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*शिवराज पाटिल:संंवाद, सहमति और संंवैैधाानिक मर्याादा केे पक्षधर*

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भाारतीीय रााजनीीति मेंं
कुुछ व्यक्तित्व ऐसेे रहेे
हैंं, जिन्होंंनेे शोोर सेे नहींं
बल्किसंंयम, गंंभीीरताा
और संंस्थाागत मर्याादाा
केे सााथ अपनीी पहचाान
बनााई। शिवराज
पााटिल उन्हींं व्यक्तित्वोंं
मेंं सेे एक हैंं। वेे एक ऐसेे
रााजनेेता रहेे हैंं जिन्होंंनेे
प्रशाासन, विधाायिका और
मंंत्रिमंंडल- तीीनोंं क्षेेत्रोंं मेंं
गरिमाापूूर्णणभूूमिका निभााई।
सरल व्यक्तित्व, शांंत
स्वभााव और संंवैैधाानिक
मूूल्योंं केे प्रति प्रतिबद्धता उनकेे साार्ववजनिक जीीवन कीी पहचान रही हैै। शिवरााज
पााटिल का जन्म 12 अक्टूूबर 1935 को महाारााष्ट्र केे लाातूूर ज़िलेे मेंं हुुआ। एक
साामाान्य किसाान परिवाार मेंं जन्मेे शिवरााज पााटिल नेे जीवन की शुुरुआत संंघर्षष
और अनुुशाासन केे सााथ कीी। प्राारंंभिक शिक्षाा ग्राामीीण परिवेेश मेंं प्रााप्त करनेे केे बााद
उन्होंंनेे उच्च शिक्षाा कीी ओर कदम बढ़ाायाा। वेे एक मेेधाावीी छाात्र रहेे और काानूून
कीी पढ़ााई पूूरीी कर विधिस्नाातक (LLB) बनेे। काानूून की शिक्षा नेे उनकेे भीीतर
संंवैैधाानिक समझ, तर्ककशीीलताा और लोोकतांंत्रिक मूूल्योंं कीी गहरीी चेेतना विकसित
कीी, जोो आगेे चलकर उनकेे रााजनीतिक जीीवन काा आधाार बनी। शिवरााज पााटिल
काा रााजनीीतिक जीीवन कांंग्रेेस पाार्टी केे सााथ जुुड़ाा रहाा। वेे पहलीी बाार 1980 मेंं
लोोकसभाा केे लिए निर्वााचित हुुए और इसकेे बााद लगााताार कई बाार संंसद पहुंंचेे।
उन्होंंनेे लाातूूर संंसदीीय क्षेेत्र का लंंबेे समय तक प्रतिनिधित्व किया। सांंसद केे रूप
मेंं उनकीी छवि एक गंंभीीर, विषयवस्तुु-केंंद्रित और नीीति-आधाारित नेेताा कीी रहीी। वेे
भााषणोंं मेंं आक्राामकताा सेे अधिक तथ्य और तर्कककोो महत्व देेतेे थेे।
शिवराज पााटिल केे राजनीीतिक जीीवन काा एक महत्वपूूर्णण अध्यााय तब शुुरू
हुुआ जब वेे 1991 मेंं लोोकसभा अध्यक्ष चुुनेे गए। यह वह दौौर थाा जब भाारतीीय
रााजनीीति गठबंंधन और अस्थििरता केे दौौर सेे गुुजर रहीी थीी। ऐसेे समय मेंं उन्होंंनेे
सदन कीी गरिमाा, निष्पक्षताा और संंसदीीय परंंपरााओं कोो बनााए रखनेे काा प्रयाास
कियाा। लोोकसभाा अध्यक्ष केे रूप मेंं उनकाा व्यवहाार दलगत रााजनीीति सेे ऊपर रहाा।
उन्होंंनेे सत्ताा और विपक्ष दोोनोंं केे सााथ समाान दूूरीी बनााए रखीी। संंसदीीय कार्ययवााही
कोो सुुचाारु रूप सेे संंचाालित करनाा, नियमोंं काा पाालन और संंवााद केे मााध्यम सेे
विवाादोंं काा समााधाान—यह उनकेे काार्ययकााल कीी विशेेषतााएँँ रहींं।
शिवरााज पााटिल नेे केंंद्र सरकाार मेंं कई महत्वपूूर्णणमंंत्राालयोंं कीी जिम्मेेदाारीी
संंभााली। वेे रक्षा मंंत्री, नाागरिक उड्डयन मंंत्रीी और अंंततःः केंंद्रीीय गृृहमंंत्रीी बनेे।
प्रत्येेक पद पर उन्होंंनेे प्रशाासनिक संंतुुलन और संंस्थाागत निरंंतरताा को प्रााथमिकताा
दीी। 2004 मेंं यूूपीीए सरकाार केे गठन केे बााद शिवरााज पााटिल कोो केंंद्रीीय गृृह
मंंत्राालय कीी जिम्मेेदाारी सौंंपी गई। यह मंंत्राालय देेश कीी आंंतरिक सुुरक्षा, काानूून-
व्यवस्थाा और संंघीीय ढांंचेे केे लिहााज सेे अत्यंंत महत्वपूूर्णणमाानाा जााताा हैै। उनकाा
काार्ययकााल आतंंकवााद और आंंतरिक सुुरक्षाा कीी चुुनौौतियोंं सेे भराा रहा। इस दौौराान
उन्होंंनेे सुुरक्षाा एजेंंसियोंं केे समन्वय, पुुलिस सुुधाार और संंघीीय ढांंचेे मेंं रााज्योंं कीी
भूूमिकाा को संंतुुलित रखनेे पर बल दियाा। हाालांंकि 2008 केे मुंंबई आतंंकी हमलोंं
केे बााद उन्होंंनेे नैैतिक जिम्मेेदाारीी लेेतेे हुुए पद सेे इस्तीीफाा देे दियाा। यह निर्णणय
भाारतीीय रााजनीीति मेंं दुुर्ललभ माानाा गयाा, जहांं नैैतिक उत्तरदाायित्व स्वीीकाार करनाा कम
हीी देेखनेे कोो मिलता हैै।
शिवरााज पााटिल कीी रााजनीीति आक्राामकता या लोकलुुभाावन नाारोंं पर आधाारित
नहींं रहीी। वेे हमेेशाा संंवाद, सहमति और संंवैैधाानिक मर्याादा केे पक्षधर रहेे। उनकाा
पहनाावा, भााषा और व्यवहाार- सबमेंं एक शाालीीनताा दिखााई देेतीी थीी। वेे सत्ताा कोो
अधिकाार नहींं, जिम्मेेदाारीी माानतेे थेे। सक्रिय रााजनीीति सेे हटनेे केे बााद शिवरााज
पााटिल नेे पंंजााब और चंंडीीगढ़ केे रााज्यपााल केे रूप मेंं भीी सेेवााएँँदींं। इस भूूमिकाा
मेंं भीी उन्होंंनेे संंवैैधाानिक संंतुुलन और संंघीीय मर्याादाा काा पाालन कियाा। रााज्यपााल
रहतेे हुुए उन्होंंनेे रााजनीीतिक टकरााव केे बजााय संंवााद और संंवैैधाानिक प्रक्रियाा
कोो प्रााथमिकताा दीी। शिवरााज पााटिल काा जीीवन भाारतीीय रााजनीीति मेंं एक शांंत
लेेकिन मजबूूत धााराा कीी तरह हैै, जोो बिनाा शोोर किए लोोकतांंत्रिक मूूल्योंं कोो आगेे
बढ़ाातीी रहीी। वेे एक ऐसेे रााजनेेताा रहेे जिन्होंंनेे पद सेे अधिक प्रतिष्ठाा कोो महत्व
दियाा। उनकाा जीीवन आनेे वाालीी पीीढ़ियोंं केे लिए यह संंदेेश देेताा हैै कि रााजनीीति मेंं
नैैतिकताा और मर्याादाा आज भीी संंभव हैै यदि इच्छााशक्ति होो।

Ramswaroop Mantri

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