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मादुरो का अपहरण अमेरिकी साम्राज्यवाद के उत्थान का नहीं पतन का संकेत 

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जयप्रकाश नारायण 

जिस तरह से रात के अंधेरे में अमेरिकी सेना ने काराकस पर हमला कर के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण किया। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद के उत्थान का नहीं पतन का संकेत  है। यूएसए के पिछवाड़े स्थिति एक छोटे से संप्रभु राष्ट्र पर हमले के समय अमेरिका ने जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों और कानूनों की धज्जियां उड़ाई हैं उसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वजूद में आये सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, कानूनों को अप्रासंगिक बना दिया है। इस समय संयुक्त राष्ट्र संघ, सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अमेरिका के समक्ष असहाय दिख रही हैं और पश्चिमी ताकतों की जेबी‌‌ संस्थाएं बन गयी हैं।

यह पतन आने वाले समय में विश्व शांति के लिए गंभीर चुनौती बनेगा। आश्चर्य है कि विकासशील दुनिया में अमन-शांति चाहने वाले देश इस खतरे को नजरंदाज कर रहे हैं। पिछले 80 वर्षों से अमेरिका ने जिस तरह से पूरी दुनिया में धौंस, धमकी और दादागिरी दिखाते हुए विध्वंसक हमला और नरसंहार किया है। असहमत और भिन्न विचारों वाली व्यवस्था और राष्ट्रों को रौंदा है। वहां के उद्योग व्यापार कृषि प्राकृतिक संपदा पर कब्जे के लिए वहां की सरकारों को गिराया और संस्थाओं को रौंदा है। चुने हुए राष्ट्राध्यक्षों को अपमानित किया है।हत्याएं की हैं और उन देशों में कठपुतली सरकारें बना कर उन देशों को लूटा है। राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद की बांह मरोड़ कर प्रतिबन्ध लगाकर निर्दोष बच्चों औरतों को अन्न दवा के अभाव में मरने के लिए मजबूर किया है। वह तथाकथित पश्चिमी लोकतांत्रिक कहे जाने वाली दुनिया के लिए कलंक की बात है।            ‌ ‌   

महान क्रांतिकारी रोजा लक्जमबर्ग ने एक बार कहा था कि विश्व जनगण को” समाजवाद और बर्बरता में से एक को चुनना होगा।” अपनी समस्त उपलब्धियों मानवीय मूल्यों जैसे आजादी लोकतंत्र मानवाधिकारों को मान्यता व राष्ट्रों की संप्रभुता की स्वीकृति विस्तार और तकनीकी वैज्ञानिक विकास के बावजूद 20 वीं सदी ने अंततोगत्वा बर्बरता को ही चुना। जिसका कुफल आज वेनेजुएला सहित दुनिया के पचासों मुल्क और करोड़ों जनगण भोग रहे हैं। वेनेजुएला पर साम्राज्यवादी अमेरिका की कार्रवाई न आखिरी है न साम्राज्यवादी वर्चस्व के रहते इसके अंत की निकट भविष्य में संभावना है।

साम्राज्यवादी युद्ध विध्वंस और राष्ट्रों के दमन लूट ‌के बगैर जिंदा नहीं रह सकते। क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में दूसरे राष्ट्रों का शोषण और गुलाम बनाने की प्रक्रिया ही साम्राज्यवाद की बुनियादी चारित्रिक विशेषता है। इसके पहले यूएसए के नेतृत्व में साम्राज्यवादी मुल्क लैटिन अमेरिकी देशों चिली पनामा अर्जेंटीना बोलिविया कोलंबिया होंडुरास सल्वाडोर पेरू के साथ-साथ एशिया अफ्रीका यूरोप में अनेकों देशों में नरसंहार और राष्ट्र- राज्यों का विनाश कर चुके हैं। 21वीं सदी में ही‌ इराक अफगानिस्तान सीरिया लीबिया फिलिस्तीन जैसे न जाने कितने ऐसे देश हैं जिन्हें रौंदते हुए वे एक बार फिर अपने पुश्तैनी लूट वाले लैटिन अमेरिकी देशों में लौट आए हैं। 

लैटिन अमेरिका में सर्वप्रथम कैरेबियन द्वीप समूह के देश क्यूबा से शुरू हुई समाजवादी क्रांति चिली कोलंबिया होंडुरास अल सल्वा डोर होते हुए वेनेजुएला पहुंची है। इनमें से कई देशों को नरसंहार झेलना पड़ा है और चुने हुए राष्ट्रपतियों की कुर्बानी देनी पड़ी है। लेकिन आश्चर्य है कि लैटिन अमेरिकी जनता की आजादी बराबरी लोकतंत्र और संप्रभुता की आकांक्षा को अमेरिकी बमबाज कुचल नहीं सके हैं। 21वीं सदी की प्रथम चौपाई खत्म होते-होते लगता है इतिहास 20वीं सदी के सत्तर के दशक में वापस लौट आया है।

जब विश्व भर में करोड़ों जन गण साम्राज्यवादी लूट और प्रभुत्व के खिलाफ एकजुट होकर नई दुनिया बनाने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन में उतर आए थे। उस समय लैटिन अमेरिका के क्यूबाई क्रांतिकारी फीडेल कास्त्रो और चे ग्वारा दुनिया के कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों के प्रेरणा स्रोत थे।आज के समय में क्यूबा के साथ-साथ वेनेजुएला भी साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व कर रहा था। इसलिए 1999 से ही अमेरिकी साम्राज्यवादी बेनेजुएलाई जनता को दंडित करने का षड्यंत्र रचने लगे थे।

ट्रम्प अमेरिकी साम्राज्यवाद के ढलान के काल में अमेरिका फर्स्ट के धुर दक्षिणपंथी उन्मादी नारे के साथ कॉरपोरेट घरानों के नग्न समर्थन से सत्ता में लौटे हैं। तभी से लगने लगा था कि आस-पास के छोटे संप्रभु मुल्कों की स्वतंत्रता, संप्रभुता के लिए खतरा पैदा होने जा रहा है। अपने चुनाव अभियान में ट्रंप ने कनाडा को यूएसए का एक और स्वायत्त प्रदेश बनाने और ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने का ऐलान किया था।

उस समय विश्व जनगण के साथ अमेरिकी जनता ने भविष्य की खतरे की गंभीरता को नहीं समझा। सत्ता में आते ही ट्रम्प ने पहले ट्रेड वार शुरू किया। भारत ब्राजील दक्षिण अफ्रीका चीन जैसे देशों के ऊपर मनमाना टैरिफ बढ़ा दिया। भारत जैसे देशों को अमेरिकी कारपोरेट कम्पनियों के हित में समझौता करने के लिए दबाव बनाता रहा। लेकिन ट्रंप का यह हथियार चीन तक जाते-जाते कुंद हो गया।

इसके बाद ट्रम्प को शांति का मसीहा बनने की सनक सवार हुई। पहलगाम के बाद भारत द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के चौथे दिन अचानक ट्रंप ने दुनिया को बताया कि उसने दोनों देशों को युद्ध विराम के लिए तैयार कर लिया है। उन्होंने व्यापार का दबाव देकर युद्ध विराम कराने का दावा किया। इसके बाद ढाई साल से चल रहे फिलीस्तीन इजरायली संघर्ष तथा यूक्रेन रूस युद्ध को मध्यस्थता द्वारा रुकवाने की घोषणा की। लेकिन प्रत्येक मोर्चे पर असफलता का स्वाद चखने के बाद “ट्रंप नामक शांति दूत वेनेजुएला में तेल लेने पहुंच गया है।”

यह सच है कि साम्राज्यवादी चाहे कितना ही शांति और सहयोग की बात करे। अंततोगत्वा वह प्रभुत्व और युद्ध की राह से ही अपने साम्राज्य की रक्षा कर सकता है। गहरे आर्थिक राजनीतिक संकट से जूझता हुआ यूएसए का युद्ध उन्मादी राष्ट्रपति बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जंगी  बेड़े के साथ दुनिया के संसाधनों की लूट के लिए संप्रभु स्वतंत्र राष्ट्रों के आखेट पर निकल पड़ा है। जिसका पहला शिकार वेनेजुएला हुआ। वित्तीय पूंजी की उच्चतम विनाश कारी अवस्था साम्राज्यवाद के लूट और विस्तार का यही ध्रुव सत्य है।

ट्रंप को पता है कि अब दुनिया एक ध्रुवीय नहीं रही। बीसवीं सदी के नब्बे के दशक में बने वैश्विक शक्ति संतुलन में परिवर्तन हो चुके हैं। अब दुनिया एक ध्रुवीय नहीं रही। ट्रंप ने हिकारत के साथ कहा था कि जी -7 या जी- 20 नामक कोई समूह का अस्तित्व विश्व में नहीं है। अब सिर्फ जी-2 ही हैं।

21वीं सदी में जब सात देशों ने मिलकर ब्रिक्स का निर्माण किया था तब अमेरिकी छतरी तले रहने वाले यूरोपीय देशों ने इस परिघटना को गंभीरता से नहीं लिया। आज ब्रिक्स के बैनर तले 20 के करीब देश संगठित हैं। जिसमें नए राष्ट्रों के शामिल होने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। वर्तमान में अमेरिकी सैन्य रणनीति के तहत रहने वाले कई देश जैसे इंडोनेशिया साउथ कोरिया भी ब्रिक्स का सदस्य बने बन चुके हैं। इसमें अधिकांश देश पृथ्वी के दक्षिणी भाग में स्थित है।

इसलिए इन्हें ग्लोबल साउथ कहा जा रहा है। ग्लोबल साउथ उभरती अर्थव्यवस्था हैं। जिससे अमेरिकी ब्लॉक को गंभीर चुनौती मिल रही है। आज दुनिया की जीडीपी का लगभग 45% ग्लोबल साउथ के देशों से आता है। जो विश्व बाजार की अधिकांश उपभोक्ता जरूरतों को पूरा करते हैं। ग्लोबल साउथ की सम्पूर्ण जीडीपी में लगभग आधी चीन से आती है। आज अकेले चीनी अर्थव्यवस्था यूरोपीय यूनियन से बड़ी हो चुकी है।      

यूएसए लैटिन अमेरिका को अपना संरक्षित क्षेत्र मानता है। एक लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील ब्रिक्स के संस्थापक देशों में है। उस समय ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डीसिल्वा थे।जो प्रगतिशील वाम विचार धारा वाले नेता थे।लूला को सत्ता से हटाए के लिए यूएसए के सभी दलों के राष्ट्रपतियों ने सम्पूर्ण शक्ति लगा दी थी। एक धुर दक्षिणपंथी तानाशाह बोलसोनारो को चुनाव जिताया गया था। जिसमें अमेरिकी कारपोरेट कम्पनियों के लिए विश्व का फेफड़ा कहे जाने वाले अमेजन घाटी के जंगलों इन्हीं कम्पनियों के हवाले कर दिया था। जहां लाखों जनजातियां रहती है।

जंगलों को बड़े पैमाने पर जलाया गया।कांटा गया और इंडीजेनस समूहों का नर संहार किया गया। यही नहीं लूला के ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया। आज लूला डीसिल्वा ब्राजील के राष्ट्रपति हैं और चुनाव हारने के बाद बोलसेनारो विद्रोह और अराजकता द्वारा राष्ट्रपति की कुर्सी पर काबिज रहना चाहता था। उस समय यूएसए ने बोलसनारो को पूर्ण समर्थन दिया था। चुनाव को ग़लत तरीके से जीता हुआ कहा था। लेकिन जब लाखों ब्राजीली नागरिकों ने राजधानी ब्रसीलिया को घेर लिया तो वह भागकर ट़्प के गृहराज्य में जाकर बस गया।बोलसनारो भी ट्रंप के जिगरी दोस्त हैं।यह एक प्रसंग है जिसकी रोशनी में हम लैटिन अमेरिकी देशों में यूएसए की भूमिका को देख सकते हैं।

साम्राज्यवादी देशों के तीन हथियार हैं।जिनका प्रयोग वे वाम, प्रगतिशील और सच्चे राष्ट्रवादी नेताओं सरकारों के खिलाफ खुलकर प्रयोग करते हैं।एक – लोकतंत्र विरोधी तानाशाह कहना ।दूसरा- मिथ्या और कूट रचित तथ्यों के साथ प्रचार युद्ध। तीसरा- अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद पर दबाव डाल कर प्रतिबंध लगाने से लेकर युद्ध थोपना। आईएमएफ, विश्व बैंक और डबल्यूटीओ आदि हथियार के बतौर प्रयोग। जैसे इराक, ईरान, वेनेजुएला आदि। 

जब 1999 में ह्यूगो शावेज वेनेजुएला के राष्ट्रपति चुने गए। तभी से यूएसए वेनेजुएला के खिलाफ प्रचार युद्ध छेड़े हुए है। आरोप वही चिरपरिचित कि बेनेजुएला में लोकतंत्र खत्म हो गया है और शावेज़ तानाशाह हैं। पहले अमेरिकी एजेंटों द्वारा तख्ता पलट कराने का प्रयास हुआ। जब जन गोलबंदी ने तख्ता पलट को नाकाम कर दिया। तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर दबाव डाल कर प्रतिबंध लगाये गये। क्योंकि शावेज़ सरकार ने लुटेरी अमेरिकी तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।

अपने शुरुआती चार वर्ष के कार्यकाल में सरकार गरीबी उन्मूलन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने में भारी प्रगति की थी। जब प्रतिबंध थोपे गए तो वेनेजुएला के तेल का निर्यात घटकर 20% रह गया। कोरोना डॉलर के वेनेजुएलाई तेल टैंकर जब्त कर लिए गए। बाद में इस पैसे को विपक्षी नेता मारिया मचाओ को चुनाव लड़ने के लिए दिया गया। इस लिए जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। फिर भी सम्पूर्ण देश को अमेरिकी षड्यंत्र के प्रति जागरूक करते हुए वेनेजुएलाई सरकारें देश को आत्मनिर्भर विकास के राह पर आगे बढ़ाने में सफल रहीं। आर्थिक गैर बराबरी घाटी और मैन्युफैक्चरिंग तथा सेवा क्षेत्र का विस्तार हुआ। इसलिए‌ हताश ट्रंप सरकार सैन्य कार्रवाई पर उतर आई।

पश्चिमी मीडिया राष्ट्रपति मादुरो के खिलाफ प्रचार युद्ध छेड़े हुए है। हम जानते हैं कि विश्व की लगभग 90% खबरें अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया से छनकर आती हैं। भारतीय नागरिक मोदी सरकार आने के बाद मीडिया की भूमिका से वाकिफ हैं कि कैसे और किस दृष्टि कोण और लक्ष्य को ध्यान में रख कर खबरें गढ़ीं और परोसी जाती हैं। 

1917 में रूस में हुई बोल्शेविक क्रांति के बाद से विश्व साम्राज्यवादी मीडिया प्रगतिशील क्रांतिकारी आंदोलन का चरित्र हनन करते हुए उसके नेताओं को तानाशाह कहता रहा है। इसकी हजारों नज़ीर मौजूद हैं। अमेरिकी सरकार साठ के दशक से लैटिन अमेरिकी कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के खिलाफ ड्रग  सप्लाई जैसे कामों में लिप्त होने का आरोप लगाती रही है। यह एक महान उद्देश्य के लिए जिंदगी दांव पर लगा कर चलाए जाने वाले मुक्ति संघर्षों को विकृत और बदनाम करने की सोची समझी रणनीति का अंग है। जिसे हम भारत में भी देखते हैं।वही मादुरो के साथ सचेतन और योजना बुद्ध तरीके से हो रहा है। इस समाजवादी प्रचार के झांसे में भारत के कई प्रगतिशील और लोकतांत्रिक लोग भी फंस जाते हैं।

दूसरा वेनेजुएला के उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रीगेज के बारे में चलाए गए झूठे अभियान से भी आप इस हकीकत को समझ सकते हैं । पहले दिन ऐसी खबर चलाई गई की एजेंसी ट्रंप के सामने झुक गई है। उनके पिता महान कम्युनिस्ट शहीद जार्ज रोड्रीगेज हैं। वेनेजुएला की अमेरिकी पपेट सरकार ने उन्हें 1975 में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था और 1976 में जेल में यातना देकर उनकी हत्या कर दी गई थी। वे एक शहीद कम्युनिस्ट क्रांतिकारी जार्ज रोड्रीगेज की बेटी हैं।

जिन्हें वेनेजुएला में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी शहीदों का जैसा दर्जा प्राप्त है। जब उनके पिता की हिरासत में हत्या हुई थी। तो डेल्सी सिर्फ सात साल की थीं और उनका भाई उनसे भी छोटा था। उपराष्ट्रपति डेल्सी ने अपने पिता की महान राष्ट्रवादी विरासत को बुलंद करते हुए अमेरिका को चुनौती दे डाली कि दु्निया की कोई भी ताकत वेनेजुएला को अपना उपनिवेश नहीं बना सकता है। राष्ट्रपति पद के शपथ लेने के बाद उनकी इस घोषणा से ही दुनिया भर के कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया की जुबान बंद हो गई है। अब ट्रंप डेल्सी रोड्रीगेज को भी धमकाने पर उतर आया है और कह रहा है कि उनके अंजाम मादुरो से भी बुरा होगा।

दूसरी तरफ वेनेजुएला में विपक्ष की नेता मारिया मचाओ एक अरब पति की बेटी हैं। जो शुरू से ही अमेरिकी दलाल परिवार रहा है। इसलिए अमेरिका पूरी ताकत लगाकर मारिया को वेनेजुएला का राष्ट्रपति बनना चाहता है। अगर ऐसा होता है तो उस इतिहास की पुनरावृत्ति होगी।जैसा प्लासी के युद्ध के बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनने के साथ हुआ था और भारत अंग्रेजों का गुलाम बन गया। आज अमेरिका मारिया मचाओ को आगे कर नए तरह की गुलामी वेनेजुएला पर थोपना चाहता है। वर्तमान साम्राज्यवादी पूंजी के दौर की गुलामी  सूक्ष्म और अदृश्य है।

इसके हजारों तरह के वायरस तो हैं। जो मनुष्य के दिलो दिमाग और जीवन प्रणाली में प्रवेश कर जाते हैं।  आम नागरिक कारपोरेट दौर के गुलामी की जंजीर को सामान्य दृष्टि से समझ नहीं पता।हम जानते हैं कि लातिन अमेरिका के हर दूसरे घर में एक न एक अमेरिकी एजेंट पलता है। तथा सामाजिक राजनीतिक संस्थानों और राज्य मशीनरी के अंदर अमेरिकी कम्पनियों  के दलाल बैठे हैं।इसी नेटवर्क  और पूंजी की अदृश्य शक्ति के बल पर आज भी अमेरिकी दबदबा लैटिन अमेरिका और दुनिया पर  कायम है और कई देशों में अमेरिकी कठपुतली सरकारी बनी हुई है।

 अमेरिका वेनेजुएला के तेल और खनिज संपदा के लूट के लिए एक बार फिर वहां कठपुतली सरकार बनाने की कोशिश में  बेशर्मी और ढिठाई के साथ उत्तर पड़ा है। इसलिए लैट्रिन अमेरिका के करोड़ों जनगण अमेरिकी गुलामी के खतरे को गंभीरता से समझ रहे हैं और अपने देश के संप्रभुता एकता आजादी की सुरक्षा के लिए नए स्वतंत्रता संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ गई है। यह संघर्ष शायद अतीत के सभी अनुभव से ज्यादा दर्दनाक त्रासद होने के साथ साथ महान रचनात्मक संभावनाओं भरा हुआ  है।

Ramswaroop Mantri

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