24 मौतों का कलंक धोने के लिये अब जरूरी है कि मतभेद भुलाकर सारे जनप्रतिनिधि सरकार पर दबाव बनाएं
🔺कीर्ति राणा
इंदौर। भागीरथपुरा जहरीला पानी कांड में अब तक 23 निर्दोषों की मौत शहर के माथे पर कलंक ही है।ऐसी घटना शहर के किसी अन्य वार्ड में नहीं हो, पूरा शहर कहीं भागीरथपुरा ना बन जाए इसके लिये जरूरी है कि मेट्रोपोलिटन सिटी बनने वाले इंदौर में स्वावलंबी जल-मल प्राधिकरण का गठन किया जाए। मुख्यमंत्री इस शहर के प्रभारी हैं, भागीरथपुरा की घटना को लेकर चिंतित भी हैं ऐसे में नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट के साथ ही सांसद लालवानी, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, पूर्व महापौर मोघे, मालिनी गौड़, उमाशशि शर्मा, नौ ही विधायक, भाजपा महामंत्री रणदिवे अपने राजनीतिक अंह को भुलाकर सरकार पर दबाव बनाएं कि मप्र में सबसे पहले इंदौर में इसका गठन किया जाए।
‘जल त्रासदी मांग रही बेहतर जल प्रबंधन’ को लेकर शहर के प्रबुद्धजन और विषय विशेषज्ञों की बैठक में कहा गया कि भविष्य में इंदौर के लोगों को दूषित पानी से मुक्ति दिलाने हेतु तथा पुनः जान लेवा जल त्रासदी का सामना नहीं करना पड़े, इस हेतु बेहतर जल प्रबंधन होना अति आवश्यक है।
इस संबंध में इंदौर उत्थान अभियान द्वारा पूर्व में बहुत प्रयास किए गए, प्रशंसा भी हुई लेकिन इस प्रकार की व्यवस्था निर्मित नहीं की गई और बेहद दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि अति दुखद जान लेवा दुष्परिणाम शहर के नागरिकों को भुगतना पड़े हैं।
इस बैठक में अजीत सिंह नारंग ने पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से स्वावलंबी जल-मल प्राधिकरण का गठन क्यों जरूरी है यह तो बताया ही साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इसके गठन में सरकार को कुछ खर्च नहीं करना पड़ेगा। इसके लिये शहर ही अपने बलबूते पर धनराशि जुटा सकता है।
नारंग ने बताया कि इन्दौर में व्याप्त जलसंकट के अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि नर्मदा से पर्याप्त जल प्राप्त होने के बावजूद लोगों को प्रतिदिन पर्याप्त एवं सुरक्षित पानी प्राप्त नहीं हो रहा है एवं जनता को जल संकट से जूझना पड़ रहा है। सम्पूर्ण जल प्रदाय व्यवस्था का विस्तृत तकनीकी, आर्थिक एवं प्रबंधन की दृष्टि से अध्ययन किया और जिन कमियों को हमने पाया उनका विवरण इस प्रकार है :
•स्थानीय नगरीय स्वायत्त संस्थाओं की कमजोर वित्तीय स्थिति। •प्रदाय की जा रही सेवाओं के उत्पादन एवं उपभोग खर्च में भारी असमानता।•स्थानीय निकाय संस्थाओं में संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों एवं अनुभवी व्यक्तियों का न होना। •प्रभावशाली रख-रखाव का न होना।•वितरण व्यवस्था का दोषपूर्ण होना।•जल पुर्नभरण के प्रभावी प्रयास नही होना।•उपयोग में लाये गये जल का संशोधित कर पुर्नउपयोग नहीं होना।
इन्दौर जल प्रदाय एवं मल निकासी व्यवस्था के अध्ययन के दौरान दल ने यह पाया कि बेहतर प्रबन्धन नहीं होने के कारण आज से 15 वर्ष पूर्व प्रतिवर्ष रुपये 26 करोड़ का होने वाला घाटा बढ़कर अब रुपये 140 करोड़ हो गया है। 140 करोड़ का घाटा कम करने एवं बेहतर प्रबन्धन व्यवस्था स्थापित करने हेतु अध्ययन दल द्वारा निम्नलिखित अध्ययन किये गये।
🔹तकनीकी अध्ययन के अन्तर्गत : लीकेजेस-लासेस प्रूफ व्यवस्था कायम करना, बिना मोटर लगाये तीसरी मंजिल तक पानी पहुंचाना, जल की बर्बादी रोकने हेतु मीटरिंग व्यवस्था कायम करना, जल-शुद्धीकरण के खर्च में कमी करने हेतु डबल पाईप लाईन व्यवस्था कायम करना, पर्याप्त वर्षा होने के पश्चात भी, पानी का उचित मात्रा में संग्रहण नहीं होना (रिचार्जिग), रिसायकलिंग पद्धति से जल का पुर्नउपयोग नहीं होना तथा जल की बर्बादी को रोकने हेतु जल-बचत की शिक्षा का प्रचार नहीं होना इत्यादि मुख्य मुद्दे थे।
🔹आर्थिक अध्ययन के अन्तर्गत : आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर विपरित वित्तिय प्रभाव न पड़े, ऐसी जल-दर नीति का निर्धारण करना, घरेलू व्यवसायिक एवं औद्योगिक जल-दरों का निर्धारण इस प्रकार करना कि पूर्ण जल प्रदाय एवं मल निकासी व्यवस्था स्वावलम्बी अर्थात बिना लाभ-हानि के संचालन करने वाली कायम हो जावें।
🔹प्रबंधन व्यवस्था अध्ययन के अन्तर्गत : यह निष्कर्ष निकला कि कुशल तथा अनुभवी इंजिनियर्स, वित्तिय विश्लेषक, अर्थशास्त्री, विधि, हूमन रिलेशन तथा जनसम्पर्क क्षेत्र के विशेषज्ञ किसी भी योजना के सफल संचालन के प्रमुख स्तंभ होते है। अतः इन स्तंभों से सुसज्जित संस्था के निर्माण की आवश्यकता है जिसकी छत के नीचे जल-प्रदाय एवं मल-निकासी की सारी गतिविधियां संचालित हो सके।
🔴 जल प्रबंधन की सही नीति बनाना जरूरी
अध्ययन यह दर्शाते हैं कि जब तक जल प्रबंधन की सही नीति नहीं बनाई जाएगी और उस पर उतनी ही तत्परता से अमल नहीं किया जाएगा तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। देश-प्रदेश एवं शहर हर दिन इस संकट से घिरते जा रहे है लेकिन समस्याओं के हल के प्रति चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। जल को लेकर एक खास तरह की उदासीनता का भाव सिर्फ सरकारी स्तर पर ही नहीं है बल्कि समाज में भी जल प्रबंधन को लेकर एक खास तरह की उदासीनता दिखती है। यही वजह है कि पानी की समस्या दिनोंदिन गहराती जा रही है।
गहराते जल संकट के लिए काफी हद तक पानी बर्बादी भी जिम्मेवार है। यहां जल आपूर्ति की व्यवस्था में काफी खामियां हैं। नलों के जरिए घरों तक पहुंचने वाले पानी का एक बड़ा हिस्सा रिस कर बर्बाद हो जाता है। हर शहर में फूटी हुई आपूर्ति पाइप लाइनों को आसानी से देखा जा सकता है। इस बदहाल व्यवस्था के लिए सरकार के साथ-साथ सामान्य लोग भी कम जिम्मेदार नहीं है। एक तरफ तो सरकार पेयजल के नाम पर हर साल हजारों करोड़ रूपये का बजट बनाती है और सरी तरफ जमीनी स्तर पर हालात में कोई बदलाव नहीं दिखता है।
सामाजिक तौर पर भी जल संरक्षण लेकर जागरूकता का अभाव दिखता है। यह सामाजिक ताने-बाने का ही असर है कि लोग कहीं भी न की बर्बादी को देखकर उसे सामान्य घटना मानते हुए नजरअंदाज कर देते है।
बेहतर प्रबन्धन व्यवस्था स्थापित करने के अंतर्गत वर्तमान व्यवस्था को संशोधित कर सामान्य व्यवस्था के रूप में परिवर्तित करना होगा। द्वितीय चरण में सामान्य व्यवस्था को उत्कृष्ट व्यवस्था में परिवर्तित करना होगा।
प्रथम चरण में सामान्य व्यवस्था/संशोधित व्यवस्था कायम करने हेतु हमें स्वावलम्बी जल-मल प्राधिकरण का गठन कर सर्वप्रथम आवश्यक व्यवस्थाओं में संशोधन करने हेतु सभी प्रकार के लीकेजेस दूर करने के साथ-साथ प्रत्येक घर में तीसरी मंजिल तक बिना मोटर लगाये पानी पहुंचने की तकनीकी व्यवस्था का डिजाईन क्रियान्वयन करना होगा। इस हेतु विस्तृत प्राक्कलन तैयार कर वित्तीय प्रबंधन भी प्राधिकरण को ही करने होंगे।
इस बात को भी ध्यान रखना होगा कि प्रत्येक घर में सुरक्षित पानी ही पहुंच रहा है। ग्राहिता से बिना लाभ हानि के जलदर निर्धारण कर प्रदाय की जा रही जल मात्रा के अनुसार मीटरिंग व्यवस्था कायम कर जलदर वसूल करने हेतु उचित व्यवस्था भी कायम करनी होगी।
द्वितीय चरण में सामान्य व्यवस्था/संशोधित व्यवस्था को उत्कृष्ट व्यवस्था में कायम करने हेतु रिर्चाजिंग, रिसायकलिंग, डबल पाईप सिस्टम, जल बचत के तौर तरीकों का प्रचार–प्रसार, जल स्त्रोतों कुएं, बावडियां, तालाब, झील इत्यादि को प्रदूषण तथा अतिक्रमण से बचाना, वाटर आडिट इत्यादि कार्य करने होगे।अध्ययन यह दर्शाता है कि उत्कृष्ट व्यवस्था कायम करने के पश्चात हमें नर्मदा से 50 प्रतिशत जल ही लाना होगा।





