इंदौर में लगे करीब 550 मोबाइल टॉवरों से करोड़ों रुपए की रेवेन्यु चोरी हुई है। टॉवर संचालकों ने स्टाम्प ड्यूटी नहीं चुकाई है। रजिस्ट्रार ऑफिस पिछले माह से निगम से अधिकृत जानकारी मांग रहा है मगर निगम है कि जानकारी देने को तैयार नहीं है। विभाग करीब पांच करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी चोरी होने की आशंका है।
पांच करोड़ की स्टाम चोरी का लगाया अनुमान पत्र लिखे, फोन किए पर कोई असर नहीं हुआ
इंदौर।इंदौर नगर निगम सीमा में जहां एक ओर तमाम नियमों को दरकिनार कर धड़ल्ले से मोबाइल टॉवर लगाए जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर इन टॉवरों के संचालकों ने करोड़ों की स्टाम्प ड्यूटी भी नहीं चुकाई है।
मोबाइल टॉवर लगता है उसकी अनुमति के लिए नगर निगम और संबंधित संचालकों के बीच एक करार होता है। एक माह से रजिस्ट्रार ऑफिस निगम से टॉवरों के अनुबंध की जानकारी मांग रहा है।
आज तक एक बार भी नहीं दी ड्यूटी
मोबाइल टॉवर संचलालकों और नगर निगम में जितनी रकम का करार होता है उसकी कुल शुल्क के 01 प्रतिशत राशि स्टाम्प ड्यूटी चुकानी होती है। नगर निगम को यह स्टाम्प ड्यूटी टॉवर संचालकों से लेकर रजिस्ट्रार ऑफिस में जमा करवाना थी। इंदौर में करीब 550 मोबाइल टॉवर लगे हुए हैं मगर संबंधितों ने आज तक उक्त स्टाम्प ड्यूटी नहीं चुकाई। रजिस्ट्रार ऑफिस मार्च के आखिर में जैसे ही अपनी स्टाम्प ड्यूटी वसूली में जुटा तो निगम सीमा में लगे मोबाइल टॉवर का मामला सामने आया। इस मामले में विभाग को पुख्ता जानकारी है कि इसमें स्टाम्प ड्यूटी की चोरी हुई है। इसके बाद से ही विभाग अप्रैल में ही मोबाइल टॉवरों और नगर निगम के बीच हुए करार की कॉपी मांग रहा ताकि वह चोरी हुई स्टाम्प ड्यूटी का केलकुलेशन कर सके। इसके बाद वसूली की कार्रवाई की जाएगी।
काट नहीं पाया अपनी रकम
नगर निगम ने तंग हालत से निपटने के लिए 200 करोड़ से अधिक की रकम रजिस्ट्रार ऑफिसर से ले ली। यह वह 1 प्रतिशत स्टाम्प शुल्क की राशि थी जो निगम के नाम पर रजिस्ट्रार ऑफिसर ने वसूली थी। इसी दौरान रजिस्ट्रार ऑफिस में मोबाइल टॉवर की जानकारी भी मांगी गई थी। दरअसल अफसर चाहते थे इस जानकारी के आने के बाद वे अपने हिस्से की रकम उक्त संबंधित सहायता में एडजेस्ट कर लें। मगर जानकारी नहीं मिलने पर यह नहीं हो सका।
नगर निगम को यह थी आशंका
रजिस्ट्रार ऑफिस कई पत्र लिख चुका है। कमिश्नर सहित कई अफसरों से निजी तौर पर बात भी की है। निगम अफसर टॉवरों को लेकर हुए करार की जानकारी देने को तैयार नहीं है। निगम को डर है कि पहले ही उसकी तंग हालत है, ऐसे में जो राशि उसे मिलना है उसकी कटौत्री न हो जाए।





