शैलेंद्र चौहान
इक्कीसवीं सदी की विश्व राजनीति किसी नैतिक प्रगति का संकेत नहीं देती, बल्कि वह मनुष्य के बौद्धिक विकास के साथ-साथ उसके नैतिक पतन की भी गवाही देती है। यह वह दौर है जहाँ शक्ति, तकनीक और पूँजी ने राजनीति को इस हद तक अपने अधीन कर लिया है कि मनुष्यता केवल भाषणों और घोषणापत्रों की शोभा बनकर रह गई है।
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद यह विश्वास पैदा किया गया था कि अब दुनिया विचारधाराओं के टकराव से मुक्त होकर सहयोग, सहअस्तित्व और अंतरराष्ट्रीय क़ानून की ओर बढ़ेगी, किंतु यह विश्वास बहुत जल्दी एक भ्रम सिद्ध हुआ। ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ वस्तुतः उन नियमों की व्यवस्था थी जिन्हें शक्तिशाली राष्ट्र अपनी सुविधा के अनुसार लागू करते या स्थगित कर देते थे।
अमेरिका इस व्यवस्था का सबसे बड़ा संचालक और सबसे बड़ा उल्लंघनकर्ता दोनों रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उसने स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्वतंत्रता का संरक्षक घोषित किया, किंतु इराक से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक, लीबिया से लेकर सीरिया और वेनेज़ुएला तक, उसकी सैन्य और आर्थिक दख़लअंदाज़ी ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र उसके लिए कोई नैतिक प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक औज़ार है।
जिन देशों में उसकी नीतियों के अनुरूप सरकारें होती हैं, वहाँ लोकतंत्र सुरक्षित घोषित कर दिया जाता है, और जहाँ जनता ने अपनी पसंद से कोई वैकल्पिक रास्ता चुना, वहाँ तानाशाही, आतंकवाद या अस्थिरता का ठप्पा चिपका दिया जाता है। इस दोहरे मापदंड ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नैतिकता से लगभग पूरी तरह अलग कर दिया है।
संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएँ, जिनसे यह अपेक्षा थी कि वे वैश्विक न्याय की आवाज़ बनेंगी, आज शक्तिशाली देशों की राजनीति के सामने लगभग मौन हैं। सुरक्षा परिषद की वीटो प्रणाली ने न्याय को संतुलित करने के बजाय उसे बंधक बना लिया है।
ग़ाज़ा में बच्चों की लाशें, सीरिया के ध्वस्त शहर, यमन की भूखी आबादी और अफ़्रीका के अंतहीन गृहयुद्ध—ये सब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की असफलता नहीं, बल्कि उसकी प्राथमिकताओं का परिणाम हैं। यह व्यवस्था युद्ध रोकने के लिए नहीं, बल्कि युद्ध को ‘प्रबंधित’ करने के लिए खड़ी की गई है।
रूस और चीन को पश्चिमी वर्चस्व के प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है, किंतु यह प्रतिरोध भी अंततः उसी शक्ति-केंद्रित राजनीति का दूसरा चेहरा है। यूक्रेन युद्ध ने यह साफ़ कर दिया कि रूस भी अपने प्रभाव-क्षेत्र को बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानून और मानवीय मूल्यों को उतनी ही आसानी से नज़रअंदाज़ कर सकता है, जितना अमेरिका करता रहा है।
चीन की आर्थिक और तकनीकी शक्ति ने उसे एक वैकल्पिक ध्रुव के रूप में स्थापित किया है, किंतु दक्षिण चीन सागर, ताइवान और अफ़्रीका में उसकी गतिविधियाँ बताती हैं कि यह विकल्प नैतिक नहीं, केवल रणनीतिक है। विश्व राजनीति आज किसी वैचारिक संघर्ष से नहीं, बल्कि संसाधनों, बाज़ारों और भू-राजनीतिक प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा से संचालित हो रही है।
मध्य-पूर्व इस प्रतिस्पर्धा का सबसे क्रूर मंच बना हुआ है। यह क्षेत्र दशकों से युद्ध, हस्तक्षेप और धार्मिक कट्टरता का शिकार रहा है। ग़ाज़ा में होने वाला नरसंहार केवल इज़राइल-फ़िलिस्तीन का द्विपक्षीय संघर्ष नहीं, बल्कि उस वैश्विक राजनीति का प्रतिबिंब है जिसमें कुछ जीवन अधिक मूल्यवान और कुछ पूरी तरह त्याज्य माने जाते हैं।
जब पश्चिमी देशों के नागरिक मारे जाते हैं, तो पूरी दुनिया शोकाकुल हो जाती है, लेकिन जब फ़िलिस्तीनी, इराक़ी या यमनी बच्चे मारे जाते हैं, तो उसे ‘जटिल स्थिति’ कहकर टाल दिया जाता है। यह चयनात्मक संवेदना ही विश्व राजनीति की सबसे भयावह विशेषता है।
ईरान का प्रश्न भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वहाँ की धार्मिक कट्टरता और आंतरिक दमन अपनी जगह एक गंभीर समस्या है, लेकिन उस पर पश्चिमी आक्रोश और प्रतिबंधों का स्वर तभी तेज़ होता है जब ईरान उनकी रणनीतिक योजनाओं के आड़े आता है। सऊदी अरब जैसे देशों में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की स्थिति पर वही शक्तियाँ अपेक्षाकृत चुप रहती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक राजनीति में नैतिकता स्थायी नहीं, परिस्थितिजन्य है।
वैश्विक दक्षिण—एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका—आज भी इस राजनीति का सबसे बड़ा पीड़ित है। यहाँ की जनता उपनिवेशवाद के बाद भी स्वतंत्र नहीं हो सकी, क्योंकि आर्थिक निर्भरता ने राजनीतिक स्वतंत्रता को खोखला कर दिया। आईएमएफ़ और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ विकास के नाम पर ऐसे ढाँचे थोपती हैं, जो इन देशों को कर्ज़ और असमानता के चक्र में फँसाए रखते हैं।
प्राकृतिक संसाधनों की लूट अब सैन्य आक्रमण से नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट समझौतों और व्यापारिक संधियों के माध्यम से होती है। यह एक नया उपनिवेशवाद है, जो बंदूक की जगह अनुबंध और बाज़ार की भाषा बोलता है।
आज के विश्व नेताओं की भाषा और व्यवहार में भी इस परिवर्तन को साफ़ देखा जा सकता है। राजनीति अब सेवा नहीं, प्रबंधन बन चुकी है। राष्ट्र एक समुदाय नहीं, बल्कि एक कंपनी की तरह संचालित हो रहे हैं, और नागरिक उपभोक्ता में बदलते जा रहे हैं। ट्रंप का उग्र राष्ट्रवाद, पुतिन की सैन्य दृढ़ता, जिनपिंग का नियंत्रित पूँजीवाद और नेतन्याहू की आक्रामक सुरक्षा नीति—ये सब उसी मानसिकता के उदाहरण हैं, जिसमें शक्ति ही अंतिम तर्क है। संवाद, सहानुभूति और समझौता कमजोरी माने जाने लगे हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक क्षति मनुष्यता की हुई है। युद्ध अब असाधारण घटना नहीं रहे, बल्कि समाचार चक्र का एक नियमित हिस्सा बन गए हैं। तस्वीरें बदलती हैं, लाशें बदलती हैं, लेकिन उदासीनता स्थायी हो गई है। मनुष्य अब नागरिक नहीं, आँकड़ा है; शरणार्थी अब पीड़ित नहीं, बोझ है; और मृतक अब व्यक्ति नहीं, ‘कोलैटरल डैमेज’ हैं। यह भाषा केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि सोच का संकेत है।
विश्व राजनीति का संकट अंततः सत्ता का नहीं, संवेदना का संकट है। जब तक वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में मनुष्य को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक किसी नए वर्ल्ड ऑर्डर की बात केवल भ्रम होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति को फिर से नैतिक प्रश्नों से जोड़ा जाए—यह पूछा जाए कि विकास किसके लिए, सुरक्षा किसकी, और शांति किस कीमत पर। यदि यह प्रश्न नहीं उठे, तो आने वाला समय और भी अधिक हिंसक, असमान और अमानवीय होगा।
विश्व राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ से एक रास्ता शक्ति के और अधिक केंद्रीकरण की ओर जाता है, और दूसरा रास्ता सहयोग, न्याय और करुणा की पुनर्स्थापना की ओर। दुर्भाग्य से अब तक चुना गया रास्ता पहले वाला ही है।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि कोई भी व्यवस्था अनंत नहीं होती। जब अन्याय अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो प्रतिरोध जन्म लेता है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या वह प्रतिरोध समय रहते मनुष्यता को बचा पाएगा, या फिर विश्व राजनीति अपने ही भार से ढह जाने के बाद कोई नया, और अधिक पीड़ादायक अध्याय लिखेगी।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)





