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*साहित्य का वास्तविक मूल्यांकन समय करता है, न कि सूचियाँ*

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प्रश्न यह नहीं है कि वर्षांत मूल्यांकन होना चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि वह किस नैतिकता, किस अध्ययन–अनुशासन और किस वैचारिक ईमानदारी के साथ हो। यदि सचमुच साहित्य का वर्षांत लेखा–जोखा तैयार करना है, तो उसके लिए व्यापक पढ़ने, विविध स्रोतों से संवाद, आत्मालोचन और पूर्वाग्रहों से संघर्ष आवश्यक है। आलोचक को यह स्वीकार करने का साहस होना चाहिए कि वह सब कुछ नहीं पढ़ सका, और जो पढ़ा है उस पर भी उसका निर्णय अंतिम नहीं है।साहित्य का वास्तविक मूल्यांकन अक्सर समय करता है, न कि सूचियाँ। कई महान रचनाएँ अपने समय में उपेक्षित रहीं और कई चर्चित कृतियाँ समय की कसौटी पर टिक नहीं सकीं। इसलिए वर्षांत का बही–खाता यदि विनम्रता, अस्थायित्व और खुलेपन के साथ तैयार किया जाए, तो वह उपयोगी हो सकता है। लेकिन यदि वह आत्मप्रचार, गुटबंदी और बाज़ार का औज़ार बन जाए, तो वह साहित्य की आत्मा के विरुद्ध है।

शैलेंद्र चौहान

वर्ष के अंतिम दिनों में साहित्यिक संसार में एक विशेष किस्म की प्रायोजित गतिविधि दिखाई देने लगती है। कुछ पत्र–पत्रिकाएँ, विशेषतः वे जिनका स्वरूप साहित्यिक कम और व्यवसायिक अधिक है, ‘वर्ष की महत्वपूर्ण पुस्तकें’, ‘वर्ष के चर्चित लेखक’, ‘साहित्य की उपलब्धियाँ’ या ‘साल भर का साहित्यिक लेखा–जोखा’ जैसे शीर्षकों के अंतर्गत सामग्री प्रकाशित करती हैं।

देखने में यह गतिविधि साहित्य के आत्ममंथन और समग्र मूल्यांकन का एक ज़रूरी प्रयास प्रतीत होती है, किंतु गहराई से देखने पर यह प्रायः एक अधूरा, सतही और पूर्वनिर्धारित ‘वर्षांत का बही–खाता’ बनकर रह जाता है। इसमें साहित्य का मूल्यांकन कम, प्रचार–प्रसार, गुटबंदी और निजी हितों का लेखा–जोखा अधिक दिखाई देता है।

साहित्य का स्वभाव किसी एक वर्ष की सीमा में नहीं बँधता। रचना का प्रभाव, उसका सौंदर्य, उसकी वैचारिक शक्ति और सामाजिक प्रतिध्वनि समय के लंबे प्रवाह में स्पष्ट होती है। इसके बावजूद हर वर्ष साहित्य को किसी शेयर बाज़ार की तरह ‘टॉप परफ़ॉर्मर’ की सूची में बदल देना, उसे अंकतालिका में मापना, एक प्रकार की वैचारिक हिंसा है।

यह प्रवृत्ति साहित्य को गहन सृजनात्मक अनुशासन के बजाय एक उपभोग्य वस्तु में रूपांतरित करती है, जिसकी वैधता उसकी बिक्री, चर्चा या पुरस्कार–संभावना से तय होने लगती है।

वर्षांत विशेषांकों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उनमें ‘सर्वेक्षण’ का भ्रम पैदा किया जाता है, जबकि वस्तुतः न तो व्यापक पढ़त होती है और न ही विविध धाराओं का सम्यक प्रतिनिधित्व। कुछ नाम पहले से तय होते हैं, कुछ पुस्तकें पहले से ‘महत्वपूर्ण’ घोषित कर दी जाती हैं और फिर उन्हीं के इर्द–गिर्द लेखन करवाया जाता है।

यह एक प्रकार का साहित्यिक क्लोज़ सर्किट है, जिसमें लेखक, संपादक, प्रकाशक और समीक्षक एक–दूसरे के लिए वैधता की मुहर बन जाते हैं। इस प्रक्रिया में साहित्य के वास्तविक पाठक, छोटे प्रकाशन, हाशिये की आवाज़ें और असहज प्रश्न लगभग गायब हो जाते हैं।

यह देखा जाता है कि कुछ प्रकाशक अपने मित्र लेखकों से इस तरह का लेखन करवाते हैं। यहाँ ‘मित्रता’ केवल निजी संबंध नहीं, बल्कि एक वैचारिक और व्यावसायिक गठजोड़ भी है। लेखक अपने प्रकाशक की पुस्तकों को वर्ष की उपलब्धि घोषित करता है, संपादक उसी लेखक को ‘विचारशील आलोचक’ के रूप में प्रस्तुत करता है और पत्रिका इस पूरी कवायद को साहित्यिक मूल्यांकन का नाम दे देती है।

इस चक्र में आलोचना की स्वायत्तता समाप्त हो जाती है। आलोचक पाठ से नहीं, संबंधों से संचालित होने लगता है।

जैसे पुराणों में चित्रगुप्त कर्मों का लेखा–जोखा रखते हैं, वैसे ही साहित्य में भी कुछ ऐसे लोग हैं जो हर वर्ष का साहित्यिक हिसाब–किताब रखने में दक्ष माने जाते हैं। वे लगभग हर वर्ष सक्रिय रहते हैं, हर सूची में दिखाई देते हैं और हर निर्णय पर उनकी टिप्पणी मौजूद होती है। किंतु यह टिप्पणी प्रायः गहन अध्ययन या आत्मसंशय से उपजी नहीं होती।

वे न तो पूरे वर्ष के साहित्य को पढ़ते हैं, न ही अधपढ़ी रचनाओं के प्रति ईमानदार अस्वीकार का साहस रखते हैं। जो सामने आ गया, जो आसानी से उपलब्ध हुआ, जो प्रचार में रहा—उसी पर लिख देना उनकी कार्यशैली बन जाती है।

यहाँ ‘अधिक न पढ़ना’ भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है। आज के साहित्यिक परिदृश्य में पुस्तकें पढ़ने का समय घटता जा रहा है, लेकिन उन पर राय देने की हड़बड़ी बढ़ती जा रही है। कई बार पूरी पुस्तक पढ़े बिना, केवल भूमिका, कुछ कविताएँ या कुछ अध्याय देखकर ही उसे ‘वर्ष की महत्वपूर्ण कृति’ घोषित कर दिया जाता है।

यह अधपढ़ा मूल्यांकन न केवल उस कृति के साथ अन्याय है, बल्कि पाठकों के साथ भी एक प्रकार का छल है। आलोचना का पहला नैतिक दायित्व है—पूरा पढ़ना। जब यह दायित्व ही छोड़ दिया जाता है, तो आलोचना केवल एक औपचारिक रस्म बनकर रह जाती है।

वर्षांत लेखन में व्यवसायिक मंतव्य भी स्पष्ट रूप से सक्रिय रहते हैं। पत्र–पत्रिकाएँ विज्ञापनदाताओं और प्रकाशकों पर निर्भर हैं। प्रकाशक चाहते हैं कि उनकी पुस्तकें चर्चा में रहें, ताकि बिक्री बढ़े। ऐसे में ‘वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक’ जैसी सूचियाँ सीधे–सीधे बाज़ार को प्रभावित करती हैं।

यह कोई संयोग नहीं है कि अधिकांश सूचियों में वही पुस्तकें दिखाई देती हैं, जिनके विज्ञापन उसी पत्रिका में छपे होते हैं। साहित्य यहाँ बाज़ार की भाषा बोलने लगता है और आलोचना एक प्रकार की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी में बदल जाती है।

इस पूरी प्रक्रिया में निजी पूर्वाग्रहों की भूमिका भी कम नहीं है। कौन लेखक ‘हमारा’ है और कौन ‘उनका’, कौन विचारधारा के अनुकूल है और कौन असुविधाजनक—ये प्रश्न अक्सर साहित्यिक मूल्यांकन से अधिक निर्णायक हो जाते हैं।

कई बार उत्कृष्ट रचनाएँ केवल इसलिए सूची से बाहर रह जाती हैं क्योंकि लेखक किसी खेमे से नहीं जुड़ा होता या सत्ता–संरचना को असहज करता है। इसके विपरीत, औसत या कमजोर रचनाएँ भी केवल लेखक की प्रतिष्ठा, संबंधों या वैचारिक नज़दीकी के कारण ‘महत्वपूर्ण’ घोषित कर दी जाती हैं।

यह स्थिति साहित्य के लिए खतरनाक है। आलोचना यदि सत्ता–समीकरणों, बाज़ार और मित्रताओं की दासी बन जाए, तो वह अपनी ऐतिहासिक भूमिका खो देती है। साहित्यिक आलोचना का काम केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि प्रश्न उठाना, असहमति दर्ज करना और नए मानदंड प्रस्तावित करना भी है। वर्षांत का बही–खाता यदि केवल ‘किसका नाम छपा’ और ‘किसकी किताब बिकी’ तक सीमित रह जाए, तो वह साहित्यिक विवेक को कुंद करता है।

इसके अतिरिक्त, वर्षांत चर्चाओं में प्रायः भाषा, शिल्प, सामाजिक संदर्भ और ऐतिहासिक जटिलताओं पर गंभीर बातचीत का अभाव होता है। रचनाओं को उनके व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में देखने के बजाय उन्हें व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे साहित्य का सामूहिक और सामाजिक चरित्र कमजोर पड़ता है। साहित्य किसी एक लेखक की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का दस्तावेज़ होता है।

यह भी विचारणीय है कि वर्षांत सूचियाँ अक्सर स्थापित नामों के इर्द–गिर्द घूमती रहती हैं। नए लेखक, छोटे कस्बों से आए रचनाकार, दलित–आदिवासी–स्त्री लेखन या क्षेत्रीय अनुभवों से उपजी कृतियाँ हाशिये पर ही रह जाती हैं। इससे साहित्यिक परिदृश्य में एक प्रकार का अभिजात्यवाद पैदा होता है, जहाँ कुछ नाम स्थायी रूप से ‘महत्वपूर्ण’ और शेष ‘ग़ैर–ज़रूरी’ मान लिए जाते हैं।

इस पूरे परिदृश्य में प्रश्न यह नहीं है कि वर्षांत मूल्यांकन होना चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि वह किस नैतिकता, किस अध्ययन–अनुशासन और किस वैचारिक ईमानदारी के साथ हो। यदि सचमुच साहित्य का वर्षांत लेखा–जोखा तैयार करना है, तो उसके लिए व्यापक पढ़ने, विविध स्रोतों से संवाद, आत्मालोचन और पूर्वाग्रहों से संघर्ष आवश्यक है। आलोचक को यह स्वीकार करने का साहस होना चाहिए कि वह सब कुछ नहीं पढ़ सका, और जो पढ़ा है उस पर भी उसका निर्णय अंतिम नहीं है।

साहित्य का वास्तविक मूल्यांकन अक्सर समय करता है, न कि सूचियाँ। कई महान रचनाएँ अपने समय में उपेक्षित रहीं और कई चर्चित कृतियाँ समय की कसौटी पर टिक नहीं सकीं। इसलिए वर्षांत का बही–खाता यदि विनम्रता, अस्थायित्व और खुलेपन के साथ तैयार किया जाए, तो वह उपयोगी हो सकता है। लेकिन यदि वह आत्मप्रचार, गुटबंदी और बाज़ार का औज़ार बन जाए, तो वह साहित्य की आत्मा के विरुद्ध है।

अंततः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आज आवश्यकता वर्षांत के ‘लेखांकन’ से अधिक साहित्यिक आत्मालोचना की है। ऐसी आलोचना की, जो शोर से दूर, धैर्य से पढ़े, असहमति का जोखिम उठाए और सत्ता–समीकरणों से मुक्त होकर रचना के पक्ष में खड़ी हो। तभी साहित्य का बही–खाता सचमुच साहित्य का होगा, न कि केवल कुछ नामों और पुस्तकों का हिसाब।

(लेखक कवि व आलोचक हैं और अनियतकलिक पत्रिका ‘धरती’ के संपादक हैं।)

Ramswaroop Mantri

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