अंजनी कुमार
पिछले कुछ वर्षों से साहिबी नदी के उद्धार का कार्यक्रम चल रहा है। यह नदी पुराने मानचित्र में जयपुर की निचली पहाड़ियों से निकलती है। यह कई धाराओं को अपने साथ जोड़ते हुए अलवर होते हुए गुरूग्राम में प्रवेश करती है। और, फिर यहीं वह गुम होने लगती है। वह गुरूग्राम से दिल्ली के नजफगढ़ के बैराज में आती है। आगे यह नजफगढ़ नाले में तब्दील हो जाती है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस नाम पर आपत्ति दर्ज कराई और इसे फिर से ‘साहिबी नदी’ नाम दिया। दिल्ली में लोग फिलहाल अभी तक इसे नदी नहीं नाला ही कहते हैं। आजकल इसी नाले की सफाई का लंबा कार्यक्रम जारी है। ज्यादातर हिस्से में इसके किनारे पर मोटी ऊंची दीवार खड़ी है।
इन दीवारों पर चित्र उकेरे गये हैं और कुछ-कुछ जगहों पर लिखा रहता है: ‘मैं साहिबी नदी बोल रही हूं’।’ इसका असर इतना जरूर हुआ है कि लोग जिसे नाला समझते थे उसे एक नदी के नाम से जानने लगे हैं। लेकिन, नदी को उसका अपना रूप नहीं मिला है। इस नदी की पुकार हवा में गूंज रही है। यह नदी गुरूग्राम की सीमा पर आकर लुप्त हो जाती है। यह नदी मसानी बैराज तक आती है। यहीं से 11 किमी आगे तक यह नदी गायब है।
हरियाणा के सिंचाई अधिकारी एक लिंक डेन और एक आउटफाॅल डेन नम्बर 8 को साहिबी नदी के रूप में चिन्हित करते हैं। और, इस संदर्भ में अधिसूचना भी जारी कर दी गई है। नदी के क्षेत्र का चिन्हित करने का काम जारी है। इन पर निजी मालिकाना है। निजी मालिकाने की यह जमीन लगभग 350 एकड़ में फैली हुई है।
दिल्ली को लेकर बनाये मानचित्र में 1907 तक साहिबी नदी का उल्लेख मिलता है। यहां तक कि 2012 में केंद्रीय जल आयोग द्वारा प्रकाशित नदियों के एटलस में भी सहिबी का उल्लेख है और इसे यमुना नदी की सहायक नदी की तरह उल्लेख किया गया है। नजफगढ़ से आगे बढ़ते हुए यह नदी वजीराबाद के रास्ते यमुना में गिरती है। इसी नदी पर फिरोजशाह तुगलक के समय में बैराज बनाया गया था। इसके किनारे खड़े एक मकबरे को आज भी देखा जा सकता है।
उस समय साहिबी नदी पर बनाया गया बैराज सिंचाई और जल आपूर्ति के लिए किया गया था। यह बताना उपयुक्त होगा कि फिरोजशाह तुगलक नहर और बैराज बनाने की जल संसाधन को विकसित करने और नये शहर को बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका थी। सल्तनत काल में ही दिल्ली के भीतर पानी की आपूर्ति को बनाये रखने के लिए एक और महत्वपूर्ण बारापूला बैराज बनाया गया था जो इस समय यह साकेत में है। मध्यकाल में बने छोटे बैराज के और भी उल्लेख दिल्ली में मिलते हैं।
अरावली से बहने वाली नदियां आमतौर पर अपने साथ कई छोटी धाराओं को अपने समेटते हुए बनती हैं। अरावली की पहाड़ियों में न बहुत तीखा ढलान और न बहुत ही उथला तल, न बहुत ऊंचे शिखर और न बहुत कटान बनाती हुई खाईयां हैं। अरावली श्रृंखला में माउंट आबू एक अपवाद की तरह दिखता है। अरावली की पहाड़ियों के नीचे के मैदानों में ताल, झील और छोटे पोखरों की खूब संख्या है। अरावली की गोद में बसे कई शहर खूबसूरत झीलों से नवाजे गये हैं।
वहीं बावड़ियों के निर्माण भारतीय स्थापत्य में एक उदाहरण की तरह हैं। इन्हीं पहाड़ियों में चित्तौड़गढ़ और कुम्भलगढ़ जैसे विशाल किले हैं जिनके स्थापत्य की कहानी हजारों साल पीछे मौर्य काल तक चली जाती है। वहीं जैसलमेर जैसी जगहों से लाखों साल पहले के डायनासोर के अंडे और शुरूआती इंसानी बसावटों के चिन्ह मिलने लगते हैं। अरावली की पहाड़ियों और उसके मैदानों में भारत के सबसे पुरानी बसावट के चिन्ह मिलते हैं जिसमें पाषाण काल के औजार से लेकर गुफा चित्र तक उपस्थित हैं।
यहां बनास संस्कृति, जो जिसे उत्तरवर्ती हड़प्पा सभ्यता माना जाता है से लेकर चंद्रावती में मौर्य काल की उपस्थिति दर्ज होती हुई दिखती है। इसी अरावली की श्रृंखला में दिल्ली से सटे फरीदाबाद में मिले पाषाणकाल के औजार और उनके अन्य सांस्कृतिक चिन्ह हाल ही के दिनों में एक छात्र ने खोज निकाले। बाद में, पुरातत्व विभाग ने स्वीकार किया कि यहाँ पाषाण औजारों के बनाने का कारखाना था। इसका अर्थ है कि यहां मानवों की उपस्थिति थी। जेएनयू से भी इस तरह के औजार और चिन्ह पहले मिल चुके हैं।
गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली अरावली की श्रंखलाएं एक मानव सभ्यता और जीवों के पलने की अनुकूल स्थितियों को बनाती थीं। इसका अर्थ यह भी है कि यहां जीवन के लिए पानी और जीने के लिए भोजन की सुविधा उपलब्ध थी। एक तरफ थार का रेगिस्तान और दूसरी तरफ मानसून की पहुंच से दूरी के बावजूद अरावली का क्षेत्र भारत में एक समृद्ध सभ्यता को जन्म देने और उसे विकसित करने में सक्षम था।
इसी के परिक्षेत्र में भारत की राजधानी दिल्ली विकसित हुई। पटना के बाद भारत की राजनीतिक धुरी इसी अरावली क्षेत्र में आ बसी। आज उत्तर भारत का सबसे तेजी से उद्योगिक तौर पर विकसित होना वाला केंद्र गुरूग्राम इसी अरावली की पहाड़ियों में है और यह अपने विकास के साथ-साथ एक पूरी नदी को खा गया। ये विकसित होते हुए शहर इसके सैकड़ों पहाड़ियों को खा गये। विकास और प्रकृति के बीच के इस द्वंद में यह देखना होगा इसमें कितना द्वंद है और कितना मुनाफे की हवस।
दिल्ली से लेकर राजस्थान, इसमें आगरा और सीकरी भी जोड़ देना होगा, तक जितने भी बड़े महल, किले आदि स्थापत्य के नमूने हैं, वे इन्हीं अरावली से निकले पत्थरों से बने हैं। लाल पत्थर से लेकर संगमरमर का सारा स्थापत्य इन्हीं अरावली के खदानों से निकाले गये। लेकिन, इससे कोई नदी या पहाड़ लुप्त नहीं हुआ।
लेकिन, जैसे-जैसे ब्रिटिश उपनिवेशवाद का कब्जा बढ़ता है और धीरे-धीरे पूंजीवाद के मुनाफे की हवस बढ़ती है, जंगल और पहाड़ गायब होने लगते हैं और भारत के भूगोल में बदलाव दिखने लगता है। यह प्रक्रिया बाद के समय में चलती ही जा रही है। मोदी के नेतृत्व में चलने वाली सरकार के कार्यकाल में इस दिशा में मानो एक पूरी छलांग लगा दी गई है। भारत के फेफड़ा माने जाने वाले हसदेव जंगल पर जिस तरह से आरियां चल रही हैं, वह किसी भी इंसान को कंपा देने के लिए काफी है।
साहिबी नदी की जमीन पर निजी मिल्कियत और उस पर प्लाट काट कर कालोनी बना देने से भले ही नया मानचित्र बना लिया जाए। लेकिन, भूपरिदृश्य इससे गुणात्मक तौर पर बदल दिया जाये, संभव नहीं है। साहिबी नदी अभी भी गुरूग्राम में प्रवेश करती है और बारिश के मौसम में अपना असर दिखाती है। इससे जुड़े अन्य छोटे नाले भी अपनी इस नदी को खोजते हुए पानी लिए आते हैं जो रास्ता न मिलने पर जल भराव का भीषण दृश्य पैदा करते हैं।
नदी पर अतिक्रमण और बहाव क्षेत्र में बाधा उत्पन्न करने का एक नतीजा 1977 में ही दिल्ली में साहिबी नदी से आई बाढ़ के रूप में दर्ज है जिसका असर आगे कई सालों तक बना रहा। लेकिन, इसी के बाद से यह नदी पूरी तरह से नाले में तब्दील कर दी गई।
भारत के दो आधुनिकतम शहरी केंद्र दिल्ली और गुरूग्राम ने साहिबी नदी को खत्म करने की ओर लेकर चले गये। यह देश को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया के दौरान ही हुआ। इस विकास की दिशा ने कितने ही पहाड़ों और जंगलों को खत्म कर दिया। कितनी नदियां बर्बादी की ओर चली गईं। आज अपनी जरूरतों के अनुकूल के नाम पर मुनाफा कमाने की हवस सिर्फ एक नदी और एक पहाड़ को खा जाने के लिए ही उतावले नहीं हैं। ये पूरी की पूरी पर्वत श्रृंखला ही चबा जाने के लिए तैयार बैठी हैं।
पूरा का पूरा जंगल निगल जाने के लिए तैयार बैठे हैं। वे सिर्फ कानून और प्रावधान बना रहे हैं और इसी के बल पर एक पूरी सभ्यता को, उसके इतिहास और वर्तमान को खा जाने के लिए खड़े दिख रहे हैं। यह भयावह है।
साहिबी नदी गुरूग्राम से दिल्ली के वजीराबाद बैराज तक भारत के सबसे आधुनिक और समृद्ध, विकसित लोगों से पूछते हुए गुजर रही है, मुझे तुमने क्यों मारा, मैंने तो तुम्हें जिंदगी दी थी। इसी दिल्ली में यही सवाल पूछते हुए यमुना गुजर रही है। जिस देश में नदी पूजने की इतनी समृद्ध परम्परा रही हो, वहां नदियां अपने अस्तित्व के लिए पुकार रही हैंः ‘‘मैं साहिबी बोल रही हूं’’।





