।
यह स्थिति ‘वंदे मातरम्’ की माटी के अंतिम व्यक्ति, यानी नब्बे प्रतिशत आबादी की भीड़ की ज़िंदगियों का दो-टूक आईना है। इसी में वे लाभार्थी हैं, जिनके घरों में सरकारें दो, चार, पांच, दस हज़ार रुपए की खैरात और राशन से रामराज्य आया समझती है।
क्या बंकिम, टैगोर, अरविंद, गांधी, नेहरू ने ऐसे ही भारत की कल्पना करते हुए ‘वंदे मातरम्’ गाया था? ध्यान रहे, स्वतंत्रता से पहले गांधी भले सेठ घनश्याम दास बिड़ला के यहां ठहरते रहे हों, उन्होंने स्वदेशी सेठ का चंदा–आतिथ्य भी लिया, मगर उनके रामराज्य आइडिया में या नेहरू के समाजवाद आइडिया में कॉरपोरेट कैपिटलाइज़ेशन से भारत की अमीरी या ‘विकसित भारत’ होने की ख़ामख़याली रत्ती भर नहीं थी, जैसी की अब मोदी सरकार में है। नेहरू ने टाटा, बिड़ला को चलने दिया। उनके कारोबारों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया, मगर उन पर नियंत्रण भी रखा। उनके विकल्प में सरकारी प्रतिष्ठान व कारखाने बनाए।
जबकि 2014 से क्या हो रहा है? एक तरफ भारत को पराश्रित बाज़ार बनाया गया, वहीं सरकार ने अडानी–अंबानी, यानी एक प्रतिशत लोगों को व्यापार, ठेके-धंधे देने और दिलाने में प्रो-एक्टिव होकर क्रोनी पूंजीवाद गहरा पैठाया। नेहरू की यह नीति नहीं थी कि राशन बांटकर गरीबों को चुप कराओ और बिड़ला-टाटा को राष्ट्र की संपदा सौंपते जाओ, या विदेश यात्राओं में बिड़लाओं के सौदे करवाओ, माइंस, पोर्ट, तेल के करार करवाओ।
इसी सन्दर्भ में मौजूदा भारत कुछ और तस्वीर को भी सामने रखने की जरूरत है। 2025 के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को 180 देशों में 151वीं रैंक मिली है और उसे ‘बहुत गंभीर’ श्रेणी में रखा गया है। नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश भी हमसे ऊपर हैं। यह रैंकिंग मीडिया का मालिकाना हक कुछ हाथों में सिमट जाने, पत्रकारों को डराने-धमकाने के लिए देशद्रोह और मानहानि कानूनों के इस्तेमाल को दिखाती है।
भारत के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने सवाल उठाया, ‘क्या भारत एक थर्ड वर्ल्ड देश है?’ और बिना कोई वजह बताए इसका जवाब दिया- ‘बिल्कुल नहीं’। टाइम्स ने कहा कि ‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द शीत युद्ध के दौरान चलन में आया था, लेकिन अब इसका इस्तेमाल आमतौर पर ‘गरीब और कम विकसित देशों’ को संबोधित करने के लिए होता है और जाहिर है कि भारत वैसा तो नहीं रहा।’ लेकिन लेख में नहीं बताया गया कि कैसे। लेख में भारत के लिए अलग-अलग वर्गीकरण की बात की गईः विश्व बैंक के हिसाब से ‘निम्न आय’, संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक, ‘मध्यम’ और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के नजरिये से ‘उभरता हुआ और विकासशील’।
सोशल मीडिया पर भी बीजेपी सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़े गए कि उसने 2025 में भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया है, भारत ने 4.2 खरब डॉलर जीडीपी के साथ जापान को पीछे छोड़ दिया है और जीडीपी वृद्धि में अचानक बढ़ोतरी हुई है। एनएसओ (नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस) ने जुलाई-सितंबर में छह तिमाहियों की सबसे ज्यादा 8.2 फीसद की वृद्धि बताई, जो अप्रैल-जून में 7.8 फीसद थी। बीजेपी समर्थकों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बार-बार किए गए इस दावे पर खुशी जताई कि भारत की अर्थव्यवस्था तीन साल में 5 खरब डॉलर और 2030 तक 7 खरब डॉलर तक पहुंच जाएगी।
जीडीपी वृद्धि दर को लेकर मोदी सरकार के जुनून को शायद अनुमानित वृद्धि दर को किसी भी तरीके से, चाहे गणना के तरीके बदलना हो, डेटा में हेराफेरी हो या फिर ऐसे ही कोई और तिकड़म, ज्यादा दिखाने का जुनून कहना बेहतर होगा।
वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही के लिए 8.2 फीसद जीडीपी वृद्धि का जो आंकड़ा सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने जारी किया, उसके कुछ ही दिन पहले, आईएमएफ ने 2025 की अपनी सालाना रिपोर्ट में भारत के लिए ‘सी’ ग्रेड बनाए रखा, जिससे पता चलता है कि मुद्रा कोष को दिए गए जीडीपी आंकड़े में ‘कुछ कमियां थीं जिससे उनकी पुष्टि नहीं हो सकी।’
जीडीपी वृद्धि पर सरकार की बातों को सही नहीं मानने वाले अर्थशास्त्रियों ने यह भी कहा है कि सही तस्वीर के लिए हमें प्रति व्यक्ति जीडीपी को देखना होगा, जो आय वितरण और जीवन स्तर में अंतर को दिखाता है। भारत, जिसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,820 डॉलर होने का अनुमान है, अभी मुद्रा कोष के अनुसार 136वें नंबर पर है, जो घाना, मंगोलिया, अंगोला, भूटान, ईरान, जिबूती, इंडोनेशिया, नामीबिया और यूक्रेन जैसे देशों से भी पीछे है। भारत में शीर्ष 1 फीसद लोगों के पास देश की लगभग 40 फीसद संपत्ति है और सबसे निचले 50 फीसद लोगों के पास सिर्फ 6.4 फीसद।
‘थर्ड वर्ल्ड’ देशों की 2025 की आबादी समीक्षा में 0.685 एचडीआई (ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स) वाले भारत को ‘विकासशील अर्थव्यवस्था’ और ‘निम्न आय देश’ के तौर पर वर्गीकृत किया गया है, जहां गरीबी रेखा का स्तर 4.2 डॉलर प्रति दिन है। एचडीआई के हिसाब से, भारत 193 देशों में 130वें नंबर पर है- ईरान, इराक, श्रीलंका, अल्बानिया और क्यूबा के भी नीचे। 2024 के यूएएनडीपी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के मुताबिक, भारत में बहुआयामी गरीबी में रहने वाले सबसे ज्यादा लोग हैं- 23.4 करोड़ या दुनिया के 1.1 अरब गरीबों का करीब एक चौथाई।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में भारत की हालत ‘गंभीर’ बताई गई है। 123 देशों में उसका नंबर 102 और वह पाकिस्तान (94), बांग्लादेश (88) और श्रीलंका (66) से भी नीचे है। लगभग 80.6 करोड़ लोग जो भारत की 1.46 अरब की आबादी का 55 फीसद है- अभी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत अत्यधिक सब्सिडी वाले अनाज के हकदार हैं।
ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में 11.7 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं, जिससे यह सवाल उठता है: जब देश की 19.1 फीसद वयस्क आबादी अनपढ़ है, तो भारत वैश्विक टेक्नोलॉजी हब बनने का अपना मकसद कैसे पूरा कर पाएगा?





