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 *वेनेजुएला अमेरिका का अगला अफगान‍िस्‍तान बनने जा रहा है?,वो 5 देश, जहां अमेर‍िका को मुंह की खानी पड़ी*

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वेनेजुएला में अमेर‍िका के ख‍िलाफ विद्रोही सुर उभर आए हैं. लोग सड़कों पर हैं

क्या वेनेजुएला अमेरिका का अगला अफगान‍िस्‍तान बनने जा रहा है? डोनाल्ड ट्रंप ने निकोलस मादुरो को हटाकर काराकस की तिजोरी की चाबी भले ही अपने पास रख ली हो, लेकिन इतिहास एक अलग ही गवाही दे रहा है. वियतनाम के जंगलों से लेकर अफगानिस्तान के पहाड़ों और इराक के रेगिस्तानों तक… जहां भी अमेरिका ने चौधरियों की तरह दूसरे देश की सत्ता चलाने की कोशिश की, वहां से उसे बोरिया-बिस्तर समेटकर रातों-रात भागना पड़ा. यही खतरा वेनेजुएला में दिख रहा है.

इतिहास गवाह है कि जहां भी अमेरिका ने दूसरे देश की सत्ता चलाने की कोशिश की है, वहां अंततः उसे अपनी सेना उतारनी पड़ी है और बाद में मुंह की खानी पड़ी है… चाहे वह वियतनाम हो, इराक हो या अफगानिस्तान. अब यही खतरा वेनेजुएला में मंडरा रहा है. डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने निकोलस मादुरो को हटाकर वेनेजुएला पर कंट्रोल तो कर लिया है, लेकिन जमीन पर हालात काबू से बाहर होते दिख रहे हैं. अमेरिकी मंसूबों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वेनेजुएला को रिमोट कंट्रोल से नहीं चलाया जा सकता. वहां शासन करने के लिए ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ यानी अमेरिकी सेना की जरूरत पड़ेगी, लेकिन ट्रंप अपने सैनिकों को विदेशी धरती पर फंसाना नहीं चाहते.
रायटर्स की खबर के मुताबिक, वेनेजुएला की जनता और सिक्‍योरिटी फोर्स अमेरिका को मुक्तिदाता के बजाय दुश्मन और आक्रमणकारी के रूप में देख रहे हैं. उदाहरण राष्ट्रपति के प्रेस‍िडेंश‍ियल गार्ड के भीतर देखने को मिला. मादुरो पर हमले के बाद नई सरकार पर दबाव इतना बढ़ा क‍ि उन्‍हें प्रेस‍िडेंश‍ियल गार्ड के चीफ जनरल जेवियर मार्कानो ताबाता को बर्खास्‍त करना पड़ा. सूत्रों के मुताबिक, जनरल और उनके अधीनस्थ अमेरिकी आदेशों को मानने से इनकार कर रहे थे. सुरक्षा बलों के भीतर यह गुस्‍सा अमेरिका के लिए खतरे की घंटी है. अगर वेनेजुएला की फौज ने साथ नहीं दिया तो अमेरिका को मजबूरी में अपनी फौज उतारनी पड़ेगी, जो एक लंबे और खूनी संघर्ष की शुरुआत होगी.



वेनेजुएला में अमेर‍िका के ख‍िलाफ जबरदस्‍त प्रदर्शन हो रहे हैं.

डेल्सी रोड्रिगेज ने भी अमेर‍िका को द‍िखाया आईना

मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अंतरिम सरकार चला रहीं डेल्सी रोड्रिगेज ने भी अमेरिका को आईना दिखाया है. हालांकि वे अमेरिका के साथ व्यापार के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्होंने ट्रंप प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाए हैं. सरकारी टीवी चैनल VTV पर उन्‍होंने कहा, आप सभी जानते हैं कि अमेर‍िका हमारे देश के संसाधनों को हड़पना चाहता है. ड्रग तस्करी, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बातें तो बस बहाना थीं, असली मकसद तेल था. उन्होंने साफ कर दिया कि अमेरिका के साथ कोई भी तेल साझेदारी तभी मान्य होगी जब उससे वेनेजुएला की जनता को फायदा हो.

वेनेजुएला जाने से डर रहीं अमेरिकी कंपनियां

भले ही ट्रंप अमेरिकी तेल कंपनियों पर वेनेजुएला में इन्‍वेस्‍ट करने का दबाव बना रहे हों, लेकिन कंपनियां डरी हुई हैं. फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी तेल कंपनियों ने मियामी में अधिकारियों के साथ मीटिंग में साफ कह द‍िया क‍ि हम पैसा तभी लगाएंगे, जब हमें सुरक्षा की गारंटी मिलेगी. उन्हें डर है कि वेनेजुएला में अमेरिकी विरोधी माहौल और अस्थिरता के बीच उनका पैसा डूब सकता है. कंपनियां जानती हैं कि बिना अमेरिकी सेना की सुरक्षा के वहां काम करना जोखिम भरा है.

वो 5 देश, जहां अमेर‍िका को मुंह की खानी पड़ी

वियतनाम: 20 साल की जंग और छत से भागते हेलीकॉप्टर

अमेरिका ने कम्युनिज़्म को रोकने के नाम पर वियतनाम में हस्तक्षेप किया. 1955 से उसने दक्षिण वियतनाम की कठपुतली सरकार को समर्थन देना शुरू किया और 1960 के दशक में अपनी पूरी सेना उतार दी. अमेरिका वहां की सरकार, सेना और रणनीति सब कुछ चला रहा था. लगभग 20 साल तक अमेरिका ने वहां बमबारी की और 58,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए. लेकिन स्थानीय छापामार युद्ध ने अमेरिका की कमर तोड़ दी. 1975 में जब ‘साइजोन’ पर कब्जा हुआ, तो अमेरिकी दूतावास की छत से हेलीकॉप्टर में बैठकर भागते अमेरिकियों की तस्वीरें दुनिया ने देखीं. यह अमेरिका की सबसे शर्मनाक हार मानी जाती है.

Acting Defense Secretary Pat Shanahan, left arrives in Kabul, Afghanistan, Monday morning, Feb. 11, 2019, to consult with Army Gen. Scott Miller, right, commander of U.S. and coalition forces, and senior Afghan government leaders. The unannounced visit is the first for the acting secretary of defense, Pat Shanahan. He previously was the No. 2 official under Jim Mattis, who resigned as defense chief in December. (AP Photo/Robert Burns)

अफगानिस्तान: खरबों डॉलर बहाए, फिर भी रातों-रात भागी सेना

9/11 हमले के बाद 2001 में अमेरिका ने तालिबान को उखाड़ फेंकने के लिए अफगानिस्तान पर हमला किया. काबुल में अपनी पसंद की सरकार बनवाई और लगभग 20 साल तक देश की सुरक्षा और प्रशासन को अपने नियंत्रण में रखा. अमेरिका ने वहां ‘नेशन बिल्डिंग’ के नाम पर खरबों डॉलर खर्च किए और आधुनिक सेना तैयार की. लेकिन, वे वहां की कबिलाई संस्कृति और ग्रामीण इलाकों पर पकड़ नहीं बना सके. अगस्त 2021 में, जैसे ही अमेरिकी सेना ने वापसी शुरू की, 20 साल की मेहनत ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. अमेरिकी सैनिकों के पूरी तरह निकलने से पहले ही तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया और अमेरिका को अफरा-तफरी में भागना पड़ा.

इराक: सद्दाम को हटाया, लेकिन शांति नहीं ला सका

2003 में अमेरिका ने झूठ बोला कि सद्दाम हुसैन के पास विनाशकारी हथियार हैं और इराक पर हमला कर दिया. सद्दाम को सत्ता से हटाकर अमेरिका ने वहां कोएलिशन प्रोविजनल अथॉरिटी के जरिए सीधे शासन किया. उन्होंने इराकी सेना को भंग कर दिया, जो उनकी सबसे बड़ी गलती साबित हुई. अमेरिका वहां अपना लोकतंत्र थोपना चाहता था, लेकिन इसके बजाय वहां गृहयुद्ध छिड़ गया और ISIS जैसा आतंकी संगठन पैदा हुआ. 2011 में जब अमेरिका वहां से निकला, तो वह एक टूटा हुआ और ईरान के प्रभाव वाला इराक छोड़कर गया. अमेरिका वहां न तो तेल सुरक्षित कर पाया और न ही अपनी पसंद की स्थायी सरकार चला पाया.

सोमालिया: ‘ब्लैक हॉक डाउन’ और रातों-रात वापसी

1992 में अमेरिका सोमालिया में मानवतावादी मिशन के नाम पर घुसा, लेकिन जल्द ही उसने वहां के गृहयुद्ध में दखल देना और सत्ता का समीकरण तय करना शुरू कर दिया. अमेरिका वहां के वारलॉर्ड (Warlord) मोहम्मद फराह अदीद को पकड़कर अपनी शर्तों पर शांति थोपना चाहता था. 1993 में मोगादिशु में अमेरिकी रेंजर्स ने एक ऑपरेशन चलाया जो भयानक रूप से गलत साबित हुआ. इसे ‘ब्लैक हॉक डाउन’ घटना के नाम से जाना जाता है, जिसमें 18 अमेरिकी सैनिक मारे गए और उनके शवों को सड़कों पर घसीटा गया. इस घटना से अमेरिका इतना डर गया कि राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने तुरंत सेना वापस बुला ली और सोमालिया को भगवान भरोसे छोड़ दिया.

ईरान: 26 साल तक चलाया, फिर हुई क्रांति और बेइज्जती

यह ‘प्रॉक्सी रूल’ (परोक्ष शासन) का सबसे बड़ा उदाहरण है. 1953 में अमेरिका (CIA) ने ईरान में तख्तापलट कर वहां के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री मोसादेक को हटवाया और शाह (राजा) को गद्दी पर बैठाया. अगले 26 सालों तक अमेरिका ने शाह के जरिए ईरान का तेल और विदेश नीति अपने हिसाब से चलाई. शाह ने अमेरिकी शह पर जनता पर जुल्म किए. नतीजा यह हुआ कि 1979 में इस्लामिक क्रांति हो गई. शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा. ईरान की जनता ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया और 52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा. अमेरिका को वहां से हमेशा के लिए खदेड़ दिया गया.

Ramswaroop Mantri

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