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 *देश के 32 बड़े शहरों में हर पांचवां मॉल बंद होने की कगार पर,क्यों ‘घोस्ट मॉल’ में तब्दील हो रही हैं 20 फीसदी इमारतें*

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कभी सप्ताहांत होते ही परिवार के साथ चमचमाते मॉल में शॉपिंग और डिनर का प्लान बनाना आम बात हुआ करती थी, लेकिन आज देश के रिटेल सेक्टर की तस्वीर तेजी से बदल रही है. जिस मॉल कल्चर ने कभी भारतीय बाजारों की रौनक बढ़ा दी थी, आज वही मॉल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. नाइट फ्रैंक की एक ताजा रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि देश का हर पांचवां मॉल या तो बंद हो चुका है या फिर बंद होने की कगार पर खड़ा है. वीरान पड़े गलियारे और खाली दुकानें अब इन शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की नई पहचान बनती जा रही हैं.

सन्नाटे में डूबा दिल्ली का सबसे चर्चित अंसल प्लाजा
इस बदलती तस्वीर को समझने के लिए दिल्ली के ‘अंसल प्लाजा’ से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई हो. एक दौर था जब इसे दिल्ली-एनसीआर का पहला और सबसे भव्य शॉपिंग कॉम्प्लेक्स माना जाता था. यहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती थी और माहौल हमेशा गुलजार रहता था. अनगिनत लोगों की यादें इस जगह से जुड़ी हैं. मगर आज यहां का नजारा देखकर मन मायूस हो जाता है. गिने-चुने खाने-पीने के आउटलेट्स को छोड़ दें, तो यहां सन्नाटा पसरा हुआ है. बिजनेस एक्टिविटी न के बराबर रह गई है. यह हाल सिर्फ एक मॉल का नहीं है, बल्कि देश के कई बड़े शहरों में यही कहानी दोहराई जा रही है.

क्यों ‘घोस्ट मॉल’ में तब्दील हो रही हैं 20 फीसदी इमारतें?
प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म ‘नाइट फ्रैंक’ ने देश के 32 बड़े शहरों के 365 मॉल्स का गहन सर्वे किया. नतीजे बताते हैं कि इनमें से 75 मॉल, यानी करीब 20 फीसदी, अब ‘घोस्ट मॉल’ बन चुके हैं. घोस्ट मॉल रियल एस्टेट की वो श्रेणी है जहां 40 फीसदी से ज्यादा जगह खाली पड़ी हो, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इन 75 मॉल्स में तो 80 फीसदी दुकानें खाली हैं.

इसका सबसे बड़ा कारण खराब प्लानिंग और डिजाइनिंग माना जा रहा है. समय के साथ शॉपिंग को लेकर लोगों का अनुभव और पसंद बदली है, लेकिन ये पुराने मॉल खुद को उस हिसाब से अपडेट नहीं कर पाए. रख-रखाव की कमी के चलते इनका इंफ्रास्ट्रक्चर दिनों-दिन जर्जर होता जा रहा है, जिससे ग्राहक यहां आने से कतराने लगे हैं.

मेट्रो शहरों में ज्यादा बुरा हाल, छोटे शहर बाजी मार गए
नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट ‘थिंक इंडिया थिंक रिटेल 2025’ एक और दिलचस्प तथ्य सामने लाती है. आम धारणा के विपरीत, सबसे ज्यादा वीरान मॉल टियर-2 शहरों में नहीं, बल्कि बड़े मेट्रो शहरों में हैं. बड़े शहरों में कड़ी प्रतिस्पर्धा और बदलती लाइफस्टाइल ने इन पुराने मॉल्स की कमर तोड़ दी है. वहीं दूसरी तरफ, टियर-2 शहरों में ऑक्युपेंसी लेवल यानी दुकानों का भरा होना अभी भी बेहतर स्थिति में है, क्योंकि वहाँ मॉल कल्चर अभी भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

अरबों का इंफ्रास्ट्रक्चर बेकार, फिर भी उम्मीद बाकी
इन बंद पड़े या वीरान हो चुके मॉल्स में करीब 1.55 करोड़ स्क्वायर फीट का विशाल एरिया बेकार पड़ा है. यह न केवल रियल एस्टेट की बर्बादी है, बल्कि आर्थिक नुकसान भी है. हालांकि, जानकारों का मानना है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. अगर इन संपत्तियों की सही तरीके से री-प्लानिंग की जाए और इन्हें रेनोवेट किया जाए, तो इनकी पुरानी रौनक लौट सकती है. रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर इन जगहों का सही इस्तेमाल हो, तो सालाना करीब 350 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कमाई की जा सकती है.

Ramswaroop Mantri

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