लोकतांत्रिक अधिकारों पर बढ़ते हमलों का साल
लाल बहादुर सिंह
ट्रंप द्वारा वेनेजुएला पर कब्जा और उसके निर्वाचित राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी फासीवादी साम्राज्यवाद का चरमोत्कर्ष है। वर्ष 2025 को भारत में भी लोकतंत्र पर बढ़ते हमलों के लिए याद किया जाएगा, एक तो सरकार और उसकी संस्थाओं द्वारा और दूसरा उनकी विचारधारा द्वारा पोषित गुंडा गिरोहों द्वारा।
लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला तो अभी सरकार द्वारा संरक्षित केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा बोला गया है। अब आयोग ने अपने को वैध मतदाता साबित करने की जिम्मेदारी जनता के ऊपर छोड़ दी है। जिनका जन्म यहां हुआ, जो लोग कई पीढ़ियों से यहां रहते आए हैं और मतदान करते आए हैं उन्हें भी अपने को नए सिरे से मतदाता साबित करने के लिए कहा जा रहा है इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है।
इसका सबसे बड़ा राजनीतिक उपयोग किया जा रहा है सरकार के नैरेटिव को सेट करने के लिए कि विपक्ष घुसपैठियों को संरक्षण देता है। और उन्हीं के बल पर चुनाव जीतता है। बहरहाल बिहार में जहां पहला एसआईआर हुआ है वहां चंद बांग्लादेशी मुसलमान भी आयोग और सरकार नहीं दिखा पाये। वहां जो कुछ विदेशी मूल के लोग मिले भी वे नेपाली मूल के मजदूर थे जिससे भारत में आवागमन खुला हुआ है।
दूसरे एसआईआर के माध्यम से आरोप है कि सरकार विरोधी लाखों लोगों के नाम काटे जा रहे हैं और सरकार समर्थक नाम जोड़े जा रहे हैं। जाहिर है इस पूरी कवायद के शिकार समाज के सबसे हाशिए के तबके के लोग हैं क्योंकि इस डिजिटल युग में सारे कागजात उनके पास उपलब्ध नहीं हैं जैसा आयोग चाहता है। आयोग सरकार के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया है। खास कर बिहार जैसे राज्यों में जहां अत्यधिक पलायन होता है और एसआईआर की पूरी प्रक्रिया के लिए वहां बेहद कम समय दिया गया।
राहुल गांधी ने तथ्यों और तर्कों के साथ कर्नाटक और हरियाणा की एक एक विधानसभा का जो आंकड़ा प्रस्तुत किया है उसका भी कोई तर्कसंगत जवाब आयोग नहीं दे सका है। आखिर एक मकान में सौ लोग कैसे वोटर हो सकते हैं, एक आदमी कई विधानसभाओं में कैसे वोटर हो सकता है, किसी मकान का पता जीरो कैसे हो सकता है?
जाहिर है चुनाव में अगर निष्पक्षता नहीं होगी, एक वोटर एक मत के सिद्धांत का पालन नहीं होगा तो फिर तो लोकतंत्र की आधारशिला ही नष्ट हो जाएगी। फिर निष्पक्ष चुनाव कैसे होगा? लोकतंत्र कैसे बचेगा?
लोकतंत्र की सारी संस्थाएं करीब करीब कार्यपालिका के अधीन आ चुकी हैं, न्यायपालिका के अधिकांश फैसले कार्यपालिका की मनमर्जी के मुताबिक आ रहे हैं। यहां तक कि जो फैसले कार्यपालिका के विपरीत आ रहे हैं, वे भी आधे-अधूरे छोड़ दिए जा रहे हैं
इसका सबसे बड़ा उदाहरण इलेक्टोरल बॉन्ड पर आया फैसला था जिसमें उसे असंवैधानिक तो घोषित कर दिया गया लेकिन न उस पैसे को जब्त किया गया, न किसी की जवाबदेही तय की गई, दोनों के बीच इसी दुरभिसंधि का चरम स्वरूप देखा गया जब मोदी जी ने उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के घर उनके परिवारिक कार्यक्रम में भाग लेते हुए गणेश वंदना की। स्वाभाविक है कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि बाबरी मस्जिद प्रकरण में उन्होंने भगवान से पूछ कर फैसला लिया था।
2024 में बहुमत न मिलने के बाद उम्मीद की गई थी कि अब क्योंकि संवैधानिक रूप से भी अपने बल पर अकेले भाजपा सरकार नहीं बना पा रही है, इसलिए उसकी आक्रामकता में कमी आएगी।लेकिन आखिर फासीवादी गिरोह ने यह साबित कर दिया कि वह देश में लोकतंत्र के हर चिह्न को मिटा देने पर आमादा है।
मुसलमानों के बाद अब ईसाइयों पर जिस तरह के हमले हुए हैं उससे साफ है कि सौ वर्ष पूरे होने पर विधिवत नहीं भी तो वस्तुत: उसने हिंदू राष्ट्र का निर्माण कर लिया है। मुसलमानों और ईसाइयों के त्यौहारों पर उनके पूजास्थलों पर हमला वहां अश्लील नारेबाजी अब आम चलन हो गया है।
दरअसल अब अपने निहित राजनीतिक स्वार्थ में हमारे विविधतापूर्ण समाज की सारी दरारों का वे बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। अभी उत्तराखंड में पूर्वोत्तर भारत के एक युवक को ऐसे ही पीट-पीट कर मार डाला गया तो बरेली में एक छात्रा ने जब अपने जन्मदिन पर कुछ मुस्लिम दोस्तों को बुलाया तो उन पर लंपटों के गिरोह ने हमला कर लहूलुहान कर दिया।देश के विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में मुसलमानों पर एक ओर सरकार का बुलडोजर चल रहा है, दूसरी ओर विभिन्न नामधारी लंपट गिरोहों के वे शिकार हो रहे हैं।
उमर खालिद जैसे नौजवान बिना मुकदमा चलाए फर्जी मामलों में 5 साल से जेल में हैं, यहां तक कि उन्हें बेल तक नहीं मिल रही है। माओवाद को खत्म करने की डेडलाइन तय कर चुकी सरकार के राज में न सिर्फ माओवादी मारे जा रहे हैं बल्कि अपनी जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे आम आदिवासी भी मारे जा रहे हैं।माओवादी के नाम पर आदिवासियों के हितों के लिए लड़ रहे सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता जेलों में बंद किए जा रहे हैं।
थॉमस पिकेटी के अनुसार सबसे बड़ा गैर बराबरी वाला देश बन जाने के बाद भी सारी खान खदानें जंगल जमीन अडानी जैसे चहेते पूंजीपतियों के हवाले की जा रही है।
कुल मिलाकर कार्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के राज में एक ओर आर्थिक व राजनीतिक सत्ता का चरम केंद्रीकरण हो रहा है, दूसरी ओर आम जनता बेहाल है। हाशिए के तबकों की हालत बद से बदतर होती जा रही है, असहमत बुद्धिजीवी, पत्रकार नागरिक समाज के लोग दमनकारी सरकारी मशीनरी के शिकार बनाए जा रहे हैं। सरकार जितनी कमजोर और डरी हुई है, उतनी ही वह आम जनता के प्रति आक्रामक होती जा रही है। जाहिर है इस फासीवादी सरकार के खिलाफ एक विराट जनांदोलन ही इसे अपनी रीत नीति बदलने पर मजबूर कर सकता है।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)





