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हर की पैड़ी क्षेत्र में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर रोक…भारत के लोकतांत्रिक चरित्र, संवैधानिक नैतिकता और धार्मिक सहिष्णुता की परीक्षा

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हर की पैड़ी पर प्रवेश का प्रश्न केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं है। यह उस भारत की आत्मा की परीक्षा है, जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, उदार और लोकतांत्रिक मानता है। गंगा किसी से धर्म नहीं पूछती; वह सबको समान रूप से जीवन देती है। भारतीय संविधान भी नागरिकों के बीच धार्मिक आधार पर भेदभाव को अस्वीकार करता है। फिर प्रश्न यह है—यदि गंगा और संविधान दोनों समावेशी हैं, तो हर की पैड़ी पर निषेध क्यों?समाधान टकराव में नहीं, बल्कि संवाद, विवेक और समन्वय में है—ऐसे समन्वय में जो परंपरा का सम्मान करे, लेकिन संविधान की सर्वोच्चता और भारत की उदार वैश्विक छवि को अक्षुण्ण भी रखे।

जयसिंह रावत

हरिद्वार के हर की पैड़ी क्षेत्र में गैर  हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की श्री गंगा सभा की हालिया पहल ने देश में एक गहरे संवैधानिक, सामाजिक और नैतिक विमर्श को जन्म दे दिया है। यह विवाद केवल किसी धार्मिक संस्था के अधिकार या परंपरा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक चरित्र, संवैधानिक नैतिकता और धार्मिक सहिष्णुता की परीक्षा भी है।

यह पहली बार है कि स्वतंत्र भारत में, 1950 में संविधान लागू होने के बाद, औपनिवेशिक काल के किसी नियम को इस प्रकार सार्वजनिक रूप से पुनर्जीवित कर लागू करने का प्रयास किया गया हो। प्रश्न केवल इस प्रतिबंध के समय का नहीं है, बल्कि इसके औचित्य, वैधानिकता और निहितार्थों का भी है।

हरिद्वारएक नगर नहींसभ्यता का प्रतीक

हरिद्वार कोई साधारण शहर नहीं है। यह भारतीय सभ्यता की जीवंत धरोहर, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। गंगा के तट पर स्थित हर की पैड़ी को करोड़ों श्रद्धालु मोक्ष, पुण्य और आत्मिक शांति का द्वार मानते हैं। यहाँ न केवल हिंदू, बल्कि देश-विदेश से आए अनेक गैर-हिंदू पर्यटक, शोधकर्ता और आध्यात्मिक जिज्ञासु भी गंगा के दर्शन के लिए आते रहे हैं।

ऐसे सार्वभौमिक महत्व के स्थल पर “अहिंदू प्रवेश निषेध” जैसे बोर्डों का लगना स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न खड़े करता है। क्या यह स्थान किसी एक समुदाय की निजी संपत्ति है, या यह एक सार्वजनिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरोहर है?

औपनिवेशिक पृष्ठभूमिआस्था की रक्षा या प्रशासनिक नियंत्रण

श्री गंगा सभा अपने निर्णय का आधार 1916 के उस समझौते को बताती है, जो पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार और हिंदू प्रतिनिधियों के बीच हुआ था। उस समय गंगा की अविरल धारा, घाटों की पवित्रता और धार्मिक मर्यादाओं की रक्षा का प्रश्न औपनिवेशिक शासन की नीतियों से जुड़ा हुआ था। इसी क्रम में 1935 के हरिद्वार नगर पालिका उपनियमों की धारा 20 में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का प्रावधान किया गया।

किंतु यह याद रखना आवश्यक है कि 1935 का भारत, भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधीन था, जो ब्रिटिश संसद द्वारा बनाया गया औपनिवेशिक संविधान था। उस दौर में धार्मिक समुदायों को अलग-अलग अधिकार देना ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का हिस्सा था। ऐसे नियमों का उद्देश्य सामाजिक समरसता नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियंत्रण और साम्राज्यवादी हितों की रक्षा था।

स्वतंत्रभारत और संविधान की सर्वोच्चता

26 जनवरी 1950 को भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बना। भारतीय संविधान ने नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा की गारंटी दी। संविधान का अनुच्छेद 13 स्पष्ट रूप से कहता है कि स्वतंत्रता-पूर्व के सभी कानून, यदि वे मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हैं, तो वे स्वतः निरस्त माने जाएंगे। इस दृष्टि से 1935 के नगर पालिका उपनियमों की संवैधानिक वैधता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

यदि कोई नियम धर्म के आधार पर सार्वजनिक स्थान पर नागरिकों के साथ भेदभाव करता है, तो वह अनुच्छेद 14 और 15 का सीधा उल्लंघन है।

संवैधानिक द्वंद्वअनुच्छेद 15 बनाम अनुच्छेद 26

इस विवाद का मूल भारतीय संविधान के दो अनुच्छेदों के बीच संतुलन में निहित है। अनुच्छेद 15 राज्य को धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ सार्वजनिक स्थलों पर भेदभाव करने से रोकता है। नदी घाट, विशेषकर वे जो नगर पालिका क्षेत्र में आते हैं और जिनका रखरखाव सार्वजनिक धन से होता है, स्पष्ट रूप से ‘सार्वजनिक स्थल’ हैं।

दूसरी ओर, अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है। किंतु यह अधिकार भी पूर्ण नहीं है; यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। प्रश्न यह है कि क्या हर की पैड़ी जैसे घाट, जो पर्यटन, नगर प्रशासन, कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े हैं, किसी एक धार्मिक संस्था की निजी संपत्ति माने जा सकते हैं? अधिकांश संवैधानिक विशेषज्ञ इस पर नकारात्मक मत रखते हैं।

हिंदू’ की परिभाषा और समावेशिता

संविधान के अनुच्छेद 25 के स्पष्टीकरण में स्पष्ट किया गया है कि सिख, जैन और बौद्ध भी हिंदू धर्म की व्यापक श्रेणी में आते हैं। यदि “अहिंदू प्रवेश निषेध” के बोर्ड इन समुदायों को भी प्रतिबंधित करते हैं, तो यह न केवल संवैधानिक उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक रूप से भी गंभीर विभाजन को जन्म देता है। इसके अतिरिक्त, सनातन परंपरा की आत्मा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, संपूर्ण विश्व एक परिवार है, की भावना पर आधारित है।

ऐसे में प्रवेश निषेध की यह संकीर्ण सोच न केवल संविधान, बल्कि हिंदू दर्शन की उदार और समावेशी परंपरा के भी विपरीत दिखाई देती है।

बदलता भूगोलबढ़ती चुनौतियाँ

1935 में हरिद्वार का भौगोलिक और प्रशासनिक क्षेत्र सीमित था। आज कुंभ और अर्धकुंभ के दौरान मेला क्षेत्र ऋषिकेश से देवप्रयाग तक फैल जाता है। यह पूरा क्षेत्र अस्थायी रूप से एक विशाल प्रशासनिक इकाई में बदल जाता है, जहाँ सुरक्षा, स्वास्थ्य और व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य के हाथ में होती है। जब घाटों के निर्माण, सौंदर्यीकरण और सुरक्षा पर करोड़ों रुपये का सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है, तब किसी एक संस्था द्वारा धार्मिक आधार पर प्रवेश निषेध लागू करना न तो व्यावहारिक है और न ही नैतिक।

गांधी का दृष्टिकोणपवित्रता का वास्तविक अर्थ

महात्मा गांधी ने तीर्थों की पवित्रता को हमेशा आचरण से जोड़ा, न कि बहिष्कार से। उनका मानना था कि यदि कोई व्यक्ति तीर्थ स्थल पर संयम, स्वच्छता और मर्यादा का पालन नहीं करता, तो उसे वहाँ रहने का नैतिक अधिकार नहीं है—चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो। गांधी के अनुसार पवित्रता दूसरों को बाहर रखने से नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर से शुद्ध करने से आती है। यह विचार वर्तमान विवाद को एक गहरा नैतिक आयाम देता है।

राजनीतिप्रशासन और चुनिंदा कड़ाई

यह भी संयोग नहीं है कि दशकों से सुप्त पड़े 1916–1935 के उपनियम अचानक सार्वजनिक पोस्टरों के रूप में प्रकट हो गए हैं। आज़ादी के बाद लंबे समय तक प्रशासन ने इन्हें ठंडे बस्ते में रखा, क्योंकि वे संविधान की भावना के विपरीत प्रतीत होते थे। अब प्रशासन यह कहकर पल्ला झाड़ रहा है कि “यह गंगा सभा का निजी मामला है” या “वे केवल पुराने नियमों की याद दिला रहे हैं।”

यह ‘सेलेक्टिव एन्फोर्समेंट’ अक्सर सत्ता के वैचारिक और राजनीतिक हितों के अनुरूप होती है। ऐसे समय, जब उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव सर पर आ रहे हैं, ऐसे विवादों को खड़ा करना भी सवालों के घेरे में है। 

भारत की आत्मा की परीक्षा

हर की पैड़ी पर प्रवेश का प्रश्न केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं है। यह उस भारत की आत्मा की परीक्षा है, जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, उदार और लोकतांत्रिक मानता है। गंगा किसी से धर्म नहीं पूछती; वह सबको समान रूप से जीवन देती है। भारतीय संविधान भी नागरिकों के बीच धार्मिक आधार पर भेदभाव को अस्वीकार करता है। फिर प्रश्न यह है—यदि गंगा और संविधान दोनों समावेशी हैं, तो हर की पैड़ी पर निषेध क्यों?समाधान टकराव में नहीं, बल्कि संवाद, विवेक और समन्वय में है—ऐसे समन्वय में जो परंपरा का सम्मान करे, लेकिन संविधान की सर्वोच्चता और भारत की उदार वैश्विक छवि को अक्षुण्ण भी रखे।

Ramswaroop Mantri

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