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*सनातन, धर्म और योग : शब्दों से परे सत्य की खोज*

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(एक वैचारिक लेख)

 -तेजपाल सिंह ‘तेज’

 

भूमिका : जब धर्म प्रश्नों से डरने लगे:

          किसी भी सभ्यता की जीवंतता इस बात से पहचानी जाती है कि वह स्वयं से प्रश्न पूछने का साहस रखती है या नहीं। भारतीय परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति यही रही है कि यहाँ सत्य को अंतिम मानकर थोपने के बजाय उसे खोज का विषय माना गया। ऋषि प्रश्न करते थे, सिद्ध प्रयोग करते थे और योगी अनुभव के आधार पर बोलते थे। परंतु विडंबना यह है कि आज वही परंपरा प्रश्नों से असहज होने लगी है। “सनातन धर्म” जैसे शब्दों को इतना पवित्र और अछूता बना दिया गया है कि उन पर विचार करना भी अपराध जैसा प्रतीत होने लगा है। यही स्थिति इस लेख का मूल संदर्भ है—धर्म को आस्था से निकालकर बोध और विवेक के क्षेत्र में पुनः स्थापित करने का प्रयास।

सनातन : शाश्वत सत्य या ऐतिहासिक संकल्पना?

          “सनातन” शब्द को आज इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वह स्वयं वेदों से सीधे उतरा हुआ कोई अखंड, अपरिवर्तनीय सत्य हो। किंतु जब हम ऐतिहासिक और भाषाई स्तर पर जांच करते हैं, तो यह तथ्य सामने आता है कि “सनातन” शब्द सभी वेदों में समान रूप से नहीं मिलता। इसका अर्थ यह नहीं कि शाश्वत सत्य का अभाव था, बल्कि यह कि उस सत्य को व्यक्त करने की भाषा अलग थी। समस्या तब शुरू होती है जब किसी शब्द को ही सत्य मान लिया जाता है। शब्द समय के साथ बनते और बिगड़ते हैं, पर सत्य शब्दों से पहले भी था और बाद में भी रहेगा। जब “सनातन” को एक पहचान, एक धर्म-लेबल और एक सत्ता-चिह्न बना दिया जाता है, तब वह सत्य का माध्यम नहीं, बल्कि सत्य पर परदा बन जाता है।

धर्म : अनुभव से व्यवस्था तक की यात्रा:

          प्रारंभिक भारतीय धर्म अनुभव प्रधान था। वह जंगलों, गुफाओं, नदी-तटों और मौन में जन्मा। धीरे-धीरे वही धर्म सामाजिक संरचना में ढला, नियमों में बंधा और संस्थागत होता गया। संस्थाएँ आवश्यक थीं, पर जब उन्होंने अनुभव की जगह ले ली, तब धर्म साधना न रहकर अनुशासन बन गया। यही वह बिंदु है जहाँ धर्म जीवन को मुक्त करने के बजाय नियंत्रित करने लगता है। कर्मकांड, जाति, श्रेष्ठता और भय—ये सब उसी नियंत्रक धर्म की उपज हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म सत्ता के निकट गया, तब-तब सत्य उससे दूर होता गया।

आस्तिक और नास्तिक : शब्दार्थ का उलटा सत्य:

          आस्तिकता को केवल ईश्वर-विश्वास से जोड़ देना भारतीय दार्शनिक परंपरा के साथ अन्याय है। “अस्ति” का अर्थ है—जो है, जो वास्तविक है। इस दृष्टि से आस्तिक वह है जो वर्तमान में जीता है, जो यथार्थ से पलायन नहीं करता। इसके विपरीत, जो व्यक्ति ईश्वर के नाम, कल्पनाओं और भविष्य-परलोक में उलझा रहता है, वह वर्तमान से कट जाता है। यह कटाव ही वास्तविक नास्तिकता है। इस व्याख्या में ईश्वर का否करण नहीं है, बल्कि ईश्वर-कल्पना के दुरुपयोग पर प्रश्न है। यहाँ धर्म विश्वास नहीं, सजग उपस्थिति बन जाता है।

योग : धर्मों के पार एक जीवंत विज्ञान:

          योग को जब किसी एक धर्म या पहचान में बांध दिया जाता है, तब वह अपना मूल स्वभाव खो देता है। योग न हिंदू है, न बौद्ध, न शैव, न वैष्णव। योग चेतना का विज्ञान है—ऐसा विज्ञान जो प्रयोगशाला में नहीं, स्वयं मनुष्य के भीतर घटित होता है। यही कारण है कि योग हर काल, हर भूगोल और हर संस्कृति में प्रासंगिक रहा है। नाथ परंपरा इसी योग-विज्ञान की प्रतिनिधि रही है, जिसका एक प्रमुख स्वर गोरखनाथ के रूप में सामने आता है। गोरखनाथ का योग किसी चमत्कार या तंत्र का प्रदर्शन नहीं, बल्कि चेतना की अखंडता का अभ्यास था।

गोरखनाथ और उनके नाम पर फैला धार्मिक भ्रम:

          आज गोरखनाथ के नाम पर जो कुछ प्रचलित है, वह उनके मूल विचारों से प्रायः विपरीत दिखाई देता है। नशा, दिखावा, टोना-टोटका और चमत्कार—ये सब उस योग के विपरीत हैं जो विवेक और संयम की बात करता है। यह स्थिति एक गहरे संकट की ओर संकेत करती है, जहाँ किसी विचारक या योगी के नाम को ब्रांड बना दिया जाता है और उसका विचार पीछे छूट जाता है। यह केवल गोरखनाथ तक सीमित नहीं, बल्कि लगभग हर बड़े आध्यात्मिक व्यक्तित्व के साथ यही हुआ है।

बुद्ध, सिद्ध और परंपरा-विरोध:

          जब धर्म अत्यधिक जटिल और बोझिल हो जाता है, तब प्रतिरोध जन्म लेता है। गौतम बुद्ध इसी प्रतिरोध का सबसे सशक्त उदाहरण हैं। बुद्ध ने वेदों का समर्थन नहीं किया, बल्कि वेदों के नाम पर चल रहे कर्मकांड और सत्ता-तंत्र को चुनौती दी। नाथ और सिद्ध परंपराएँ भी इसी धारा में आती हैं। वे धर्म को शुद्ध-बुद्ध-बोध की ओर लौटाने का प्रयास करती हैं, जहाँ ज्ञान किसी ग्रंथ में बंद नहीं, बल्कि जीवन में घटित होता है।

 ग्रंथ, अनुवाद और सत्ता की राजनीति:

          इतिहास यह भी बताता है कि ग्रंथ कभी निष्पक्ष नहीं रहे। उनके चयन, संरक्षण और व्याख्या में सत्ता की भूमिका रही है। अनुवाद बदले गए, अर्थों को मोड़ा गया और जो सुविधाजनक था, उसे हाशिये पर डाल दिया गया। परिणामस्वरूप धर्म धीरे-धीरे अनुभव से कटकर पाठ्यक्रम बन गया। जब धर्म केवल पढ़ा जाए और जिया न जाए, तब वह नैतिकता का उपदेश तो दे सकता है, पर रूपांतरण नहीं कर सकता।

निष्कर्ष : धर्म का पुनः मानवीय होना:

          यह लेख किसी धर्म, परंपरा या आस्था का खंडन नहीं करता। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि धर्म को फिर से मनुष्य के निकट लाया जाए। सनातन का अर्थ यदि शाश्वत सत्य है, तो वह किसी एक शब्द, ग्रंथ या पहचान में सीमित नहीं हो सकता। वह हर उस क्षण में प्रकट होता है, जब मनुष्य सजग, करुणामय और विवेकपूर्ण होता है। आज आवश्यकता है कि हम धर्म को डर, गर्व और राजनीति से मुक्त करें और उसे पुनः अनुभव, बोध और मानवता की भूमि पर स्थापित करें। शायद तभी धर्म फिर से जीवन का उत्सव बन सकेगा, न कि संघर्ष का कारण। (https://youtu.be/9ZNy8Xmc-Zg?si=zwtgqOH3Pq_xG0NF)

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