शहर पर मंडरा रहा खतरा जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा व्यापक है। इसलिए क्योंकि दांव पर इंदौर है और भागीरथपुरा एक चेतावनी। एक बड़े खतरे की घंटी। देर तो हो चुकी पर जब जागो तभी सवेरा।वो तो शहर के प्रबुद्ध वर्ग और कुछ जनप्रतिनिधियों की सतर्कता और जीवट है जिससे शहर बचा रहा, नहीं तो कब का पूरा ही निचोड़ लिया जाता। पर पिछले कुछ समय में ये दोनों ही दबाव कम हुए हैं। सामाजिक संस्थाओं का दबाव कम होने और जनप्रतिनिधियों के कठपुतली बन जाने से अब वो विरोध के स्वर, वो गलत काम करने का डर वो सामाजिक दबाव ही कमज़ोर हो गया है।
तीन बड़े नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई में कांग्रेस के हाथ से मध्यप्रदेश निकल गया। एक नेता भी निकल गया। दूसरा तैयारी में है। अब मध्यप्रदेश में कांग्रेस ना के बराबर है। चूंकि विपक्ष है ही नहीं इसलिए भाजपा ही भाजपा का विपक्ष है। इसी तरह नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई में दांव पर देश का हृदय स्थल और मध्यप्रदेश का सांस्कृतिक कलश इंदौर शहर लगा हुआ है।
मोहरे पिट रहे हैं, प्यादे घिस रहे हैं। व्यवस्था की सड़ांध भागीरथपुरा के पानी में मिलकर सोलह को वैकुंठ पहुंचा चुकी है और डेढ़ हजार को अस्पताल।भ्रष्टाचार आसमान पर है। हर काम के दाम तय हैं और दाम देने पर काम होगा कि नहीं, पता नहीं। नीयत में घुला जहर एक्यूआई को डेढ़ सौ पार पहुंचा चुका है। मास्टर प्लान की हरियाली तो कागजों से भी गायब करने की तैयारी है।
संगठन नेताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ाने में लगा है, मतलब ये कि सच मत बोलो, बोलो तो यों खुले आम मत बोलो। भागीरथपुरा में लोग तो मर गए, आप ज़मीर को क्यों ज़िंदा रखे हुए हो?
साफ धुली हुई सड़कों के नीचे गटर में बहती गंदगी को अपनी गाढ़ी कमाई के पैसों से लगे पानी के फिल्टरों ने छुपा रखा था। नहीं तो इंदौर के 85 वार्डों में से 75 में गंदे पानी की शिकायत है। शहर के नर्मदा की लाइन में सीवरेज का पानी वैसे ही मिला हुआ है जैसे कि नीयत में खोट। पता करना ही मुश्किल है कि कहां मिला है और कहां नहीं!!
अगर जीवन की दो बुनियादी आवश्यकताएं – साफ हवा और साफ पानी ही जनता को नहीं दिया जा सकता तो फिर तरक्की और विकास बेमानी है। हम चांद पर पानी ढूंढ रहे हैं और यहां आंख का पानी मर चुका है।
सत्तर के दशक में नर्मदा को इंदौर लाने के भगीरथी प्रयत्न अब केवल इतिहास में दर्ज हैं। अब तो भागीरथपुरा के मासूमों की गूंज दुनिया में सुर्खियां बन चुकी हैं। उन युवाओं से पूछो जिन्होंने एक महीने तक पूरे शहर और प्रदेश में इसलिए आंदोलन किया ताकि शहर को नर्मदा का स्वच्छ जल मिले।
एक अधिकारी की ज़िद ने सबसे स्वच्छ शहर का तमगा दिया। बदबू मारती और उफन कर फैलती कचरा पेटियों वाला इंदौर शहर ऐसा बदला कि इस जिद को अपना जीवन बना लिया। सबसे स्वच्छ शहर के रूप में अपनी पहचान बनाई।

सारे इंदौरी दिल से जानते हैं कि सड़कों पर लगती इस झाड़ू के नीचे एक सड़ांध मारती व्यवस्था तेजी से फैल रही है। वो कभी भी फट कर सतह पर आ सकती है। और भागीरथपुरा में ये डर सच हो गया।
इंदौर को लजाने वाले कारण मौजूद रहे हैं। लेकिन उन पर भारी पड़ी है शहर की जिंदादिली। सफाई की जिद। सामाजिक संस्थाएं। उत्सव प्रेम। प्रबुद्ध वर्ग। दाल- बाफले और पोहे जलेबी की मस्ती। ये सब ऐसी परतें हैं जिन्होंने सड़ांध को दबाए रखा। पर हर सच्चे इंदौरी को पता है कि काम कहां और कैसे हो रहे हैं और कैसे रुक रहे हैं।
पिछले ढ़ाई दशक से इंदौर बस रुपया कमाने की मशीन बना हुआ है। हर अधिकारी की ललचाई नजर यहीं लगी रहती है। यहां की ट्रासंफर पोस्टिंग सबसे चर्चित है और इसीलिए हर मुख्यमंत्री का “प्यारा शहर” रहा है इंदौर।
वो तो शहर के प्रबुद्ध वर्ग और कुछ जनप्रतिनिधियों की सतर्कता और जीवट है जिससे शहर बचा रहा, नहीं तो कब का पूरा ही निचोड़ लिया जाता। पर पिछले कुछ समय में ये दोनों ही दबाव कम हुए हैं। सामाजिक संस्थाओं का दबाव कम होने और जनप्रतिनिधियों के कठपुतली बन जाने से अब वो विरोध के स्वर, वो गलत काम करने का डर वो सामाजिक दबाव ही कमज़ोर हो गया है। शहर पर मंडरा रहा खतरा जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा व्यापक है। इसलिए क्योंकि दांव पर इंदौर है और भागीरथपुरा एक चेतावनी। एक बड़े खतरे की घंटी। देर तो हो चुकी पर जब जागो तभी सवेरा।





